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《阴律无情》

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आज के समाज में कर्म और फल की शिक्षा तथा प्राचीन काल की नैतिक शिक्षा का गंभीर अभाव है। प्राचीन काल में स्त्रियों को तीन आज्ञापालनों और चार गुणों का पालन करना होता था। उन्हें स्त्री के सदाचार, वाणी, कामकाज और रूप-सज्जा पर ध्यान देना होता था। पहले स्त्रियों के चलने के ढंग, बाहरी रूप और हाव-भाव तथा बोलने के स्वर तक के नियम थे। पहले स्त्रियाँ घर की दहलीज से तीन कदम भी बाहर नहीं निकलती थीं; आज ऐसा नहीं है। आज अधिकांश स्त्रियाँ समाज में बाहर निकलकर काम करती हैं। उनके पास उच्च शिक्षा और कुशलता से काम करने की क्षमता भी है। कुछ तो कामकाज की योग्यता के सभी पहलुओं में पुरुषों से भी आगे हैं। अब वह समय नहीं रहा जब कहा जाता था कि स्त्री में प्रतिभा न होना ही उसका गुण है। इसलिए आज बहुत-सी स्त्रियाँ, मन में सद्गुण की सोच विकसित करने वाली शिक्षा के अभाव में, इस उन्नत तकनीक के युग के साथ बहते हुए टेलीविज़न और इंटरनेट माध्यमों के प्रदूषण से प्रभावित होकर शील की पवित्रता की उपेक्षा करती हैं।

स्त्री होने के नाते अपने आचरण पर अवश्य संयम रखना चाहिए। जब अपने भावनात्मक जीवन में परिवर्तन आए, तो विशेष रूप से आत्मपरीक्षण करना चाहिए और मर्यादा से बाहर का कोई आचरण नहीं करना चाहिए। अन्यथा शील खो देना यौन दुराचार का अपराध है। यौन दुराचार करने का अर्थ है नरक के असीम, अपार दुखों के अशुभ कारण बोना। यहाँ मेरी कामना है कि संसार की सभी स्त्रियाँ अपने शील की रक्षा कर सकें।

विवाहपूर्व यौन संबंधों की बात करें, तो वे हम मनुष्यों की प्रकाशमय आध्यात्मिक प्रकृति को गंभीर क्षति पहुँचाते हैं। जन्म के समय, कौमार्य की अवस्था में, प्रत्येक व्यक्ति की अपनी आध्यात्मिक प्रकृति प्रकाशमय होती है; केवल उसके प्रकाश की मात्रा अलग-अलग होती है। बाद में मनुष्य लोक के प्रदूषण के साथ यह प्रकाश धीरे-धीरे घटता जाता है और यहाँ तक कि धूसर और अँधेरा हो जाता है। जब वह धूसर और अँधेरा हो जाता है, तो व्यक्ति के जीवन में विपत्तियाँ आने लगती हैं। अवश्य ही, कुछ लोग साधना के माध्यम से अपनी धूसर और अँधेरी आध्यात्मिक प्रकृति को इसी जीवन में फिर से प्रकाशमय बना सकते हैं।

विवाह वास्तव में हम मनुष्यों को वंश आगे बढ़ाने का एक अवसर देता है। मानवीय संबंधों की मर्यादा के अंतर्गत यौन संबंध वंश आगे बढ़ाने के लिए बनाए जाते हैं। सामान्य समय में भी उनकी अति नहीं करनी चाहिए, अन्यथा हमारा पुण्यफल और आयु घटेंगे। परलोक के विधानों के अनुसार मनुष्य को विवाहपूर्व यौन संबंधों पर प्रतिबंध के नियम का कड़ाई से पालन करके अपने सदाचार की रक्षा करनी चाहिए। विवाह के दिन से ही यौन संबंध बनाए जा सकते हैं। यदि विवाह से पहले ही यौन संबंध बनाए जाएँ, तो वह यौन दुराचार का अपराध है। बाद में उसी व्यक्ति से विवाह कर लेने पर भी यह उल्लंघन माना जाता है और इससे पुण्यफल तथा आयु घटते हैं। यदि विवाह से पहले विपरीत लिंग के एक से अधिक व्यक्तियों के साथ यौन संबंध बनाए जाएँ, तो पुण्यफल और भी अधिक घटेगा, और नरक में ले जाने वाले अशुभ कारण भी बनेंगे। विस्तृत निर्णय हर मामले को अलग देखकर और यह जानकर करना होगा कि विशेष रूप से कौन-कौन से यौन दुराचार किए गए थे।

जब हम मनुष्य विवाह से पहले पहली बार यौन संबंध बनाते हैं, अर्थात जिस क्षण अपना कौमार्य खोते हैं, उसी क्षण से हमारी अपनी आध्यात्मिक प्रकृति का प्रकाश मंद पड़ने लगता है। यह मंद पड़ना हमारे अन्य पक्षों में भी गिरावट लाता है, जिसमें पुण्यफल, धन-सौभाग्य और आयु का घटना शामिल है। इसलिए सभी को इस विषय पर ध्यान देना चाहिए। प्रेम और कामना के क्षणिक आवेग में, मन हुआ तो कर लिया—ऐसा करके मनुष्य लोक में जन्म से प्राप्त अपने बहुमूल्य मानव शरीर को व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए। बहुत-से काम ऐसे हैं जिन्हें युवावस्था में ही साधना पड़ता है।

हमें अपनी मानसिक शक्ति और ऊर्जा कुछ सार्थक कामों में लगानी चाहिए। उन्हें अपने प्रेम और कामना की आसक्ति में नहीं खपाना चाहिए। ऐसा करना न केवल निरर्थक है, बल्कि नरक में ले जाने वाले अशुभ कारण भी बोता है।”

“अच्छा, आ यू! आज के लिए इतना ही। अभी लौट जाओ, अगली बार फिर आना।”

“अमिताभ बुद्ध! परलोक के न्यायाधिकारी, आपकी शिक्षा के लिए आभार!”

मैं, आ यू, हाथ जोड़कर और झुककर आभार व्यक्त करती हूँ! श्वेत कमल पर सवार होकर लौटती हूँ!

26/परलोक के विधानों में जीवित मनुष्यों की बिजली गिरने से मृत्यु का रहस्य

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