पहले प्रकार के लोग धन के लिए कुछ समय तक यह काम करते हैं, फिर बोध होने पर इसे छोड़ देते हैं और आगे कभी नहीं करते। यदि साथ ही गहरा पश्चात्ताप भी करें, तो संभव है कि नरक का कुछ कर्मफल हल्का हो जाए। लेकिन जीवनकाल में प्रत्येक अपराध पर डेढ़ महीने की आशीषों और आयु का क्षय होता है, और आयु पूरी होने पर यानहुआ फ़ानगुन नरक में 100,000 वर्ष तक कर्मफल भोगना पड़ता है।
दूसरे प्रकार के लोग दूषित नीयत रखते हैं, वेश्याओं को अपने नियंत्रण में रखते हैं, स्वयं प्रबल कामना से भरे होते हैं, स्वार्थी होते हैं और विशेष रूप से दूसरों को फँसाने तथा हानि पहुँचाने की योजनाएँ बनाते हैं, इत्यादि। जीवनकाल में उनकी आशीषों और आयु का क्षय होता है। आयु पूरी होने पर वे यानहुआ फ़ानगुन नरक में कर्मफल भोगते हैं। जब तक उनके उत्पीड़न की शिकार सभी वेश्याएँ फिर मानव जन्म न पा लें, तब तक उन्हें नरक से निकलने का अवसर नहीं मिलता। इसके बाद उन्हें पशु योनि में कर्मफल भोगने के लिए डाल दिया जाता है। पशु योनि का कर्मफल समाप्त होने के बाद वे मानव जन्म में भी निम्न और तिरस्कृत अवस्था का फल भोगते हैं।
“ओह! न्यायाधिकारी महोदय, दलाली के इस दुष्कर्म का फल तो बहुत भारी है! आपका स्पष्टीकरण सुनकर मेरे मन में कसक और गहरा दुःख हो रहा है। मुझे इस व्यवसाय में लगे जीवों पर बहुत दया आती है।”
परलोक के न्यायाधिकारी ने कहा, “यह व्यवसाय समाज के आचार-विचार को गंभीर रूप से बिगाड़ता है, नैतिकता, मर्यादा और मानवीय संबंधों के नियमों को नष्ट करता है तथा मनुष्य के अच्छे मूल स्वभाव पर गहरा दुष्प्रभाव डालता है। इसलिए नरक के अधिपति ऐसे दुष्कर्म करने वाले जीवों को कठोर दंड देते हैं। लेकिन मेरी जानकारी के अनुसार बुद्ध और बोधिसत्त्व इन जीवों पर करुणा करते हैं और मानव रूप धारण करके उनके बीच आते हैं, ताकि जिनमें शुभ मूल हैं, उन्हें मार्ग दिखाकर भलाई की ओर लौटा सकें।”
आज के लिए यहीं तक। परलोक के न्यायाधिकारी का आभार! अमिताभ बुद्ध! मैं श्वेत कमल पर बैठकर लौटती हूँ।
इस बार मुझे बहुत प्रसन्नता हुई कि नरक में भी महान प्रण वाले क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व के दर्शन हुए। बोधिसत्त्व का पूरा शरीर सुनहरी प्रभा से घिरा था और उन्होंने मुझे भी अधिष्ठान दिया। उनके प्रण की व्यापक शक्ति सचमुच अचिन्त्य है!
मनुष्यलोक में लौटने पर मैं बहुत थक चुकी थी। हर बार नरक जाने में मूल चेतना और मूल प्राणशक्ति बहुत खर्च होती हैं, इसलिए लौटते ही मुझे मंत्र जपकर उनकी तत्काल पूर्ति करनी पड़ती है।
आशा है कि सभी पाठक इसे उपन्यास समझकर नहीं पढ़ेंगे; तब क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व के इतने कष्टपूर्ण प्रयत्न व्यर्थ नहीं जाएँगे। मैं, आ यू, आप सभी का फिर आभार व्यक्त करती हूँ। नमो महान प्रण वाले क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व महासत्त्व!
7/निकट पारिवारिक संबंधियों के बीच यौन दुराचार को दंडित करने वाले उलटे पहियों और बर्फ़ीले आकाश के नरक तथा रंगीन फूलों और तलवारों के वन के नरक का प्रत्यक्ष वृत्तांत
मैं, आ यू, क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व को साष्टांग प्रणाम करती हूँ! फिर धर्म का लाभ पाकर सचमुच बहुत प्रसन्न हूँ!