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परलोक के अटल विधान

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विषय-सूची

‘लेनदेन’ खरीद-बिक्री, ‘आत्मिक स्वभाव’ आत्मा का मूल स्वभाव, ‘मलिन’ अशुद्ध, ‘अँधेरा कक्ष’ गुप्त स्थान है। आनंद और सौंदर्य की खोज धन का सौदा हो, फिर भी अपना आत्मिक प्रकाश धूल-मैल से ढक जाता है। कोई बाहरी न देखे, तो भी भीतर बेचैनी और मुँह न दिखा सकने का भाव होता है।

अनुचित विचार उठते ही बुरे भाव बढ़ते हैं; व्यक्ति और परिवार निर्मलता खोते, मन के खेत में विषैले अंकुर जड़ पकड़ते हैं।

‘अनुचित विचार’ गलत सोच, ‘बढ़ना’ फैलना, ‘व्यक्ति-परिवार’ स्वयं और घर है। ‘मन का खेत’ चित्त-भूमि, आत्मिक पर्वत; ‘विषैला अंकुर’ विष वाले कर्म-वृक्ष का पाप-अंकुर है। कामुक विचारों के साथ बुरे विचार आते हैं। विवेक खोकर पारिवारिक मर्यादाभंग और अनैतिक कर्म कर बैठता है। व्यक्ति तथा परिवार की निर्मल प्रतिष्ठा अदृश्य रूप से खोती है और अशुद्ध विषैले बुरे वृक्ष की जड़ बोई जाती है, जो आगे की पीढ़ियों को मिलती है।

जन्म-जन्मांतर के पाप-कर्म अब उलझते हैं; कितनी ही विपत्तियाँ गुजरें, पुनर्जन्म का चक्र रुकता नहीं।

‘असंख्य जन्म’ जन्म-जन्मांतर, ‘उलझना’ शरीर से न छूटना, ‘कितनी ही विपत्तियाँ गुजरें’ का अर्थ अनेक विपदाओं से गुज़रना है। जन्म-जन्मांतर पाप-कर्म साथ नहीं छोड़ते; कितनी ही विपत्तियाँ गुजरें, पुनर्जन्म पर पुनर्जन्म कर्मफल भोगता है। कितना भयावह!

सौभाग्य कि भ्रम की राह में दूर नहीं गए; आज सही, कल गलत समझा।

अच्छा है कि गलत राह में अधिक दूर चलने से पहले मन समझ गया कि कल का मार्ग सही नहीं था। आज दूसरा, सही मार्ग अपनाना ही उचित है।

संत-ज्ञानी बनने की आकांक्षा हो तो सुधार में कृपणता न करो।

‘कृपणता’ कंजूसी और आलस्य है। संत-ज्ञानी पहले गलती सुधारना सिखाते हैं। सुधार में आलस्य या संकोच न करना ही उनके जैसा बनने की आकांक्षा है।

तब आकाश भर अपराध भी एक पश्चात्ताप से मिटते हैं।

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