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परलोक के अटल विधान

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पाठ

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विषय-सूची

‘आकाश भर’ पूरा आकाश। आशय है कि अपराध आकाश जितने बड़े हों, फिर भी पश्चात्ताप करके नया जीवन अपनाने को तैयार हो तो अपराध का अभिलेख मिट सकता है।

कठिनाई से डरकर अस्थायी आराम चुनो तो हर दिन गहराई बढ़े; स्वाद जानकर भी न छोड़ो, इस वर्ष का सुधार अगले पर टालो।

सुधार कठिन मानकर आराम में दिन गुज़ारें तो अपराध प्रतिदिन गहरा होगा। जान चुके कि कामभोग में विशेष सार नहीं, फिर भी नहीं छोड़ते। कोई इसी वर्ष जल्दी सुधारने को कहे तो कहते हैं कि अगले वर्ष करेंगे।

बार-बार ठोकर खाकर भी नहीं लौटते, देह की चाह खत्म नहीं; ताबूत सदा ढक दे, मृत्यु पर ही रुकते हैं।

कामुक व्यक्ति तरह-तरह की बाधाएँ पाकर भी मन नहीं बदलता, शरीर अभी भी कामासक्त रहता है। मृत्यु आकर ताबूत सदा बंद करे, तभी रुकता है। ‘सदा ढकना’ ताबूत में हमेशा ढक जाना, फिर जीवित न होना है।

बदनाम नाम सदा फैलता, हजार वर्षों की चर्चा बनता है।

‘बदनाम नाम’ खराब प्रतिष्ठा है। ‘चर्चा का विषय’ बात करने का आधार। बदनामी बहते जल की तरह दूर-दूर निरंतर फैलती है। ‘हजार वर्षों’ से यहाँ एक हजार साल का अर्थ है।

बुरे निशान छिपाना कठिन है; चारों ओर रुचिकर कथा बनकर फैलते हैं।

‘बुरे निशान’ यौन दुराचार के तथ्य, ‘छिपना कठिन’ ढकना मुश्किल होना। पूर्व-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण के लोग इन बुरे तथ्यों को मज़ेदार समाचार मानकर लगातार चर्चा करते हैं।

पुत्र सद्गुणी न हो तो वंशहीन होना अधिक सुखद।

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