‘अंधा लाड़’ अत्यधिक नरमी है। ‘देर’ उपेक्षा और विलंब, ‘अनुशासन’ समझाना, मारना और डाँटना है। सम्राट कहते हैं कि पिता अक्सर विवेक न समझकर संतानों पर नरमी करते हैं। गलती पर रोक-टोक होनी चाहिए, पर उलटे देर करके नहीं करते। यह अंधा लाड़ नहीं तो क्या है?162
थोड़ी अधकचरी समझ हो तो हर मिलने वाले से श्रेष्ठ संतान कहते हैं; मामूली हुनर हो तो हर ओर प्रशंसा की होड़।
‘अधकचरी समझ’ थोड़ा जानना, ‘मामूली हुनर’ उथली कला, ‘थोड़ी विशेषता’ छोटा गुण है। ‘श्रेष्ठ संतान’ अच्छे बच्चे हैं। थोड़ा अच्छा गुण देखते ही बाहर हर मिलने वाले से प्रशंसा करके अपने अच्छे वंशज दिखाते हैं।
घर सँभालने योग्य पात्र नहीं, फिर भी मेज़ का अनमोल रत्न मानते हैं।
‘पात्र’ उपयोग की वस्तु, ‘मेज़ का रत्न’ मोती या सुंदर जेड है। पुत्र घर बचाए रखने योग्य नहीं, फिर भी उसे अनमोल खजाना मानकर लाड़ और छूट देते हैं।
फिर संयम की सीमा लाँघता, मर्यादा और संबंधों के नियम तोड़ता है।
‘जाँच’ संतानों का व्यवहार देखना, ‘रक्षा-सीमा’ गलतियाँ रोकना है। ‘मर्यादा’ स्त्री-पुरुष और भीतर-बाहर के व्यवहार का भेद है। ‘स्थान’ नैतिक संबंधों की निर्धारित भूमिका है। ‘छोड़ना, लाँघना, पार करना, तोड़ना’ सभी नियम और मर्यादा न मानना हैं।
पूरा स्वभाव उच्छृंखल बनता है; भिक्षुणियों और विधवाओं के साथ मनमाने ढंग से सोकर सुख भोगता है।
‘भिक्षुणी’ गृहत्यागी बौद्ध स्त्री, ‘विधवा’ पति-विहीन महिला है। युवक की आदतें हल्केपन और कटुता से भर जाती हैं; वह भिक्षुणियों और विधवाओं को मनमाने ढंग से लुभाकर साथ सोने का सुख चाहता है।
मुँह भर मूर्ख बातें रचता है; वेश्याओं की गलियों में मनमाना आनंद ढूँढ़ता है।