‘दमकना’ दीपों का प्रकाश, ‘वेदी खोलना’ दैवी लेखन की वेदी बनाना, ‘शिक्षा प्रकट करना’ सुधार के सिद्धांत समझाना है। विपत्तियाँ बार-बार आने से शहर-गाँव के सभी लोग उत्साह से धन देकर वेदियाँ और अनुष्ठान करते हैं, ताकि विपत्ति पलटे।
यह खोई भेड़ के बाद बाड़ सुधारना और स्वर्ग की इच्छा बदलना ही है।
वेदी पर शिक्षा देने का उद्देश्य स्वर्गीय निर्णय पलटना है। यह भेड़ खो जाने के बाद बाड़ की मरम्मत करके अपना मानवीय प्रयत्न पूरा करने जैसा है।
मैं कठिन समझाइश से पीछे न हटकर धर्म कहता और लोगों को पार लगाता हूँ।
सम्राट कहते हैं: मैं परिश्रम से नहीं बचता; ग्रंथ और मर्यादा के नियम बोलकर केवल लोगों को मन बदलकर भलाई अपनाने की ओर ले जाना चाहता हूँ।
इसे मात्र औपचारिक लेख समझो तो विपत्तियाँ तुरंत साथ आती दिखेंगी।
‘औपचारिक’ केवल संख्या पूरी करने वाला, महत्त्वहीन है। सूत्र को महत्वहीन लेख समझकर दूसरों का विश्वास रोकें तो आपदाएँ तत्काल साथ आएँगी, तभी उस मनमानी को चेतावनी मिलेगी।
इसे निरर्थक भ्रम कहो तो बिजली तुरंत शरीर चीरती दिखेगी।
‘निरर्थक’ आधारहीन है। सूत्र को निराधार बताकर लोगों में संदेह और अविश्वास फैलाए तो कड़कती बिजली और उसकी आग तुरंत शरीर को कई भागों में तोड़ देती हैं, जिससे बुराई प्रकट होती है।165
मातृसमान करुणा पर आठ अमर हाथ जोड़ें; हृदय के पूरे समर्पण पर पाँच वृद्ध सिर उठाएँ।