घर पर यकृतशोथ से मेरी मृत्यु हुई। बैलमुख और अश्वमुख मुझे घसीटकर नरक लाए। यमराज अत्यंत क्रुद्ध हुए। उन्होंने कहा कि मैंने जीवित रहते कठोर वाणी से लोगों को चोट पहुँचाई, सास को मारा-पीटा और गालियाँ दीं, आकाश-पृथ्वी को कोसा। यह सास के प्रति कर्तव्यहीनता, अन्याय, सत्यनिष्ठा की कमी, निर्लज्जता, अशिष्टता और अनादर का अपराध था। उन्होंने मुझे 400 वर्ष के लिए विषैले साँपों और आँतों में कील ठोकने के नरक में दंड दिया। लगता है मुझे यहाँ बहुत-बहुत लंबा समय हो गया है। यहाँ की पीड़ा सचमुच अतुलनीय है! जीते जी मैं सोचती थी कि ज़ोर से बोलकर और उग्र होकर आसपास के लोगों को दबा सकती हूँ। अब आखिर समझ गई कि मैं गलत थी। ‘हूँ-हूँ-हूँ’, सचमुच बहुत पीड़ा है!
श्याओ युज़ि! आप नरक कैसे आईं? आपसे विनती है, मुझे बचाकर बाहर ले चलिए!”
तभी यक्ष ने खूंखार स्वर में ऊँचे से कहा, “अब बकवास नहीं! तुरंत वापस जाकर दंड भोगो। आ यू नरक देखने आई हैं और संसार के लोगों के उद्धार के लिए पुस्तक लिखने में व्यस्त हैं। तुम्हारी बकवास सुनने का समय नहीं है। अभी निकलती क्यों नहीं?” यक्ष का काँटा तुरंत उस पर पड़ा।
मेरे मन में तीखी पीड़ा उठी। न्यायाधिकारी ने मेरा दुखभरा चेहरा देखकर यक्ष को रोक दिया और कहा कि आत्मा को थोड़ी देर और बोलने दें, देखें वह और क्या कहना चाहती है।
स्त्री आत्मा काँपते हुए, बहुत पीड़ा में रोकर बोली, “श्याओ युज़ि! क्या आप मुझे अपने साथ पुस्तक लिखने ले जा सकती हैं? हमारे गृहनगर में सब जानते हैं कि बचपन से दादी के संस्कार और शिक्षा से आपका स्वभाव दूसरों की सहायता करने वाला था। श्याओ युज़ि, मुझे विश्वास है कि आप मुझे अवश्य बचाएँगी; आप मुझे मरती देखकर नहीं छोड़ेंगी। हमारा मेलजोल भले कम रहा हो, हम पड़ोसी तो रहे हैं। मुझे साथ ले चलिए, हम पुस्तक लिखकर लोगों को कठोर वाणी न बोलने की शिक्षा दें। मैं आपके लिए अवश्य गवाही दूँगी कि कैसे तरह-तरह की कठोर वाणी के अपराध करके नरक में दुख भोगने आई। लोगों को कठोर वाणी से रोकने में आपकी सहायता करूँगी। विनती है, मुझे बाहर निकालिए!”
“आंटी, अमिताभ बुद्ध! आपको नरक में गिरा देखकर बहुत दुख हो रहा है। मैं भी चाहती हूँ कि जल्द-से-जल्द आपको बाहर निकाल सकूँ, लेकिन मेरे पास आपको बाहर ले जाने की शक्ति नहीं है। मैं बुद्ध के अधिष्ठान-बल पर निर्भर होकर नरक के दर्शन और ‘परलोक के अटल विधान’ पुस्तक के लेखन के लिए आई हूँ। पुस्तक कौन लिखेगा, यह बुद्ध ने तय किया है; मुझे निजी रूप से किसी को नियुक्त करने का अधिकार नहीं। मैं पंचशील का पालन करने वाली, बुद्ध-नाम स्मरण करने वाली और शुद्ध शाकाहार अपनाने वाली बौद्ध शिष्या हूँ। आंटी, आप भी बुद्ध-नाम स्मरण और पश्चात्ताप का संकल्प कीजिए! पुस्तक-लेखन का पुण्य मैं अवश्य आपको समर्पित करूँगी, ताकि आप शीघ्र दुख से मुक्त होकर सुख पाएँ, शुद्धभूमि में ऊपर उठें और कमल से जन्म लें। मैं इन माननीय न्यायाधिकारी से आपकी ओर से प्रार्थना करने का प्रयास करूँगी; आशा है कुछ सहायता हो सके!”
तब स्त्री आत्मा बोली, “न्यायाधिकारी से विनती है! न्यायाधिकारी से विनती है! मैं आपके चरणों में सिर झुकाती हूँ। मैं मरने योग्य हूँ! मरने योग्य हूँ! जीते जी कोई अच्छा काम नहीं किया। अब बहुत इच्छा है कि श्याओ युज़ि की तरह लोगों के लिए कुछ अच्छा करूँ। आपसे विनती है, मुझे सचमुच अपनी गलती समझ आ गई है!”
न्यायाधिकारी बोले, “जीवित रहते तुमने कठोर वाणी से लोगों को चोट पहुँचाई और सास को मारा, डाँटा तथा अपमानित किया। यह परलोक के नियमों के अनुसार सास के प्रति गंभीर कर्तव्यहीनता है। परलोक के विधान छलियों और दुष्टों को दंडित करते हैं। नरक में गिराने वाला अकुशल कर्म कर लिया तो नरक का विधान तुम्हें दृढ़ता से बाँधकर रखेगा; सारे अकुशल कर्म घिसकर समाप्त होने पर ही बाहर निकल सकती हो। परलोक के कानून यहाँ के किसी कर्मचारी को जानने या व्यक्तिगत संबंध के कारण दंड कम नहीं करते। पिता-पुत्र जैसे निकटतम संबंध में भी कोई पारिवारिक पक्षपात नहीं है। परलोक के नियमों का उल्लंघन करने वाले हर व्यक्ति को दंड मिलना ही है। जिसे हानि पहुँचाई वह तुम्हें क्षमा कर दे, तुम्हारी सास कोई जिम्मेदारी न ठहराए और तुम्हारी कर्तव्यहीनता क्षमा कर दे, तब भी निष्पक्ष और न्यायपूर्ण परलोक-विधान तुम्हें नहीं छोड़ेंगे। उनके कर्मफल-नियम मनुष्य की आयु और पुण्यफल समाप्त होने तक प्रतीक्षा करते हैं, फिर बैलमुख और अश्वमुख निर्दयता से उसे नरक में दंड भोगने लाते हैं। अभी तुममें कुछ समय के लिए पश्चात्ताप उठा है, यह मैं भी जानता हूँ। आज तुमने बहुत सहयोग किया है, इसलिए मैं यक्ष से तुम्हारा एक बार सहयोग और पश्चात्ताप करना दर्ज करने को कहूँगा, जिसे परलोक में एक बार धर्म सुनने के बराबर माना जाएगा। जीवित रहते तुमने सास के प्रति कर्तव्य नहीं निभाया, इसलिए अब तुम्हारे वंशज उचित सिद्धांत और विधि से भलाई तथा सद्गुण का संचय करके तुम्हें समर्पित नहीं कर रहे। तुम्हारे और आ यू के बीच किसी पिछले जन्म में दूर का पारिवारिक रिश्ता था; वही कारण-प्रत्यय पकने से आज थोड़ी देर मिलने का अवसर मिला है। आशा है इस अनित्य शुभ संयोग को सँभालोगी।
परलोक सच्चे पश्चात्ताप करने वालों को धर्म सुनकर मुक्त होने का अवसर भी देता है। लेकिन पहली शर्त है कि तुम्हारे अपने पश्चात्ताप के विचार एक निश्चित उजाले तक पहुँचें। यक्ष वह प्रकाश देखकर स्वाभाविक रूप से तुम्हें क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व का उपदेश सुनने ले जाएँगे। धर्म सुनने का यह श्रेष्ठ अवसर भी सबके लिए समान है। कुछ समय तक सच्चा पश्चात्ताप करोगी तो स्वाभाविक रूप से यक्ष आएँगे, दंड अस्थायी रूप से रोकेंगे और धर्म सुनने ले जाएँगे। हर बार सुनने का यक्ष अभिलेख रखते हैं। प्रत्येक बार क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व की करुणामय धर्मध्वनि तुम्हारे आत्मिक स्वभाव को धोकर भलाई की ओर बदलती और अधिष्ठित करती है। अभी तुम्हारे पश्चात्ताप का प्रकाश पर्याप्त नहीं है। पहले लौटकर अपने कर्मबल को अच्छी तरह क्षीण करो।”
यक्ष ने फिर खूंखार स्वर में स्त्री आत्मा से कहा, “आज तुम्हारा भाग्य अच्छा था! न्यायाधिकारी मिले और इतना समझाया। जल्दी लौटकर दंड भोगो!” और फिर एक लात मारी। अरे! यक्ष, ओ यक्ष! हमेशा इतने उग्र, इतने रूखे! यहाँ हर यक्ष खूंखार है! आह! नरक में दुख भोगने कभी मत गिरना; हर ओर केवल दयनीय दशा है!