अशुभ फल आने पर यमराज प्रेत-सैनिकों को तुम्हें छुरी-पर्वत पर फेंकने का आदेश देते हैं, जहाँ लुढ़कते रहो। तेल-कड़ाही में डालकर पकाया जाता है। कभी रक्त-नदी में डुबोकर ठंड और दुर्गंध सहाते हैं, कभी मुँह में पिघला लोहा भरते हैं, जिससे यकृत, आँत, पेट और फेफड़े उबलते तेल जैसे तपते हैं। ये सभी दुख तुम्हें सहने दिए जाते हैं।
तब मेरा संयम-सूत्र पढ़ने की सोचोगे; डर है कि अग्निगर्त से निकल नहीं पाओगे। तब मेरे संयम-उपदेश पढ़ने की सोचोगे; डर है कि स्वर्ग तक पहुँच नहीं पाओगे।
‘अग्निगर्त’ छुरी-पर्वत और तेल-कड़ाही की यातना का रूपक है। उससे न निकल पाना अर्थात अब सूत्र पढ़ना चाहकर भी परिणाम न पलट सकना। ‘स्वर्गीय प्रांगण’ से आशय है कि निर्दोष व्यक्ति मृत्यु के बाद परम आनंदलोक में जाता है, मानो स्वर्ग पहुँचा हो। वहाँ न पहुँच पाना अर्थात अब उपदेश पढ़ना चाहकर भी उच्च लोक तक न पहुँच पाना।
मैं लिंगश्याओ में डरता हूँ कि तुम मुझसे रोष रखोगे; तुम नरक में भयंकर दंड भोगते हो।
सम्राट कहते हैं: तुम नरक में अनेक भयंकर दंड भोगोगे और मुझे लिंगश्याओ में यह डर रहेगा कि पहले चेतावनी न देने का दोष मुझ पर रखोगे।
छूटना चाहो तो छूट न पाओ, जाना चाहो तो जा न पाओ; सुधार देर का, पश्चात्ताप निष्फल।
नरक में दंड भोगते समय भागना चाहो तो नहीं भाग सकते, चलना चाहो तो नहीं निकल सकते। ऐसी दशा में सुधार या पश्चात्ताप करना चाहो तो बहुत देर हो चुकी है।
सब प्रकार के दुख भोगकर पशु बनने भेजे जाते हो; रोएँ और सींग लेकर पक्षी-पशुओं के साथ रहते हो।
नरक के सभी दंड-दुख सहने के बाद बाहर भेजकर पशु बनाते हैं। कभी रोएँ, कभी सींग होते हैं और उड़ने वाले पक्षियों और भूमि पर चलने वाले पशुओं के साथ रहना पड़ता है।
फिर भी छुरी से मृत्यु, कड़ाही में तलना और आग में जलना; कब हिसाब पूरा हो, तभी मनुष्य-जन्म मिले।