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परलोक के अटल विधान

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पाठ

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विषय-सूची

‘हु’ सहारा है। बचपन में पिता न होना अनाथ होना, अर्थात सहारे का अभाव है। तब विवश होकर सिर मुंडाकर मंदिर में भिक्षु बनते हैं और देवों की रक्षा का सहारा लेते हैं।

कुछ प्रसिद्ध पर्वतों में मार्ग सीखकर धूल-संसार और लौकिकता छोड़ते हैं।

कुछ संसार की मोह-माया समझकर लौकिक लोगों के साथ रहना नहीं चाहते। इसलिए उनके पास प्रसिद्ध पर्वत खोजने और दीर्घजीवन के लिए अमरत्व का मार्ग सीखने के सिवा कोई राह नहीं रहती।

उचित है कि मन लोहा-पत्थर सा हो, ध्यान-द्वार कसकर बंद रहें।

भिक्षु या दाओवादी साधु बनें तो मन लोहा-पत्थर की तरह दृढ़ होना चाहिए। ध्यान-भवन के द्वार कसकर बंद रखें और स्त्रियों से आना-जाना न करें।

कौन अपेक्षा करता था कि शराब और मांस लेकर पिछले व्रत चुपके तोड़ेंगे?

भिक्षु और दाओवादी साधु व्रत-शील को महत्त्व देते हैं; उन्हें शराब और मांस नहीं लेना चाहिए। अचानक व्रत कैसे तोड़ दिया? यह अप्रत्याशित और वास्तव में समझ से बाहर है।

लुआन और फ़ेंग को उलट-पलटकर आज अपने मन का सुख चाहते हैं।

लुआन और फ़ेंग दोनों पक्षी मनमाने साथी नहीं बदलते; यह स्त्रियों के अव्यवस्थित साथी न बनाने का रूपक है। अब भिक्षु या दाओवादी साधु कामुक होकर भले घर की स्त्रियों को लुभाएँ, पति की हत्या की योजना करें या भाग जाएँ, वैध जोड़ियाँ तोड़कर अनुचित मिलन करें, तो यह लुआन-फ़ेंग को उलटने जैसा है। उनका मन केवल थोड़ी देर का सुख चाहता है।

कमल-सरोवर अपवित्र होता है; स्वर्गीय देव क्रुद्ध होते हैं।

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