आशय है कि उच्छृंखल, भटकते, कामुक युवक प्रायः वंशहीन हो जाते हैं। जन्मदिवस या त्योहार पर कौन उन्हें भोजन चढ़ाएगा?
यह कहते और सोचते हुए दुख कैसे न हो?
‘यान’ कहना, ‘न्येन’ सोचना है। सम्राट यहाँ तक कहते और सोचते हुए लोगों के लिए बहुत दुखी होते हैं।
और मेहनतकश किसान परिवारों के लोग भी चंचल, श्रम-विमुख हो जाते हैं।
‘किसान परिवार’ खेती करने वाले घर हैं। ‘त्याओदा’ हल्केपन और श्रम-कष्ट न सह सकने का अर्थ देता है। पढ़े-लिखे युवकों के अलावा ग्रामीण परिवारों की संतानें भी उच्छृंखल आदत पालकर मेहनत करने को तैयार नहीं रहतीं।
माता-पिता की सेवा और बड़ों का सम्मान नहीं सोचते; उलटे दीवारों में सुराख करते और दीवारें लाँघते हैं।
‘नहीं सोचते’ अर्थात विचार नहीं करते। ‘निकटजन’ माता-पिता हैं, ‘बड़े’ वरिष्ठ। ‘छेद’ सुराख है। दीवार में बड़े-छोटे छेद करके पड़ोस की स्त्रियों को चोरी से देखना ‘छेद करना’ है। ‘यू’ पार करना है; कुछ दीवार लाँघकर दूसरों की स्त्रियों से दुराचार करते हैं। आशय है कि उच्छृंखल युवक माता-पिता के प्रति कर्तव्य और भ्रातृसम्मान की बात न करके छल, चोरी और यौन दुराचार करते हैं।
दक्षिण के खेत और पूर्व की भूमि सूख जाते हैं।
‘दक्षिण के खेत’ दक्षिण की खेती, ‘पूर्व का बाहरी क्षेत्र’ पूर्व की भूमि है। ‘बदलना’ परिवर्तन, ‘सूखना’ पौधों का न बढ़कर मर जाना है। हर ओर कोई घास निकालने या खाद देने वाला नहीं, इसलिए पहले हरे-भरे पौधे भी बाद में सूखकर मरते हैं।151
छिन की अट्टालिकाओं और छू के भवनों में वसंत-शरद का होश नहीं रहता।