‘सुबह’ और ‘प्रातः’ दिन के आरंभ के, ‘शाम’ और ‘संध्या’ दिन के अंत के शब्द हैं। सम्राट कहते हैं कि लोग सुगंधित धूप जलाते हैं या आदर से प्रणाम करते हैं, उनका ताओयुआन ग्रंथ और हृदय से दिया उपदेश पढ़ते हैं। उनका भलाई की ओर मन वास्तव में सराहनीय है।
तुम मुझे देव मानकर आदर देते हो; मैं तुम्हें शिशु समान कैसे न मानूँ?
नवजात बच्चा हर समय रक्षा चाहता है। संसार के लोग मुझे देव की तरह प्रणाम करते हैं, तो मैं उन्हें शिशु की तरह सुरक्षा न दूँ, यह साहस कैसे करूँ?
दुख-सागर से निकलना चाहते हो तो दुष्ट मोह काटना होगा।
यौन पाप का फल अत्यंत दयनीय है, इसलिए दुख-सागर कहा गया। ‘निकलना’ बच निकलना है। ‘दुष्ट मोह’ शराब-सौंदर्य में मन का ऐसा फँसना है जैसे राक्षस लिपटे हों। दुख-सागर से बचना है तो भ्रमपूर्ण विचार और दुष्ट मोह काटो, उन्हें फिर न बाँधने दो।
पुराने दोष ढकना चाहते हो तो कर्मावरण मिटाना होगा।
‘पुराने दोष’ पिछले जन्म और पिछले दिनों की गलतियाँ हैं। ‘ढकना’ आच्छादित करना। ‘कर्मावरण’ भारी पाप का परदा है जो शुभ मन ढकता है। ‘मिटाना’ समाप्त करना। पुराने दोष ढकना चाहते हो तो जल्दी यौन दुराचार छोड़ो, अधिक शुभ कर्म जोड़ो और पुराने पापों का आवरण हटाओ।
मेरी सलाह न सुनो तो मैं भी क्या करूँ?
मैं अच्छे वचनों से बार-बार समझाता हूँ, पर तुम सुनते नहीं, तो मैं तुम्हारा क्या कर सकता हूँ?
छुरी-पर्वत पर लुढ़को, तेल-कड़ाही में पकते रहो; रक्त-नदी में बैठो, पिघला लोहा निगलो।