वर्तमान में बनता हुआ भविष्य
किसी बात को कहने से पहले मन में उसे कहने का आग्रह उठता है। उस क्षण कोई दूसरों की सहायता करना चाहता है, कोई प्रशंसा पाना और कोई अपना रोष निकालना। आगे शब्द कैसे चुने जाएँगे और उनका किस पर क्या असर पड़ेगा, इसका आरंभ इसी भीतर के उद्देश्य से होता है। चीनी बौद्ध सदाचार-ग्रंथ इसलिए बाहरी व्यवहार के साथ मन की दिशा पर भी ध्यान देते हैं। उठे हुए विचार में बार-बार रुचि लेना, उसके अनुसार बोलना या काम करना, और उसकी हानि पहचानकर उसे छोड़ देना—इन चुनावों के परिणाम अलग होते हैं। सत्य बोलने की तैयारी संबंध में भरोसे का सहारा बन सकती है; दूसरे को नीचा दिखाने की इच्छा उसी संबंध को चोट पहुँचाती है। कही हुई बात फिर केवल बोलने वाले के पास नहीं रहती। सुनने वाला उसे याद कर सकता है, आगे कह सकता है और उससे प्रभावित होकर कोई काम कर सकता है। विचार, वाणी और प्रसार का यह क्रम समझने से अपने उत्तरदायित्व का विस्तार सामने आता है। सुधार भी मन में उद्देश्य पहचानने से शुरू होकर बोलने और करने के ढंग तक जाता है।
उद्देश्य और चुनाव
मसलन, कोई अपुष्ट संदेश मिला। उसे पढ़ते समय मन में संदेह उठ सकता है, कुछ जोड़कर आगे भेजने की उत्सुकता हो सकती है या रुककर बात की जाँच करने का निर्णय हो सकता है। सहायता के लिए सही सूचना पहुँचाना और अनुमान जोड़कर किसी की बदनामी करना, बाहर से भेजने का एक ही काम लग सकते हैं। पहले अध्याय के काले वस्त्र वाले उदाहरण की तरह यहाँ भी उद्देश्य दिशा बदलता है। विचार उठना, उसे स्वीकार करना, उसमें आनंद लेना और फिर काम में उतारना, एक क्रम के अलग पड़ाव हैं। हर पड़ाव पर मन के सामने चुनाव रहता है। पुस्तक अकेले में अपने विचारों को सँभालने पर भी जोर देती है। चीनी ‘शेन-दु’ (慎独) में इसी एकांत की सावधानी और आंतरिक ईमानदारी का भाव है। कोई दूसरा देख रहा हो या न हो, व्यक्ति स्वयं जान सकता है कि वह जानकारी की मदद से किसका हित चाहता है और किस बात को बहाने की तरह इस्तेमाल कर रहा है। उस उद्देश्य को साफ़ देखने पर रुकने या सही बात आगे पहुँचाने का अवसर मिलता है।
पहचान, विराम और पश्चात्ताप
अश्लील सामग्री देखने पर दिया गया उत्तर इस क्रम की एक विशेष स्थिति खोलता है। मूल प्रश्न अविवाहित स्त्री-पुरुषों का है जिन्होंने अभी यौन संबंध नहीं बनाया है। न्यायाधिकारी उनके देखने को भी कामाचार की मर्यादा का उल्लंघन कहते हैं और सौभाग्य, आयु तथा प्रतिष्ठा में कमी बताते हैं। एक बार देखने पर एक महीने की आयु, और देखते रहने पर एक वर्ष या उससे अधिक घटने का कथन है। साथ ही, केवल देखने तक सीमित रहकर आगे व्यवहार न किया हो और समय रहते सच्चा पश्चात्ताप किया जाए, तो दोष हल्का होने की बात है। घटना की शर्त और सुधार की संभावना दोनों उसी उत्तर के भाग हैं। एक अन्य प्रसंग में चोरी का विचार उठते ही उसे गलत समझकर पश्चात्ताप और त्याग का अवसर आता है। काम अलग हैं, पर दोनों में यह देखा गया है कि मन की पहली दिशा आगे किस तरह बढ़ी। हानि समझने पर रुकना और फिर वैसा आकर्षण सामने आने पर अपने निर्णय पर टिकना, एक बार की सजगता को धीरे-धीरे अभ्यास बनाता है।
काय, वचन और मन
मन में रखा गया इरादा, मुँह से कही गई बात और शरीर से किया गया काम बौद्ध शिक्षा में कर्म के तीन क्षेत्र हैं: मन, वचन और काय। पाँच शील इन क्षेत्रों में संयम का आधार देते हैं—जीवन की रक्षा, दूसरे की वस्तु का सम्मान, यौन आचरण की मर्यादा, सत्य वचन और मदिरा का त्याग। दस कुशल कर्म उसी दिशा को अधिक स्पष्ट करते हैं। शरीर के तीन संयम प्राण-हानि, चोरी और अनुचित कामाचार से विरति हैं। वाणी के चार में झूठ, फूट डालना, कठोर अपमान और भटकाने वाली लुभावनी या निरर्थक बात छोड़ना आता है। मन के तीन संयम लोभ, द्वेष और मोह से विरति हैं। इनके अभ्यास में करुणा, उदारता, संबंधों में निष्ठा, सत्य, मेल कराने वाली बात, कोमल और सार्थक वाणी, संतोष, मैत्री तथा स्पष्ट समझ विकसित होते हैं। पुस्तक इन शिक्षाओं को घर और दफ़्तर के परिचित कामों तक लाती है। मित्र के विषय में क्या कहा, दूसरे की वस्तु कैसे ली, किस सामग्री को प्रकाशित किया—ऐसे छोटे दिखाई देने वाले चुनाव बार-बार हों तो मन के स्थायी अभ्यास बन जाते हैं।
वाणी का उद्देश्य और सच स्वीकार करना
सत्य वचन की चर्चा में न्यायाधिकारी ऐसी परिस्थितियाँ भी रखते हैं जहाँ बोले गए शब्द का पूरा उद्देश्य देखना पड़ता है। किसी प्राणी को बचाने के लिए, निजी लाभ की तनिक इच्छा के बिना, कहा हुआ असत्य वे ‘ज्या-वांग-यू’ (假妄语) कहते हैं। इस पूरी तरह निस्स्वार्थ स्थिति में नरक का फल नहीं है और कुछ ऐसे कथनों से पुण्य भी होता है। इसके पास भोजन का एक साधारण उदाहरण आता है: भोजन न किया हो, फिर भी मेजबान को काम से बचाने और स्वयं उसका ऋणी न होने के लिए कह दिया कि खा चुका हूँ। दूसरी वजह में अपना लाभ है, इसलिए इस सुविधाजनक असत्य के लिए पश्चात्ताप बताया गया है। संबंध बिगाड़ने के लिए अलग लोगों को उसी घटना के विरोधी रूप सुनाना दोहरी वाणी है। मेल कराने वाला भी यदि दोनों के हित के लिए, अपना स्वार्थ छोड़े हुए, उनके स्वभाव के अनुसार अलग-अलग विवरण सुनाए, तो पुस्तक उसे हल्की दोहरी वाणी कहती है; जीवित रहते सच्चे पश्चात्ताप से उस नरक से छूट है। सुधार करते समय यह याद करना उपयोगी है कि कहाँ, कब और किस उद्देश्य से बात कही थी। घटना भूल गई हो तो भी हृदय से सुधार और दोहराव छोड़ने का संकल्प मुख्य रहता है। बुद्ध-प्रतिमा के सामने विनय से कहा जा सकता है; प्रतिमा उपलब्ध न हो तो आकाश की ओर निवेदन किया जा सकता है।