हानि रोकने में उतरता हुआ पश्चात्ताप
अपनी रचना से हुई हानि स्वीकार करने के बाद उसका आगे फैलना कैसे रोका जाए, यह इन उत्तरों का ठोस प्रश्न है। धन के लिए केवल एक अश्लील फिल्म में काम करके उसके बाद रुक जाने वाले व्यक्ति के लिए एक हजार वर्ष दिए गए हैं। बाद में अपनी सभी संबंधित सीडी खरीदकर नष्ट करने और सच्चे पश्चात्ताप पर पाँच सौ वर्ष कम हो सकते हैं। विवश होकर अभिनय करने वाले की सौ वर्ष की अवधि के साथ पश्चात्ताप और आगे कभी उस काम को न दोहराने की शर्त है। निर्देशक, निर्माता और संबंधित सहयोगियों के लिए अलग नियम हैं; इस भाग की सारणी में भूमिकाएँ और उनकी पूरी संख्याएँ साथ रखी गई हैं। अंत में उद्धृत पुराने विधान आयु गिनने के लिए ‘जी’ (纪) प्रयोग करते हैं; एक जी बारह वर्ष है। अश्लील पुस्तक बनाना, अश्लील चलचित्र बनाना और किसी की यौन घटना फैलाना वहाँ अलग मदों में आते हैं, जिनके अपने परिणाम और दोष घटने की शर्तें हैं। इस तरह पहले हो चुका काम स्वीकार करना, अभी जारी हानि रोकना और आगे का आचरण बदलना एक दूसरे से जुड़ते हैं।
धर्मदान और पुस्तक का प्रसार
उपकारी शिक्षा भी प्रसार के साथ नए लोगों की सहायता करती रहती है। कोई विवेचन एक व्यक्ति को अपनी भूल समझाए और फिर समान कठिनाई वाले दूसरे व्यक्ति तक पहुँचे, तो समझ और सदाचार का अवसर आगे बढ़ता है। ऐसी शिक्षा बाँटना धर्मदान है। पुस्तक छपवाने के लिए धन, श्रम और साधन देना मुद्रण-सहयोग है; उपहार में देना, पढ़ने के लिए पहुँचाना और उपयुक्त माध्यम से साझा करना उसका प्रसार है। ‘यु-ली बाओ-छाओ’ (玉历宝钞) के परिचय में न्यायाधिकारी कहते हैं कि तान-छी ने ध्यान में देखे लोकों का लेख बनाया और जीवन के अंत में उसे शिष्य वू-मी को फैलाने के लिए दिया। वे उस पुस्तक के साथ यिन ल्यू वू छिंग के प्रसार को भी महत्त्व देते हैं; बाद वाली में आधुनिक जीवन के अधिक विस्तृत प्रसंग हैं। दोनों चीन के सदाचार-ग्रंथ हैं, जिनका प्रयोजन पाठक की समझ, संकल्प और सुधरे हुए आचरण में पूरा होता है। उन्हें छापना और पहुँचाना इस प्रयोजन के लिए उपलब्ध कराई गई सहायता है। अच्छे पाठ का दूसरों तक पहुँचना उन्हें अपनी जीवन-स्थिति समझने का एक और साधन दे सकता है।
छपाई से अभ्यास तक
पुराने समय में किसी ग्रंथ की अनेक प्रतियाँ तैयार करने के लिए उसके अक्षर लकड़ी के फलक पर उकेरे जाते थे। चीनी अभिव्यक्ति ‘फू चि चाओ ली’ (付之枣栗) इसी मुद्रण की याद दिलाती है: चाओ और ली बेर तथा शाहबलूत की लकड़ी हैं। फलक बनने पर बार-बार छपाई की जा सकती थी और शिक्षा अधिक पाठकों तक पहुँचती थी। पुस्तक की अंतिम टिप्पणी मुद्रण के साथ पढ़कर आचरण में लाने की आशा रखती है। परिशिष्ट में ‘मिंग-फा यिन-ल्यू’ (冥罚淫律), यौन दुराचार के अधोलोक-दंड का पुराना विधान, अपने पाठ के प्रसार के फल भी गिनाता है। लू पान-ग्वान के उस कथन में अलग संख्या में लोगों तक पहुँचाने पर आयु, संतान, वंश की समृद्धि तथा परीक्षा और पद की सफलता जैसे शुभ फल हैं। ये पुराने चीनी समाज की आशाओं की भाषा हैं। एक हजार लोगों तक पहुँचाने पर स्वर्गीय नामावली में नाम आने और जगत-भर में प्रसार पर मृत्यु के बाद सिद्ध अवस्था मिलने के कथन अलग हैं। उसी अनुच्छेद में फू-योउ ती-च्युन द्वारा स्वर्गीय सम्राट, 玉帝, से स्वीकृति प्राप्त करने का उल्लेख है। संलग्न सारणी इस विशेष पाठ के सभी स्तर और उनके फल रखती है।
भलाई का अगला निकट क्षेत्र
किसी बात या पुस्तक से मिली सहायता अंततः उन लोगों के बीच भी पहुँचती है जिनके साथ पाठक जीता है। सच बोलने का अभ्यास मित्रों में अनावश्यक संदेह घटा सकता है; अपने उद्देश्य को पहचानना विवाद के समय चोट पहुँचाने वाले शब्द रोक सकता है। उपकारी शिक्षा आगे पहुँचाने से किसी दूसरे घर में भी सुधार का अवसर खुल सकता है। मन क्या चाहता है, वाणी उसे किस तरह व्यक्त करती है और पहले से हुए प्रभाव को कैसे सँभाला जाए—ये प्रश्न साधारण व्यवहार में साथ आते हैं। सदाचार-पुस्तक फैलाने का संकल्प भी यहीं निकट का काम पाता है: विषय समझना, अपने जीवन में यथाशक्ति अमल करना और फिर दूसरों की समझ में सहायता करना। इसका सबसे परिचित क्षेत्र माता-पिता, भाई-बहन, जीवनसाथी और बच्चों के संबंध हैं। साथ रहते हुए सेवा दिखाई भी देती है और आदत बनी हुई वाणी पर ध्यान कम भी रह सकता है। इसीलिए परिवार में जिम्मेदारी, देखभाल और मन की ईमानदारी के प्रश्न अधिक गहराई से सामने आते हैं।