6 श्रद्धा, करुणा और चीनी धार्मिक व्यक्तित्व
7 कर्म के विधान में न्याय, पद और अभिलेख
8 पश्चात्ताप, सत्कर्म और जीवन की नई दिशा
अध्याय 1
कर्मफल और बदल सकने वाला भविष्य
कर्मफल और जीवन की निरंतरता
मनुष्य अपने भविष्य को कहाँ से बदलना शुरू करे? चीन की बौद्ध सदाचार-परंपरा इसका उत्तर वर्तमान आचरण में खोजती है। ‘यिन ल्यू वू छिंग’ (阴律无情) इसी परंपरा की पुस्तक है। उसका आधार है कि जीवन एक जन्म की सीमा से आगे चलता है और किए हुए कर्म उचित परिस्थितियाँ मिलने पर फल देते हैं। कारण और फल का यह संबंध अपने आप में वस्तुनिष्ठ है; किसी की इच्छा, संपत्ति, प्रतिष्ठा या ऊँचे पद से उसका विधान बदलता नहीं। सभी संवेदनशील प्राणी इसके भीतर हैं। बुद्ध और बोधिसत्त्व भी इसी अटल नियम का पालन करते हुए सहायता करते हैं: वे भूल दिखाते हैं, उसे छोड़ने की शक्ति जगाते हैं और शुभ फल के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ बनाने का मार्ग सिखाते हैं। इसलिए अतीत का कर्म और आज का प्रयत्न दोनों महत्त्व रखते हैं। पहले किए हुए काम से जो स्थिति मिली है, उसी में अब ईमानदारी, करुणा और संयम का नया काम किया जा सकता है। अपनी भूल समझकर उसे रोकना और फिर लगातार भलाई करना भविष्य के लिए नए कारण बनाता है। पुस्तक में कर्मफल की गंभीरता के साथ परिवर्तन की आशा इसी आधार पर रखी गई है।
सदाचार के लिए लिखी गई पुस्तक
लोग क्यों दुख पाते हैं, कोई अच्छा काम आगे क्या बदलता है और भूल हो जाने पर क्या किया जा सकता है—ऐसे प्रश्न चीनी सदाचार-साहित्य में बार-बार आते हैं। इस तरह की पुस्तकों को ‘शान-शू’ (善书, भलाई की ओर प्रेरित करने वाली पुस्तकें) कहा जाता है। इनमें उपदेश के साथ प्रश्नोत्तर, पुराने कर्म के फल और आचरण बदलने के उदाहरण मिलते हैं। उन्हें छपवाकर दूसरों को देना भी इसी प्रयोजन का विस्तार है: जिस बात से एक व्यक्ति अपना व्यवहार सुधार सके, वह दूसरे तक भी पहुँचे। इस पुस्तक की लेखिका शांग-ग्वान यू-ह्वा स्वयं को आ-यू कहती हैं। आत्मप्रस्तावना में वे लिखती हैं कि उन्हें जागृत अवस्था में अधोलोक के दर्शन कर, लौटने के बाद सरल भाषा में विवरण लिखने का दायित्व मिला। वे लिखे हुए को सुधारने और कोई बात स्पष्ट करने के लिए कई बार फिर जाने का भी उल्लेख करती हैं। उनके वर्णन में भोजन और पारिवारिक व्यवहार के साथ दफ़्तर का सामान, कंप्यूटर और लोगों के व्यवहार के ठोस उदाहरण भी आते हैं। परिचित जीवन के इन विवरणों के सहारे वे समझाती हैं कि रोज़मर्रा का कोई काम कितनी दूर तक फल दे सकता है।