उबलते पानी से जीभ और आँतें पक जाने तथा कठोर बर्फ़ से कुचल जाने के बाद कंप्यूटर से दोनों सिरों पर नुकीली छोटी लोहे की कीलें उड़कर निकलतीं और घनी कतारों में जीभ और आँतों में धँस जातीं। तब विषैले साँप जीभ और आँतों को मुँह में पकड़कर सब वापस अपराधी आत्माओं के मुँह में ठूँस देते। वे पीड़ा से चीखतीं, ज़मीन पर लोटतीं और कराहतीं। इस प्रकार आत्माएँ बिना विश्राम लगातार यही यातना चक्र भोगती रहती थीं।
कठोर वाणी के इस नरक में दंड की गति अत्यंत तेज़ थी; देखकर आँखें चकरा जाती थीं। शब्दों में समझाने की क्षमता बहुत सीमित है। फिर भी मैं जितना संभव हो बता रही हूँ, ताकि सब जानें। वास्तविक दर्शन में और भी बहुत-से दंड थे, लेकिन समय सीमित होने से उनका एक-एक करके वर्णन नहीं कर सकती।
तभी एक स्त्री आत्मा अचानक मेरी ओर घुटनों के बल बैठकर ज़ोर-ज़ोर से सिर झुकाने लगी। यक्ष उसे छोड़ने वाला नहीं था; उसने बेरहमी से लात मारकर उसे कंप्यूटर के पास लौटा दिया। आह! नरक सचमुच अमानवीय है! वह स्त्री आत्मा कितनी दयनीय थी! तब न्यायाधिकारी ने यक्ष से कहा कि उसे मेरे पास लाए, ताकि मैं उससे पूछकर लेख लिख सकूँ। यक्ष उसे उठाकर ले आया।
स्त्री आत्मा मेरे सामने घुटनों के बल बैठकर बोली, “श्याओ युज़ि, मुझे बचाओ! श्याओ युज़ि, मुझे बचाओ! श्याओ युज़ि, मुझे बचाओ! आप निश्चित रूप से श्याओ युज़ि हैं!” श्याओ युज़ि मेरा बचपन का नाम था, जिससे दादी के घर रहते समय सब मुझे बुलाते थे। उस शहर को छोड़े मुझे बीस वर्ष से अधिक हो चुके थे। सामने यह महिला कौन थी? निश्चित रूप से बचपन की कोई पड़ोसिन होगी।
मैं उस समय स्तब्ध होकर बोली, “क्षमा कीजिए! हम पहले अवश्य मिले होंगे। क्या आप मेरी दादी की मित्र हैं? बहुत लंबे समय से किसी बड़े ने मुझे इस नाम से नहीं पुकारा। कृपया बताइए, आप यहाँ कैसे आईं?”
दादी के देहांत के साथ यह बचपन का नाम मानो पूरी तरह चला गया था। सोचा न था कि आज नरक में किसी को फिर इसी नाम से पुकारते सुनूँगी। पुराने जीवन के दृश्य उभर आए, जैसे समय पीछे लौट गया हो। एक क्षण में दुख हृदय पर उमड़ आया।
स्त्री आत्मा ने कहा, “श्याओ युज़ि! आपका मुझे न याद रखना स्वाभाविक है। आपकी दादी से मेरा अधिक मेलजोल नहीं था। हम अधिक दूर नहीं रहते थे, पर मेरा घर सबके आने-जाने के रास्ते में था। बचपन में आपको उछलते-कूदते चलना बहुत पसंद था। आप गुज़रतीं तो कदमों की आवाज़ सुनते ही मैं पहचान जाती। अक्सर आप मेरे घर के सामने से जातीं, मैं बैठक में काम करती होती और आपका पार्श्व-चेहरा देखती। तब मेरी दोनों बेटियाँ पूछती थीं: श्याओ युज़ि रोज़ खेल सकती है, जबकि हमें रोज़ बिना रुके इतना घर का काम क्यों करना पड़ता है? मैं बेटियों को कठोर वाणी में डाँटती, ‘तुम जन्म से ही नीच और बदनसीब हो, गरीब घर में पैदा हुईं और छोटे मकान में रहती हो; सब की सब अल्पायु अभागिनें! तुमने कुछ अच्छा भी नहीं किया, लड़कियाँ पैदा हुईं। लड़के होतीं तो रोज़ खेलने भेजती। अभी जाकर काम क्यों नहीं करतीं? इसमें ईर्ष्या करने जैसा क्या है? श्याओ युज़ि के घर में बस थोड़ा अधिक घटिया पैसा है। मकान बड़ा होने से क्या, उसमें रहने वाले नहीं। रोज़ खेलती है तो कौन-सा बड़ा काम है? वह भी तुम्हारी तरह कमआयु वाली है, लड़का तो नहीं बन जाएगी।’”
“आपकी दादी हमारे इलाके में अपनी ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध थीं और लोगों की सहायता खुशी से करती थीं। उनके पास जो भी चीज़ होती, दूसरों को उपयोग के लिए अवश्य दे देतीं; लौटाएँ न लौटाएँ, कोई बात नहीं। पर बहुओं के एक-एक करके घर आने के बाद उन्हें उनकी नज़र बचाकर चीज़ें देनी पड़ती थीं, नहीं तो बहुएँ डाँटतीं। उन्होंने बहुओं की तरह-तरह की प्रताड़ना सहन की। तब मैं हमेशा सोचती थी कि आपकी दादी इतनी सीधी थीं, इसलिए घर की कई बहुएँ उन्हें लंबे समय तक दबाती रहीं। मुझे और उग्र होना चाहिए, ताकि कोई मुझे न दबा सके। आपकी दादी कहती थीं कि आपके जन्म से वे बहुत अधिक प्रसन्न हुईं। वे अक्सर लोगों को आपके दृढ़ और विशेष रूप से लड़कों जैसे स्वभाव के बारे में बताती थीं। अभी आपका पार्श्व-चेहरा देखकर अचानक मुझे लगा कि आप ही श्याओ युज़ि हैं। क्या आपको बीस वर्ष पहले अपने गृहनगर की वह घटना याद है जिसमें एक बहू ने अपनी सास की उँगली दाँतों से काटकर अलग कर दी थी?”
आ यू: “आह! याद आया, तो आप वही आंटी हैं! वह घटना बहुत प्रसिद्ध थी। मैंने सुना था, लेकिन पता नहीं था कि कौन थी। तब मैं छोटी थी, बड़ों की बातें नहीं समझती थी। दादी से सुना था कि आपके और सास के बीच मेल नहीं था। लगता है आपकी सास पोता गोद में लेना चाहती थीं, पर आपके लगातार दो बेटियाँ हुईं। यह भी सुना था कि आप दोनों अक्सर झगड़ती थीं। लेकिन आंटी, आपकी उम्र तो अधिक नहीं थी; आप इतनी जल्दी नरक कैसे आ गईं?”
स्त्री आत्मा दुख से रोकर बोली, “जीवित रहते मेरा मिज़ाज बहुत खराब था। मैं रोज़ कठोर शब्दों से लोगों को गालियाँ देती थी; किसी को भी डाँट देती थी। थोड़ी-सी बात मनमुताबिक न होती तो मैं ऊँची आवाज़ में तीखे, कटु शब्दों से क्रोधपूर्वक अपमान करती। मौसम खराब होने से मेरे काम में बाधा आती तो आकाश को भी कोसती, ‘मर जा, घटिया आसमान! यह मनहूस बारिश करता है, परेशान करके मार डाला!’ सास और बेटियों को तो रोज़ डाँटती थी। जब आप गृहनगर में थीं, मेरे विवाह को अधिक समय नहीं हुआ था। सास तब जवान ही थीं, फिर भी मैंने उनकी उँगली दाँतों से काटकर अलग कर दी थी। बाद में मैं और संतान पैदा नहीं कर सकी, तो मनःस्थिति और मिज़ाज और खराब हो गए। सास मेरे सामने टिक ही नहीं सकती थीं। मैं रोज़ उन्हें ‘बुढ़िया जो मरती ही नहीं’ कहती। बाहर जाना चाहतीं तो कहती, ‘बूढ़ी वेश्या, बूढ़ी चुड़ैल, पुरुष खोजने जा रही है! बाहर मर गई तो मैं लाश नहीं उठाऊँगी।’ वे हमेशा गुस्से में कुछ जवाब देकर ही जातीं। हर बार वे मुझसे हारतीं; जीत मेरी ही होती। कभी मैं उन्हें मारकर सिर फोड़ देती और खून बहता। विवाह करके आते ही उँगली दाँतों से काटकर अलग करना उन्हें शुरू में ही दबाने के लिए था।