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परलोक के अटल विधान

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पाठ

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विषय-सूची

जानबूझकर पागलपन और मूर्खता का अभिनय करता, उलटी-सीधी बातें बोलता है। वेश्याओं की किसी भी गली में अपने मन की पसंद के अनुसार भटकता है।

कहता है, पिता मुझे सीधापन सिखाते हैं, पर स्वयं सीधे नहीं चले।

‘आचार्य’ यहाँ पिता हैं। ‘सीधा’ सही मार्ग, ‘सीधे न चलना’ सही मार्ग न अपनाना है। पिता सही राह सिखाएँ तो उलटे कहता है कि पिता भी सही नहीं चले और उनकी शिक्षा नहीं सुनता।

क्रोध निगलकर चुप रहना—अंत कैसे होगा?

‘अंत’ यहाँ कठिन स्थिति से निकलने का रास्ता है। पिता सदा लाड़ और दोषों की रक्षा करके संतान का स्वभाव बिगाड़ता है। अब सही राह सिखाए तो पुत्र बुरे शब्दों से विरोध करता है; पिता केवल क्रोध दबाकर चुप रह सकता है। ऐसी स्थिति से वह कैसे निकले!

मैं प्रसिद्ध पर्वत और विशाल नदियाँ सोचता हूँ; कहाँ उच्च विवेक वाले लोग नहीं?

‘प्रसिद्ध पर्वत’ नामी पहाड़, ‘विशाल नदी’ बहुत बड़ी नदी है। सम्राट कहते हैं कि इन स्थानों में सभी ओर उच्च समझ वाले लोग हैं।

पर यौन दुराचार छोड़ने की बात आए तो कम ही ऐसे लोग हैं जो इसे कठिन न मानें। क्यों?

‘कम’ थोड़े हैं। यौन संयम की बात पर अधिकांश लोग कठिनाई मानते हैं; जो कठिन न मानें वे बहुत कम हैं। आखिर कारण क्या है?

अधिकतर इच्छा का घोड़ा बाँधना कठिन, सांसारिक संबंधों से लंबे समय बँधा; चित्त का बंदर बंद नहीं, सांसारिक सौंदर्य में जकड़ा।

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