‘फिर भी’ पहले जैसा है। पशु-पक्षी बनकर भी छुरी से मरते, कड़ाही में तले या आग में जलाए जाते हैं। अपराध का हिसाब पूरा होने पर ही मनुष्य बन सकते हैं।
मनुष्य-जन्म एक बार खोया तो असंख्य कल्पों तक कठिनाई; क्यों न साधना-पुण्य से बादलों के ऊपर जाओ?
गलती जानकर न सुधारें और मनुष्य-जन्म खो दें तो अनगिनत कल्पों के कष्ट हैं, तुरंत मनुष्य नहीं बन सकते। इससे अच्छा भलाई और सद्गुण संचित करना है, जिससे स्वर्ग और बादलों के ऊपर जा सकते हैं।
आगे की गाड़ी टूटे तो पीछे वाली सावधान हो—यही दीर्घजीवन और चिरयौवन की औषधि है।
‘आगे की गाड़ी’ पहले चलने वाला वाहन, ‘टूटना’ गिरकर टूटना, ‘पीछे की गाड़ी’ बाद में आने वाला वाहन और ‘सावधान’ सतर्कता है। यदि पहले के कामुक लोगों से सीखें, जिनमें से कोई भी अपने जीवन और घर की बर्बादी से नहीं बचा, तो यह पीछे की गाड़ी के आगे वाली से सावधान होने जैसा है। इससे पुण्यफल और आयु बढ़ते हैं, मानो दीर्घजीवन और चिरयौवन की दिव्य औषधि ली हो।
पहले दैवी लेखनी से प्रकट उपदेशों में संदेह और विश्वास मिले थे।
‘पहले’ अतीत है। लोग दैवी लेखन का सभागृह बनाकर गतिशील लेखनी से देवादेश लेते और लोगों को दिखाते थे, पर संसार के लोग आधे संदेह, आधे विश्वास में थे; विश्वास करने वाले कम और न करने वाले अधिक थे।
इसलिए विपत्तियाँ बार-बार आईं, युद्ध ने व्याकुल किया; आकाश-पृथ्वी उलट गए, दसियों लाख लोगों को अनर्थ मिला।
‘विपत्तियाँ’ जल, आग, महामारी आदि हैं। ‘बार-बार आना’ अक्सर होना है। युद्ध भी संसार को अशांत करके व्यवस्था उलट देता है और लाखों-करोड़ों लोग साथ कष्ट पाते हैं। कितना दयनीय! ‘झाओ’ यहाँ दस लाख, ‘यी’ पीछे छोड़ना है—लोगों के लिए अनर्थ छोड़ना।
दीप-मोमबत्तियाँ दमकती हैं, हर ओर वेदी और शिक्षा; नगर-पड़ोस उत्साह से समूहों में पश्चात्ताप और ग्रंथ-वंदन करते हैं।