समय का हिसाब स्थान के काम के अनुसार बदलता है। प्रेत-बस्ती में लगभग एक वर्ष भोजन से मिलने वाली तृप्ति है और तीन सौ से पंद्रह सौ वर्ष आयु है। दंडस्थल के उत्तर में वर्ष किसी विशेष आचरण के फल की अवधि बताता है। एक उत्तर विवाह से पहले और बाद एक ही साथी के साथ संबंध रखने वाले व्यक्ति की बात करता है, जो प्रबल कामना के साथ समय, स्थान या अंग की वर्जनाएँ तोड़ता है। यहाँ निषिद्ध समय में बुद्ध-बोधिसत्त्वों के जन्म-स्मरण के दिन, हर महीने के छह संयम-दिन और वर्ष के तीन व्रत-मास आते हैं। स्थान की मनाही पति-पत्नी की शय्या के बाहर यौन संबंध बनाने पर है; अंग की मनाही स्त्री के योनि-मार्ग के अलावा दूसरे अंगों में यौन क्रिया पर है। उस स्थिति के लिए तप्त ताँबे के स्तंभ और ताँबे की गोलियाँ निगलने के दंड में पाँच-पाँच सौ वर्ष कहे गए हैं। उसी उत्तर में जीवित रहते पश्चात्ताप करने और दूसरों को भी ऐसे काम से रोकने का प्रयत्न करने पर उस नरक-फल से छूट मिलने की संभावना है। इसके बाद गंभीर और बार-बार के यौन दुराचार की अलग श्रेणी आती है: तप्त ताँबे के स्तंभ, लोहे के पलंग और ताँबे की गोलियाँ निगलने जैसे संबंधित दंडस्थलों में प्रत्येक के लिए कम से कम दस हजार वर्ष, वास्तविक घटना के अनुसार निर्णय और फिर पशु-गति। ‘कल्प’ कभी अत्यंत लंबी धार्मिक काल-अवधि है; परिशिष्ट की एक टिप्पणी उसी शब्द को दंड एक बार सहने के अर्थ में और परिवर्तन-कल्प को एक बार नया जन्म लेने के अर्थ में खोलती है। अवधि, बार और जीवन-चरण को उनके काम के साथ रखने से प्रत्येक संख्या का अर्थ स्पष्ट होता है।
पश्चात्ताप की वास्तविक दिशा
अवीचि के वर्णन में परिवर्तन का प्रश्न सबसे कठोर कथनों के बीच उठता है। मूल इकतीसवें अध्याय की शुरुआत में न्यायाधिकारी कहते हैं कि घोर दुष्कर्म वाले प्राणी यहाँ आते हैं और फिर बाहर नहीं निकलते। उसके बाद क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व तीन व्यक्तियों को अलग उत्तर देते हैं। पहले पुरुष ने कामोत्तेजक औषधियाँ और अश्लील सामग्री बनाई थी। उसे कहा जाता है कि उसके बनाए पदार्थ मानव-लोक से पूरी तरह मिटें, तभी वह निकल सकेगा; उसे भीतर लौटा दिया जाता है। फिर एक स्त्री अपना रूप और वाणी धन लेने के लिए इस्तेमाल करने, वैवाहिक विश्वास तोड़ने और तीन पुरुषों की मृत्यु का कारण बनने की बात बताती है। उसे भी दंडस्थल में वापस भेजा जाता है। दूसरे पुरुष ने नकली औषधियाँ, नकली शराब और हथियार बेचे तथा अपनी कंपनी के लिए दूसरों की प्रतिष्ठा गिराई; उसके लिए कभी ऊपर न उठ सकने का निर्णय है। बाद में लेखिका स्त्री के बारे में पूछती हैं। क्षितिगर्भ समझाते हैं कि अभी उसका आग्रह तत्काल पीड़ा से बचने का है; कुछ समय बाद मन अधिक निर्मल होने पर वे फिर उसकी सहायता करने आएँगे। इस प्रकार आरंभ का व्यापक कठोर कथन और हर व्यक्ति के लिए दिया गया उत्तर साथ दर्ज हैं। उस भेंट के समय तीनों दंडस्थल में ही रहते हैं; स्त्री को फिर मिलने वाली सहायता उसके आगे के वास्तविक परिवर्तन से जुड़ी है।
शुभ गति से आगे की साधना
ऊपर उठने के बाद कहाँ पहुँचना है, यह भी संबंधित जीवन की दशा से समझ में आता है। ‘छाओ-शंग’ (超升) पहले की कठिन अवस्था से उन्नति का नाम है। शिशु-प्राणियों के उत्तर में मनुष्य-जन्म, देवलोक और बहुत थोड़े मामलों में पश्चिम की शुद्ध भूमि बताई गई है। सुखावती अमिताभ बुद्ध की भूमि है और वहाँ जन्म लेने का संबंध उसी साधना से है। मनुष्य या देव की अनुकूल गति मिलने पर भलाई और अभ्यास के नए अवसर खुलते हैं, जबकि जीवन पुनर्जन्म के क्रम में रहता है। जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति इससे आगे का लक्ष्य है; बुद्धत्व पूर्ण जागृति है। छंग-ह्वांग मुक्ति के लिए शील, बुद्ध-स्मरण, अनदेखे सत्कर्म, बोधिचित्त और निर्मल शुभ संकल्प साथ रखते हैं। बोधिचित्त में अपने लिए सर्वोच्च जागृति की चाह और सभी दुखी प्राणियों की सहायता का प्रण है। वे यह भी कहते हैं कि शुभ संकल्प में थोड़ी निजी स्वार्थ-भावना मिल जाए तो उसका अलग फल सहना होगा। इसीलिए साधना में बेहतर स्थिति पाने के साथ उद्देश्य को निर्मल करने की बात चलती है। वह उद्देश्य सबसे पहले मन के विचार में दिखाई देता है, फिर शब्द और व्यवहार के माध्यम से दूसरे लोगों तक पहुँचता है।
संदर्भ सारणियाँ
जीवन और मन के शब्दों के अलग आशय
| शब्द | मुख्य आशय | ग्रंथ और स्थान |
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| हुन, 魂 | पारंपरिक चीनी जीवन-वर्णन में प्राण-सदृश ची और मानसिक जीवन से जुड़ा पक्ष। ली ची में हुन-ची का आकाश से संबंध पूर्वज-अर्पण के एक आशय को बताता है। | ली ची, च्याओ थ-शंग; R04-SUP-03 |