मैं, आ यू, हाथ जोड़कर परलोक के न्यायाधिकारी का आभार व्यक्त करती हूँ! श्वेत कमल पर सवार होकर लौटती हूँ।
29/दिव्य मणि के मंत्र की असीम शक्ति—दक्षिण के तीन पवित्र महात्माओं को नरक के घोर दुःखों से जीवों का उद्धार करते हुए प्रत्यक्ष देखना
जब से मैंने 《परलोक के अटल विधान》 लिखने का निश्चय किया है, तब से लगातार अनेक बाधाएँ आती रही हैं। जब हम लोगों के मन को शुद्ध करने और उन्हें भलाई की ओर प्रेरित करने के काम का संकल्प लेते हैं, तो हमें तरह-तरह की परीक्षाओं का सामना अवश्य करना पड़ता है। लेकिन भलाई की ओर प्रवृत्त अत्यंत सच्चा और शुद्ध मन किसी भी परीक्षा या बाधा से बिल्कुल नहीं डरता। मुझे, आ यू को, विश्वास है कि यदि शील-पालन का संकल्प दृढ़, अत्यंत सच्चा और शुद्ध बनाए रखा जाए, तो बुद्ध और बोधिसत्त्व अवश्य अधिष्ठान देंगे, जिससे बाधाएँ टूटेंगी। इन तरह-तरह की बाधाओं का उद्देश्य यही है कि मैं 《परलोक के अटल विधान》 लिखना बंद कर दूँ।44
जब मैंने लिखना शुरू किया था, तब मार-बाधाएँ विशेष रूप से अधिक थीं। मैं पहले ही बहुत कम सोती थी, और मानवेतर प्राणी हमेशा मेरे सोते समय आकर बहुत व्यवधान डालते और मेरी ऊर्जा क्षीण करते थे। बाद में जब उनका उद्देश्य समझ में आया, तो मैंने सपनों में उन मानवेतर प्राणियों से उलझना बंद कर दिया। इससे ऊर्जा व्यर्थ जाती थी और पुस्तक का लेखन प्रभावित होता था। क्योंकि 《परलोक के अटल विधान》 लिखने का काम मैं तभी कर सकती हूँ, जब मेरी अवस्था सबसे अच्छी हो।
हाल में कुछ शारीरिक पीड़ा सहनी पड़ी है, इसलिए अब मुझे अपना मनोबल स्वयं मज़बूत करना शुरू करना होगा। आज मैं, आ यू, सभी बाधाओं और शारीरिक पीड़ा को साधना की प्रेरक शक्ति में बदलूँगी। मेरी कामना है कि संसार के सभी प्राणियों की बाधाएँ और कष्ट मैं अकेली उनके स्थान पर सहूँ, और वे सब मेरी, आ यू की, साधना की प्रेरक शक्ति बन जाएँ।
मुझे इतने मनोयोग से शिक्षा देने वाले मेरे उपकारी गुरु को साष्टांग प्रणाम! सद्धर्म की साधना करके महान सिद्धियाँ प्राप्त करने वाले सभी पूर्वाचार्यों और महागुणी साधकों को साष्टांग प्रणाम!
दसों दिशाओं के सभी बुद्धों और बोधिसत्त्वों को साष्टांग प्रणाम! क्षितिगर्भ महाबोधिसत्त्व को साष्टांग प्रणाम!
आज मैं, आ यू, क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व के दिव्य प्रताप और अधिष्ठान-बल के सहारे बाधाएँ पार करके नरक जाऊँगी और वहाँ क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व को नरक के प्राणियों का उद्धार करते हुए प्रत्यक्ष देखूँगी, ताकि उसका यथार्थ वृत्तांत लिख सकूँ!
नमो क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व! नमो क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व! नमो क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व! नमो महान प्रणिधानधारी क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व! नमो महान प्रणिधानधारी क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व! नमो महान प्रणिधानधारी क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व!
मैं, आ यू, भी क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व का अनुकरण करके दुःखों से पीड़ित प्राणियों को दुःख-सागर से पार उतारूँगी। 《परलोक के अटल विधान》 यथाशीघ्र प्रकाशित होना ही चाहिए, ताकि मनुष्यलोक के भ्रमित और भटके हुए प्राणी मुड़कर मुक्ति के तट पर पहुँचें, बुराई छोड़कर भलाई अपनाएँ और अपनी जन्मजात आत्मिक चेतना का प्रकाश शीघ्र पुनः प्राप्त करें।