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बाहरी संदर्भ-परिशिष्ट

हिन्दी · बाहरी संदर्भ
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• बीमारी, फोड़े और चेचक: इन तीनों का साझा कथन है कि पूरी तरह स्वस्थ हुए बिना उल्लंघन बिल्कुल न किया जाए; स्रोत कहता है कि उल्लंघन करने वालों में अधिकतर की मृत्यु होती है।

• आँख का रोग: रोग ठीक न हुआ हो या अभी-अभी ठीक हुआ हो, तो स्रोत उल्लंघन से अंधापन होने का निश्चित दावा करता है।

• क्षयकारी दुर्बलता: ठीक होकर बल लौटने पर भी स्रोत एक वर्ष यौन संयम को आवश्यक बताता है। वह कहता है कि स्वयं को स्वस्थ मानकर उल्लंघन करने वालों में अधिकतर की मृत्यु होती है।

• स्नायु और हड्डियों की चोट: ठीक होने के बाद भी एक सौ सत्तर या एक सौ अस्सी दिन संयम रखने को कहा गया है। सौ दिन बीतने से पहले उल्लंघन करने पर मृत्यु और उसके बाद भी विकलांगता होने का निश्चित दावा किया गया है।

• अत्यधिक श्रम, अत्यधिक मानसिक चिंता, अत्यधिक गर्मी, अत्यधिक भय और अत्यधिक शोक: सभी का साझा नियम है कि उल्लंघन न किया जाए। स्रोत हल्के परिणाम के रूप में चिरकालिक रोग और गंभीर परिणाम के रूप में तत्काल मृत्यु बताता है।

U03 — उद्धृत पाठ का उपसंहार (PDF 183–184; मुद्रित 180–181)

स्रोत कहता है कि ऊपर दी गई महीनेवार संयम की तिथियों और स्वर्ग, मनुष्य आदि से जुड़े निषेधों को छोड़ने पर हर महीने छह या सात दिन ऐसे बचते हैं जिनमें कोई निषेध नहीं होता। शरीर की रक्षा करने वाला व्यक्ति, उसके अनुसार, वैसे भी महीने में अधिकतम तीन या चार बार ही संबंध बनाता है; वह इसी से रोगों से बचे रहने तथा आत्मिक और शारीरिक स्फूर्ति की दृढ़ता का दावा करता है। वह आगे यह भी निश्चित रूप से कहता है कि कम कामेच्छा वाले लोगों के अधिक पुत्र होते हैं और उनकी संतान का शरीर भी सबल होता है। फिर वह नए विवाहित युवकों पर खेद प्रकट करता है जो इच्छाओं में बहकर शरीर को क्षति पहुँचाते हैं और दीर्घ वैवाहिक सुख को थोड़े ही समय में नष्ट कर देते हैं। अंत में वह आग्रहपूर्ण प्रश्न उठाता है: क्यों न संयम की तिथियों का सावधानी से पालन कर शरीर की रक्षा और जीवन को सँभाला जाए, ताकि आगे चलकर पति-पत्नी सम्मानपूर्वक साथ वृद्ध हों, अनेक बच्चों-पोतों का सुख मिले और पारिवारिक आनंद पूरा भोग सकें?

स्रोत-पाठ की अनिर्णीत बातें

• महीनेवार तालिकाओं में 216 अलग तारीख़-समूह हैं; इनके अतिरिक्त बारहवें महीने के पहले दस दिनों में वू दिन की स्वतंत्र शर्त है। स्रोत स्वयं कुल 225 दिनों का दावा करता है। ये संख्याएँ एक ही प्रकार की गिनती नहीं हैं; अंतर भरने के लिए नौ दिन नहीं गढ़े गए हैं।

• सातवें और दसवें महीने के पहले दिन ‘मासांत का अंध-चंद्र दिवस’ ही रखा गया है। स्रोत का यह पाठ संदिग्ध है, लेकिन इसे चुपचाप ‘मासारंभ’ नहीं किया गया।

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