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परलोक के अटल विधान

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पाठ

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विषय-सूची

‘इच्छा का घोड़ा, चित्त का बंदर’ बिखरे और भटकते विचारों का रूपक है: घोड़ा दौड़ता है, बाँध नहीं सकते; बंदर कूदता है, रोक नहीं सकते। अधिकांश लंबे समय से सांसारिक अकुशल संबंधों और आकर्षक सौंदर्य में बँधे हैं, इसलिए लौटना कठिन लगता है।

लाभ-हानि नहीं पहचानते; भ्रम पकड़कर जागते नहीं।

कामुक व्यक्ति का कर्मफल अभी न आया हो तो वह लाभ-हानि का भेद न जानकर मनमानी करता है। गलत राह में प्रवेश के बाद कोई रोकने को कहे तो अपनी राय पकड़े रहता है और पश्चात्ताप से जागता नहीं।

कौन जानता था कि पुष्प जैसे उजले चेहरे ने असंख्य वीर फँसाए? सुंदर लाल श्रृंगार ने कितने प्रतिभावान घायल किए!

‘पुष्प जैसा उजला चेहरा’ स्त्री का फ़ुरोंग फूल जैसा सुंदर, गोरा मुख है। ‘सुंदर लाल श्रृंगार’ लाल प्रसाधन से और आकर्षक बनना है। ‘वीर और प्रतिभावान’ बड़े योग्य लोग हैं। उनका भविष्य सौंदर्य में फँसकर बिगड़ा; संसार में ऐसे कितने हैं, कौन गिने?

विरत हो, विरत हो! विपत्ति कहाँ जाकर रुकेगी?

‘विरत हो, विरत हो’ का स्वर है—अवश्य छोड़ना चाहिए। न छोड़कर अपराध करे तो आने वाली विपत्तियाँ कब थमेंगी? ‘हू’ कहाँ या कैसे, ‘दी’ रुकना है।

संसार में अनेक लोग हैं; उनकी श्रेणियाँ समान नहीं।

संसार के लोग बहुत हैं; उनके स्तर और प्रकार एक जैसे नहीं हो सकते।

कुछ बचपन में पिता खोकर अनाथ हुए और सिर मुंडाकर भिक्षु बने।

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