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परलोक के अटल विधान

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विषय-सूची

‘स्पष्ट’ प्रत्यक्ष है। आशय है कि कर्मफल बिल्कुल प्रकट होता है और उसमें तनिक भी गलती नहीं होती।

मैं बार-बार गंभीर चेतावनी देकर चारों वर्गों से आशा करता हूँ।

‘मैं’ सम्राट हैं। ‘बार-बार कहना’ आग्रहपूर्वक समझाना, ‘चेतावनी’ अवगत कराना। चार वर्ग विद्वान, किसान, कारीगर और व्यापारी हैं। उन्हें गलती सुधारकर भलाई अपनाने और कामुक न होने को कहा गया है।

यदि सचमुच मनःस्वभाव का पोषण कर यौन दुराचार न करो।

‘सचमुच’ दृढ़ निश्चय है। ‘पोषण’ पानी के सींचने जैसा है। करुणा, न्याय और नैतिकता से मनःस्वभाव सँभालें और कामना से भ्रमित न हों, तो स्वाभाविक रूप से यौन दुराचार की प्रमुख बुराई नहीं करेंगे।

तो काव्य और मर्यादा परिवार में चलें, भंडार भरें; यश और लाभ मिलें, दीर्घायु और गहरा सौभाग्य हो।

काव्य, ग्रंथ, मर्यादा और संगीत को पारिवारिक नियम बनाकर संतानों को लगन से पढ़ना और खेती करना सिखाएँ। एक ओर भरे भंडार और संदूक समृद्धि लाएँगे, दूसरी ओर सफलता और प्रतिष्ठा से पुण्यफल तथा दीर्घायु मिलेंगे। ‘शौकाओ’ लंबी आयु, ‘वेइछी’ गहरा सौभाग्य है।

द्वार की ऊपरी चौखट दमके; सचमुच धन-प्रतिष्ठा का घर हो।

‘द्वार की ऊपरी चौखट’ दरवाज़े की ऊपर वाली आड़ी लकड़ी है। ‘दमकना’ सुनहरे अक्षरों की पट्टिका से चमकना है, जो धन और प्रतिष्ठा का दृश्य बनता है।

पड़ोस गौरवान्वित हो; राज्य के स्तंभ होने योग्य बनो।

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