‘मछली-पत्र’ प्राचीन काल में मछली के पेट में पत्र पहुँचाने की कथा है। ‘जंगली हंस-संदेश’ हान काल के सू वू की घर का पत्र जंगली हंस के पैर में बाँधकर भेजने की घटना है। आशय है कि दूर परदेश में व्यापार करते व्यक्ति वेश्याओं में डूबकर समय की परवाह नहीं करते और घर पत्र भी नहीं भेजते।
जन्मजात सार-जल नष्ट हो तो दवा निष्फल; रोग के बाद पछताएँ तो देव-प्रार्थना निष्फल।
जन्मजात वृक्क-जल और जीवन-सार कामुकता से समाप्त हो जाए तो रूप सूख जाता है, रोग असाध्य होता और दवा असर नहीं करती। तभी पछताकर देवों से प्रार्थना करके मनौतियाँ मानना भी व्यर्थ कहा गया है।156
दूर क्षितिज की ओर रोते हो; कौन देखने आएगा?
‘क्षितिज’ मानो आकाश के छोर जितनी दूरी है। ‘देखने आना’ हाल पूछने आना है। रोग लगने पर आकाश के छोर की ओर रोओ भी, तो कौन तुम्हें देखने आएगा?
मरकर परदेश का प्रेत, अंततः विदेशी भूमि की आत्मा बनता है।
परदेश में मृत्यु होने से उसकी आत्मा और प्रेत वहीं लंबे समय टिकते हैं, लौटते नहीं। ‘प्रदेश’ भी भूमि है।
हज़ार ली दूर पर्वत-नदियाँ—सूखी हड्डियों पर कौन दया करे? जंगली घास का ढेर—मित्र-संबंधी न मिलें।
हड्डियों का ढाँचा हज़ार ली दूर दफ़न हो तो कौन दया करके उसे घर लौटाए? कब्र पर केवल घास का ढेर है। कोई मित्र-संबंधी देखने नहीं आता; किसे ढूँढ़ें जो दया करके कागज़ी मुद्रा जलाए, कागज़ चढ़ाए और घोड़े-बैल को कब्र रौंदने से रोके? ‘खोजना’ ढूँढ़ना है।
कर्मफल स्पष्ट है; रत्तीभर नहीं चूकता।