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परलोक के अटल विधान

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विषय-सूची

‘घर का स्वामी’ घर का मुखिया है। ‘लाड़’ दोष ढकना है। फूल चुनती उन्मत्त तितली-मधुमक्खी का रूपक युवकों के वेश्यागृहों की गलियों में भटकने के लिए है। मुखिया के लाड़ से उनकी मनमानी और कामुकता चलती है; गंभीर शिक्षा और रोक नहीं होती।

कामभाव पहली बार खुलता है; जन्मजात विवेक धीरे-धीरे खोता है।

‘भाव का छिद्र’ वह स्थान है जहाँ कामना उठती है। ‘पहली बार खुलना’ किसी के उकसाने से कामुक विचार शुरू होना है। विचार उठे तो दूसरों के मान-शील की परवाह छोड़कर उनकी पत्नी-बेटियों से दुराचार करता है और स्वर्गीय सिद्धांत तथा अंतरात्मा खो देता है।

मूलतः जेड-सभागृह योग्य व्यक्ति था; अब विकृत पथ का युवक बना।

‘जेड-सभागृह’ हानलिन अकादमी का कार्यालय है। ‘विकृत पथ’ यौन दुराचार और गलत आचरण है। प्रतिभाशाली युवक मूलतः हानलिन अधिकारी योग्य था, पर अचानक कामुकता से भविष्य बिगाड़कर जीवन भर भोगी आवारा बन गया।

कितनी भी उज्ज्वल असाधारण प्रतिभा हो, पद-प्रतिष्ठा अवश्य अटकेगी।

‘उज्ज्वल’ खुला और विशिष्ट, ‘असाधारण प्रतिभा’ अनोखा ज्ञान-कौशल है। ‘अटकना’ कामों में उलटफेर और योजनाओं का असफल होना है। युवक प्रतिभाशाली हो, पर यौन दुराचार करते ही व्यवसाय और पद-प्रतिष्ठा अनुकूल नहीं रहते।

अयोग्य गुरु का दोष लोगों को कम हानि नहीं पहुँचाता।

‘अयोग्य’ साधारण, संकीर्ण है। ऐसे गुरु शरीर-रक्षा की शिक्षा नहीं देते, शिष्यों की कामुकता चलने देते हैं और पद-प्रतिष्ठा बिगड़ती है। यह सब गुरु का दोष है; इसकी हानि छोटी कैसे हो?

मैं पिता भी देखता हूँ, जो अंधे लाड़ में अनुशासन देर से करते हैं।

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