• मंदिरों, बौद्ध विहारों, दाओ मंदिरों और उपासना-कक्षों के भीतर: स्रोत आजीविका-सौभाग्य और आयु में बड़ी कमी बताता है।
• कुएँ, चूल्हे और शौचालय के पास; उजड़े बगीचे, कब्र, शव या ताबूत के समीप: स्रोत कहता है कि दुष्ट देव-प्रेत गर्भ में उतरते हैं और साथ ही ‘विकृत प्राणी’ का जन्म तथा मृत्यु होती है।
A08 — मनुष्य की अवस्थाओं से जुड़े निषेध (PDF 182; मुद्रित 179)
• दबा हुआ रोष और क्रोध: स्रोत कहता है कि तीव्र क्रोध यकृत को हानि पहुँचाता है और इस अवस्था में उल्लंघन से रोग अवश्य होता है।
• लंबी यात्रा: स्रोत कहता है कि यौन संबंध के बाद सौ ली चलने वाला बीमार होता है और सौ ली चलने के बाद संबंध बनाने वाला मर जाता है। ली मूल की दूरी की इकाई है; इसे किलोमीटर में नहीं बदला गया है।
• नशा और भरपेट भोजन: स्रोत इनके बाद संबंध बनाने को पाँच आंतरिक अंगों की व्यवस्था उलटने वाला बताता है।
• खाली पेट: स्रोत उल्लंघन को मूल आत्मिक शक्ति की क्षति से जोड़ता है।
• बीमारी के बाद: स्रोत के अनुसार उल्लंघन से लक्षण बदलकर रोग दोबारा उभरता है।
• गर्भावस्था: स्रोत कहता है कि उल्लंघन गर्भ को नुकसान पहुँचाता है, इसलिए गर्भ ठहरने के बाद अलग बिस्तरों पर सोना और यौन इच्छा से विरत रहना चाहिए। वह इसे गर्भ-संस्कार के पालन से जोड़ता है और दावा करता है कि इससे गर्भपात तथा बच्चों की ‘गर्भ-विष’ और ‘गर्भ-दुर्बलता’ कही गई स्थितियों, गंभीर दानों और चेचक, ‘विचरती वायु’, ऐंठन तथा ‘या-गान’ नामक मसूड़ों के रोग का भय नहीं रहता। आगे वह दावा करता है कि पैदा होने वाला लड़का गरिमापूर्ण और सीधा तथा लड़की सतीत्वनिष्ठ, शांत और सौम्य होगी और दोनों स्वाभाविक रूप से दुराचार में नहीं पड़ेंगे। ये दावे स्रोत के हैं, चिकित्सा-कारणों का प्रमाण या बच्चे के भावी आचरण की गारंटी नहीं।
A09 — मनुष्य की अवस्थाओं से जुड़े निषेध, आगे (PDF 183; मुद्रित 180)