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परलोक के अटल विधान

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पाठ

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विषय-सूची

‘ध्यान खींचना’ गंभीरता छोड़कर बाज़ार में इठलाना है। ‘अव्यवस्थित प्रेम’ अनुचित प्रेम है: स्त्री-पुरुष बेतरतीब संबंध बनाकर खेल-आनंद को आदत करते और अव्यवस्था तक पहुँचते हैं। ‘पाप बोना’ पापजनित संतान का कारण बनाना, जैसे विवाह से पहले गर्भ या अनुचित पीढ़ी-संबंध में मर्यादाभंग से गर्भधारण। ये अशुभ संबंध अक्सर असीम दुर्भाग्य लाते हैं। ‘कौमार्य खोना’ स्त्री-पुरुष का कौमार्य समाप्त होना है। खुले वस्त्रों से शरीर दिखाना, संबंधों की मर्यादा न रखना, मनमाने प्रेम-संबंध करना और विवाह से पहले मर्यादा-विरुद्ध संबंध से निर्मल, शीलवान शरीर खोना इसका आशय है।

कभी विविध उद्योग चलाकर हजारों विचित्र चालें चलते हैं।

‘विविध उद्योग’ सभी व्यवसाय। ‘चलना’ बदलना, ‘हजारों विचित्र’ अनेक अजीब प्रकार, ‘चालें’ आँखें चकाचौंध करने की युक्तियाँ हैं। आज बहुत लोग सही तरीके से कमाने के बजाय तरह-तरह की चालें चलते हैं—बकरी का सिर टाँगकर कुत्ते का मांस बेचना जैसा छल। बाहर उजला साइनबोर्ड, भीतर छिपा रूपांतरित अश्लील कारोबार; अत्यंत नीच।

बाहर मोहक मुस्कान और लहराती अदाएँ, भीतर दुराचार सिखाने का भँवर; कितने आकांक्षी गिरे, कितने छात्र लौटना भूले।

‘वसंत की चमक’ मोहक मुस्कान, ‘मोहिनी लहर’ लुभावनी नज़र, ‘दुराचार सिखाना’ यौन दुराचार के लिए उकसाना है। छद्म अश्लील व्यवसायों की दुकानें बाहर रंगीन सजावट और सुंदरियों की भीड़ से लुभाती हैं, मानो लोगों को विशाल लहरों और भँवर में फँसाना चाहती हों। भीतर दुराचार का भँवर छिपा है और हानि गहरी है। पता नहीं कितने संकल्पवान और उज्ज्वल भविष्य वाले लोग वहाँ गिरे। युवा छात्र भी विलास-स्थलों में भटकते हैं, पढ़ाई भूलते, यौन अपराध करते और माता-पिता के प्रति कर्तव्य से भी बहुत गिरते हैं।

अनगिनत व्यापार संभव हैं; यौन व्यापार का पाप भारी है। अवीचि के कठोर दंड और संतानों के अशुभ फल तथा बदनामी नहीं रुकते।

‘अनगिनत व्यापार’ विविध व्यवसाय, ‘यौन उद्योग’ वेश्यावृत्ति का कारोबार, ‘अबी’ अवीचि नरक है। कोई भी व्यवसाय करें, पर यह बिल्कुल नहीं, अन्यथा पाप भारी होगा। मृत्यु के बाद अवीचि में बंद होकर कठोर दंड भोगना होगा और संतानों को अशुभ फल मिलेगा। कोई पूछे कि पूर्वज क्या करते थे और उत्तर हो वेश्यालय चलाते थे, तो बदनामी आकाश छुएगी और दस हज़ार वर्ष लज्जा छोड़ेगी।

यह मत कहो कि उन्मुक्त भटकने, मोह में सुध-बुध खोने और सुख तलाशने में आनंद है।

‘भटकना’ स्वच्छंद उच्छृंखलता, ‘मोह में सुध-बुध खोना’ आत्मा का भ्रमित होना, ‘सुख ढूँढ़ना’ उत्तेजना और आनंद तलाशना है। स्त्री-सौंदर्य से बहककर मर्यादा छोड़ना, हर ओर उत्तेजना तलाशना और स्वयं प्रसन्न होना उचित मत कहो।

धन से लेनदेन हो, फिर भी आत्मिक स्वभाव मलिन होता है; कोई देखने-सुनने वाला न हो, अँधेरे कक्ष में अंतःकरण दोष महसूस करता है।

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