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परलोक के अटल विधान

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विषय-सूची

‘सुंदर युवती’ रूपवती लड़की, ‘कोमल स्त्री’ नाजुक महिला है। ‘फूल सा मुख’ सुंदर चेहरा, ‘चाँद सा रूप’ चाँद जैसा उजला चेहरा। लोहे के तार का जाल पशु-पक्षी को फँसाकर निकलने नहीं देता। ताँबे-लोहे का काँटा मछली-कछुए को नहीं छूटने देता। आशय है कि शीलवती स्त्रियों को रसिक पुरुष कभी चालों के जाल से, कभी धन से लुभाते हैं। वे अक्सर फंदे में पड़कर अपमानित होती हैं और मान-शील खोती हैं। यह सोचकर दाँत पीसने जितना रोष होता है।

युवा स्त्री लज्जित होकर फाँसी चाहती है; अपमानित सुंदरी नदी में कूदने को तैयार होती है।

युवा विवाहित महिला ‘युवा स्त्री’, लाल श्रृंगार किए युवती ‘सुंदरी’ कहलाती है। अपमानित होकर मान-शील खोने पर लोगों का सामना नहीं कर पाती। उपहास और गालियों से बचने के लिए वह अक्सर फाँसी लगाकर या पानी में डूबकर जान दे देती है।155

आक्रोश मिटता नहीं; प्रेत-द्वार पर रोती शिकायत ले जाती है। अन्यायग्रस्त आत्मा छँटती नहीं; परलोक में याचिका देती है।

‘रोती शिकायत’ रोकर बताना, ‘याचिका’ लिखित शिकायत देना है। ‘प्रेत-द्वार’ परलोक की चौकी, ‘परलोक-न्यायालय’ यमराज का कार्यालय है। स्त्री अपमान और लज्जा में मरकर संतुष्ट नहीं होती। उसके भीतर का अन्याय पहले रोष-ऊर्जा, फिर उग्र ऊर्जा बनता है। वह प्रतिशोधी प्रेत बनकर व्यभिचारी को जीवित पकड़कर अपना रोष मिटाना चाहती है। प्रेत-द्वार पर विलाप और परलोक में याचिका देकर यमराज से प्रतिशोध की अनुमति न माँगे, तो यह उग्रता कैसे मिटे और अन्याय कैसे स्पष्ट हो? ऐसी प्रतिशोधी आत्मा कभी व्यभिचारी को फाँसी या आत्महत्या तक पहुँचाती, कभी प्रहार करके सातों मुख-छिद्रों से रक्त बहाकर मारती है। ऐसे मामले विभिन्न युगों की परीक्षा-स्थलों की विचित्र घटनाओं के अभिलेखों में बहुत मिलते हैं।

पाँचवें सभागृह में कठोर यम-विधान है; कानून में विलंब की गुंजाइश नहीं।

‘पाँचवाँ सभागृह’ परलोक का पाँचवाँ कार्यालय है। ‘कठोर यम-विधान’ यमराज के अत्यंत सख्त कानून को कहता है। यौन दुराचारी मृत्यु के बाद परलोक पहुँचे तो यमराज उसे सभी बुराइयों में प्रथम अपराध के अनुसार धिक्कारते हैं। कोई पक्षपात नहीं; एक क्षण की नरमी या देर कैसे हो?

ताँबे के हथौड़े और लोहे के काटने वाले यंत्र—रक्त-मांस बिखरता है; तलवार-वृक्ष और छुरी-पर्वत—देह और चेतना छिन्न होती हैं।

ताँबे के हथौड़े से शरीर कुचला और लोहे के काटने वाले यंत्र से शरीर काटा जाए तो रक्त-मांस कैसे न बिखरे? तलवार-वृक्षों पर फेंकें या छुरी-पर्वत पर डालें, तो देह नरक में बिखरेगी और चेतना दुख-सागर में गिरेगी। कामुक व्यक्ति का ऐसा अंत क्या दयनीय नहीं!

एक विचार की भूल जीवन भर नहीं छुड़ाई जाती।

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