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परलोक के अटल विधान

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पाठ

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विषय-सूची

कामना से आहत न हों तो स्त्री-पुरुष दोनों दीर्घकालिक उच्च आयु पाएँगे। घर में प्रवेश पर शोकाकुल विधवा नहीं होगी और पुरुष बाहर निकले तो दयनीय विधुर नहीं दिखेगा। दीर्घायु के सफ़ेद बाल श्वेत सारस जैसे हैं, इसलिए ‘सारस के बाल’। चेहरा फिर भी बालक जैसा लाल और स्वस्थ, इसलिए ‘बालक का मुख’।

एक घर में पूर्ण समरसता; बुढ़ापा आने का पता नहीं।

‘एक घर’ एक परिवार है। स्त्री-पुरुष सब रोग-दर्द से मुक्त, सौभाग्य और दीर्घायु वाले हों तो केवल मेल से शुभता आती महसूस होती है। बुज़ुर्ग सुखी रहते हैं और बुढ़ापा निकट होने का भान नहीं होता।

शिष्य को गुरु से अधिक कौन जाने? पुत्र को पिता से अधिक कौन जाने?

‘दी’ यहाँ छात्र है, ‘शी’ शिक्षक। छात्र का स्वभाव केवल शिक्षक ही जानता है और पुत्र की रुचियाँ केवल पिता ही स्पष्ट रूप से जानता है।

मैं देखता हूँ कि गुरु पढ़ाई के अतिरिक्त शरीर की रक्षा का ज्ञान बिल्कुल नहीं सिखाते।

‘शरीर-रक्षा का ज्ञान’ दान्त्येन की रक्षा और स्त्री-सौंदर्य से न बहकने का ज्ञान है। शिक्षक पढ़ना सिखाते हैं, लेकिन यौन संयम से शरीर बचाना नहीं; यह बहुत खेदजनक है।

कभी शिष्य की चतुराई के कारण उसकी उच्छृंखलता और अधीरता चलने देते हैं।

‘उच्छृंखल और अधीर’ अभिमानी, हल्के युवा हैं, जिनमें सतहीपन बाकी है। उन्हें गंभीर समझाइश देकर स्थिर बनाना चाहिए, पर चतुराई के कारण नरमी करके शिक्षा नहीं देते और बिना अनुशासन उनका हल्कापन चलने देते हैं।

कभी घर के स्वामी के लाड़ से उसे तितली-मधुमक्खी सा उन्मत्त भटकने देते हैं।

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