तब न्यायाधिकारी ने आगे कहा, “जिन मनुष्यों ने कठोर वाणी के अपराध किए हैं और अब यह लेख देखकर नरक के दुख से बचना चाहते हैं, वे जीवित रहते इस वाणी-कर्म का पश्चात्ताप कर सकते हैं। अवश्य ही इसकी गंभीरता देखनी होगी—क्या किसी के जीवन को हानि पहुँची आदि। गंभीर हो तो भी पश्चात्ताप से बहुत सुधार होगा। सामान्य कठोर वाणी के कर्मों को आयु समाप्त होने से पहले पश्चात्ताप द्वारा पूरी तरह शुद्ध किया जा सकता है। विधि वही है जो कल झूठ के अपराध के लिए बताई थी। बस ‘झूठ बोलने का अपराध’ के स्थान पर ‘कठोर वाणी का अपराध’ कर दें। जैसे: मेरा नाम अमुक है। मैंने अमुक समय और स्थान पर अमुक मामले में कठोर वाणी का प्रयोग किया था। इस तरह झूठ की जगह कठोर वाणी कह देना पर्याप्त है।
याद रखिए! पश्चात्ताप सच्चे मन से होना चाहिए! यह बहुत महत्त्वपूर्ण है। सच्चे मन का एक विचार तीनों कालों तक पहुँचता है; वह असंख्य अकुशल कर्म क्षीण करने के लिए पर्याप्त है और सीधे आकाश-पृथ्वी तथा परलोक के विधान के नियमों तक पहुँचता है! ‘परलोक के अटल विधान’ में बताई इस सच्चे पश्चात्ताप की विधि को पुनः प्रकाशित करके दूसरों को बताएँ; इससे पिछले अकुशल कर्म अवश्य मिटेंगे। परलोक में हर मनुष्य के विविध शुभ-अशुभ कर्मों का विस्तृत अभिलेख है। भलाई को छोटा समझकर न छोड़ें। बड़े पुण्यफल वास्तव में छोटी भलाई, छोटे अच्छे कर्म और सूक्ष्म तथा कठोर शील पालन से आते हैं। याद रखिए: ऐसा नहीं कि लेख पढ़कर पश्चात्ताप कर लेने के बाद सोचें, यह विधि तो है ही, अब मनमानी कर सकते हैं, फिर बुरा करेंगे, फिर पश्चात्ताप करेंगे। बार-बार जानते-बूझते अपराध करने वाले का अपराध एक स्तर बढ़ जाता है!
आ यू! कठोर वाणी के नरक का दर्शन आज यहीं तक रखें। समय निकालकर फिर आइए! मुझे भी पहले राजकीय काम में लगना है।”
“मैं न्यायाधिकारी को प्रणाम करती हूँ! आज उस आंटी की सहायता करने के लिए आपका बहुत आभार।”
न्यायाधिकारी बोले, “औपचारिकता की आवश्यकता नहीं। हमारी दृष्टि में हर अपराधी आत्मा समान है। हम परलोक के अधिकारी चाहते हैं कि सभी आत्माएँ जल्द नरक से निकलें। आपकी पुस्तक में सहायता करना मेरा दायित्व भी है। उद्देश्य भी यही है कि और अधिक मनुष्य आयु पूरी होने पर नरक में दुख भोगने न गिरें। वास्तव में इससे हमारा काम भी कम होगा, इसलिए आ यू, मुझे तो आपका आभार मानना चाहिए! अच्छा होगा कि आप अधिक बार आएँ और जल्द पुस्तक प्रकाशित करें, नरक के तरह-तरह के दुख मनुष्यलोक के सामने रखें और लोगों को शील, बुद्ध-नाम स्मरण तथा भलाई की ओर प्रेरित करें। बुद्ध की कृपा और जेड सम्राट तथा सभी यमराजों के इस अवसर पर स्वर्गीय रहस्य पूरी तरह खोल देने के अनुग्रह को व्यर्थ न जाने दें। मनुष्यलोक के प्राणियों का उद्धार करने के लिए ही परलोक के न्यायालय और नरकों के विभिन्न दंडों की सच्चाई प्रकट की जा रही है। आज मनुष्यलोक के प्राणी बुरे कर्म करते हैं, कर्मफल नहीं मानते, मनमानी करते हैं, यौन दुराचार और जीवहत्या, चोरी और झूठ करते हैं; दशा लगभग नियंत्रण से बाहर हो गई है। यह स्वर्ग का गंभीर उल्लंघन है और आकाश-पृथ्वी की शुद्ध ऊर्जा का संतुलन बिगाड़ता है। ‘परलोक के अटल विधान’ पुस्तक इसलिए आई है कि उन कुछ लोगों को दुख-सागर से बचाया जा सके जिन्होंने बुरे कर्म तो किए हैं, लेकिन जिनकी अंतरात्मा पूरी तरह नहीं मरी है।”
“अच्छा! आप जल्दी लौटकर लेख लिखिए; मैं पहले अपने काम में लगूँगा!”
“अमिताभ बुद्ध! करुणामय न्यायाधिकारी ने इतनी व्यस्तता में सहायता की—इसके लिए आभार। मैं हाथ जोड़कर धन्यवाद देती हूँ!”
श्वेत कमल पर सवार होकर घर लौटती हूँ!
18/कभी काँटे से मछली न पकड़ें—अकेली आत्मा द्वारा तलवारों के समुद्र में अकेले काँटा डालने का नरक113
नमो अमिताभ बुद्ध! न्यायाधिकारी को साष्टांग प्रणाम!