मैं परलोक के न्यायाधिकारी की शिक्षाओं के लिए आभारी हूँ! श्वेत कमल पर सवार होकर घर लौट गई।
16/1900 से भी अधिक वर्ष पहले पश्चिमी हान काल में कामोत्तेजक चित्र बनाने वाले आज तक महानरक में कैद होकर दुःख भोग रहे हैं!
बुद्ध के करुणामय विविध उपायों के लिए आभार, जिनसे वे सत्त्वों का मार्गदर्शन और उद्धार करते हैं तथा सभी के लिए साधना के तरह-तरह के अवसर बनाते और जुटाते हैं। साधना में आगे न बढ़ना पीछे हटना है। सचमुच लज्जा आती है—कल रात मुझे नरक जाना था, लेकिन थकान के कारण टाल दिया। इस अवसर पर बुद्धों और बोधिसत्त्वों के सम्मुख अपनी भूल स्वीकार करके क्षमा प्रार्थना करती हूँ। बुद्ध ने अनेक सूत्रों में हम सभी को सिखाया है कि कैसे परिश्रमपूर्वक आगे बढ़ें और कैसे शील का पालन करें। लज्जित हूँ, लज्जित हूँ!
‘अवतंसक सूत्र’ में बुद्ध ने कहा: “हे बुद्धपुत्र! बोधिसत्त्व महासत्त्व दस प्रकार से अथक प्रयत्न करते हैं। वे दस कौन-से हैं? सभी सत्त्वों को शिक्षा देने में अथक प्रयत्न; सभी धर्मों में गहराई तक प्रवेश करने में अथक प्रयत्न; सभी लोकों को विभूषित और शुद्ध करने में अथक प्रयत्न; बोधिसत्त्वों द्वारा सीखी जाने वाली सभी साधनाओं का अभ्यास करने में अथक प्रयत्न; सभी सत्त्वों की बुराई मिटाने में अथक प्रयत्न; तीनों दुर्गतियों के समस्त दुःख शांत करने में अथक प्रयत्न; सभी मारों को परास्त करने में अथक प्रयत्न; सभी सत्त्वों के लिए निर्मल नेत्र बनने का प्रण निभाने में अथक प्रयत्न; सभी बुद्धों की पूजा और उन्हें अर्पण करने में अथक प्रयत्न; तथा सभी तथागतों को प्रसन्न करने में अथक प्रयत्न। ये दस हैं। यदि बोधिसत्त्व इन धर्मों में दृढ़ता से स्थित रहें, तो वे तथागत की अनुत्तर वीर्य पारमिता को पूर्ण रूप से प्राप्त करेंगे।” मुझे लगता है कि अध्ययन और साधना में परिश्रमपूर्वक आगे बढ़ने के मामले में मुझमें अब भी कमियाँ हैं। सचमुच मुझे दुगुने उत्साह से आगे बढ़ना चाहिए।
अब ‘महारत्नकूट सूत्र—बोधिसत्त्वपिटक सभा’ में देखें। बुद्ध ने कहा: “न भय है, न आतंक, न घबराहट, न आशंका। चार प्रकार का दृढ़ और साहसी सामर्थ्य विकसित होता है। बोधिसत्त्वपिटक के सूक्ष्म धर्ममार्गों में परिश्रम और बढ़ता है। न उनका त्याग होता है, न उन्हें छोड़ा जाता है, न उनसे दूरी होती है, न अलगाव। प्रखर श्रद्धायुक्त समझ, दृढ़ श्रद्धायुक्त समझ, दृढ़ सहनशीलता और दृढ़ सम्यक् प्रयास पूर्ण रूप से सिद्ध होते हैं। शारिपुत्र, मैं तुम्हारे लिए दृढ़ क्षान्ति और दृढ़ सम्यक् प्रयास के उपायों के दृष्टांत बताऊँगा, ताकि बोधिसत्त्व दृढ़ क्षान्ति और दृढ़ सम्यक् प्रयास प्राप्त करें और शरीर तथा प्राणों की चिंता किए बिना बोधिसत्त्व मार्ग पर चलें।”10 सचमुच लज्जा आती है। लगातार कुछ बार नरक जाने पर ही मैं थक गई। बुद्धों और बोधिसत्त्वों की शिक्षा के महान उपकार के सामने लज्जित हूँ। मुझे शील का भली-भाँति पालन करने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए, परिश्रमपूर्वक साधना करनी चाहिए और बुद्धों तथा बोधिसत्त्वों के उपकार का प्रतिदान करना चाहिए। यह भी कामना है कि सभी असीम सामर्थ्य प्राप्त करें, साहस और उत्साह के साथ आगे बढ़ें, सम्यक् प्रयास में तत्पर रहें और उनका शील उज्ज्वल मणि के समान हो।
प्रस्थान से पहले मैंने देखा कि मेरे पैरों के नीचे एक और कमल आ गया था। धर्मपालों के प्रति आभार! बुद्ध और बोधिसत्त्व सदा करुणामय होते हैं! आज एक और कमल होने से गति बहुत तेज़ थी। एक क्षण में ही नरक पहुँच गई। मैंने परलोक के न्यायाधिकारी को प्रणाम किया। वे पहले से मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे।
आज मैं परलोक के न्यायाधिकारी से उन मालिकों के कर्मफलों के बारे में पूछना चाहती थी जो अश्लील पुस्तकें लिखते, छापते और बेचते हैं, अश्लील फ़िल्में बनाते हैं तथा अश्लील डिस्क तैयार करते हैं। अश्लील फ़िल्मों में अभिनय करने वालों के कर्मफल और कामोत्तेजक औषधियों जैसी यौन दुराचार में सहायक वस्तुएँ बेचने के कर्मफल भी जानना चाहती थी।
परलोक के न्यायाधिकारी तुरंत मुझे एक नरक दिखाने ले गए जिसका नाम था ‘यानहुआ फ़ानगुन नरक’। बातचीत के दौरान ही हमें एक अलग तरह का वातावरण महसूस होने लगा। वह बहुत नकारात्मक था; कहना चाहिए कि वह कामुकता का प्रभाव था। पूरे नरक में पहले ही असीम यिन का प्रभाव भरा हुआ था, लेकिन इस ओर के नरक में कामुकता का प्रभाव यिन के प्रभाव से बहुत, बहुत अधिक था—मानो उसने यिन के प्रभाव को ढक लिया हो। साथ ही एक तीखी, सड़ी और मछली जैसी दुर्गंध भी थी। यदि सबको बताना न होता, तो मैं सचमुच वहाँ देखने नहीं जाना चाहती।
हम पहुँच गए। फिर वही ज़ोर-ज़ोर से चीखने और पीड़ा से कराहने की आवाज़ें थीं। यहाँ बहुत-सी स्त्री और पुरुष आत्माएँ थीं। वे आपस में बातें नहीं करती थीं, न संवाद करतीं, न हालचाल पूछतीं और न एक-दूसरे को ढाँढ़स बँधाती थीं। यहाँ तक कि एक साधारण-सा वाक्य, “क्या तुम्हें कष्ट हो रहा है?” भी नहीं कहती थीं, क्योंकि सभी निरंतर नरक का कर्मफल भोग रही थीं।
मैंने उनमें से एक आत्मा को बहुत छोटी-सी कुर्सी पर देखा। वह दोनों हाथ कुर्सी पर टिकाकर उल्टी खड़ी थी—सिर नीचे और पैर ऊपर। यह मुद्रा बहुत ही असामान्य थी! फिर वह नीचे गिरकर मर जाती, दोबारा जीवित होती और फिर वही करती। परलोक के न्यायाधिकारी ने कहा कि यह जीवित रहते अश्लील पुस्तकों में ऐसे कृत्यों का वर्णन करने का शौक रखने का कर्मफल था, जिनमें स्त्री उल्टी होती है और पुरुष खड़ा होकर यौन दुराचार करता है।