दंड के बीच किसी जीव के मन में अपनी भूल का बोध हो, तो उसे समझ आगे बढ़ाने का अवसर कैसे मिले? अट्ठाईसवें अध्याय में एक सभा-गृह इसी काम के लिए आता है। उसका नाम ‘मिंग ग्वांग छू चुआन’ (冥光初转) है, और क्षितिगर्भ वहाँ धर्म की शिक्षा देते हैं। पान-ग्वान कहते हैं कि छह गतियों के प्राणियों में मूल उज्ज्वलता समान है। भ्रम, हत्या और शील का उल्लंघन उसे ढक देते हैं; भारी पीड़ा में सच्चे पश्चात्ताप का दुर्लभ क्षण भी जल्दी दब सकता है। क्षितिगर्भ ने ऐसे ही क्षण को सँभालने का संकल्प लिया है। किसी दंडित जीव में एक क्षण को सच्चा पश्चात्ताप उठे तो दूत उसकी सज़ा रोककर उसे इस सभा में सुनने लाते हैं। कुछ श्रोता पहले दंड भोग चुके हैं, कुछ अभी उसके बीच हैं। उस दिन पाँच शीलों की शिक्षा दी जा रही है। मन की दीप्ति में आरंभिक परिवर्तन पहचानकर उसे सुनने का समय दिया जाता है, ताकि पश्चात्ताप अधिक स्थिर समझ और संकल्प बन सके।
सभा में एक जीव रोते हुए अपने किए को स्वीकार करता है। उसके जीवन-क्रम में दान और हानि दोनों हैं। वह कभी दानशील साधक था, पर शील सँभाल नहीं पाया। उसके बाद प्रेत योनि में गया और मनुष्यों तथा शील से विचलित साधकों की जीवन-शक्ति चुराकर जीने लगा। चोरी चलती रही और वह आगे नरक पहुँचा। अब उपदेश सुनते हुए उसे अपने आचरण पर गहरी लज्जा होती है। वह क्षितिगर्भ के सामने झुककर हर जन्म में सही धर्म का अभ्यास करने और उसका संरक्षण करने की प्रतिज्ञा करता है। उसकी गहरी धूसर दीप्ति हल्की पड़ने लगती है; शरीर भी उसे हल्का अनुभव होता है। क्षितिगर्भ उसका पश्चात्ताप स्वीकार करते हैं। उसके पहले दान ने जो शुभ कारण बनाए थे, वे उसके जीवन में अपना स्थान रखते हैं; शील से हटने और दूसरों की शक्ति चुराने ने आगे दुख के कारण बनाए। अब उसी जीव का संकल्प फिर बदल रहा है। कथा इस परिवर्तन को उसके स्वीकारे हुए दोष, कही गई प्रतिज्ञा और दिखाई देती दीप्ति में प्रकट करती है।
इस स्वीकृति के बाद दूत उसे सभा से बाहर ले जाते हैं। अगले प्रसंग में वह यान-वांग के सामने औपचारिक निर्णय के लिए उपस्थित है। उसे मनुष्य-लोक में फिर जन्म का अवसर मिलता है। वह इस निर्णय और क्षितिगर्भ की करुणा के लिए कृतज्ञ होकर अपना जीवन बदलने तथा सही धर्म का अभ्यास करने की बात कहता है। फिर मेंग पो का पेय लेकर पुनर्जन्म की ओर जाता है। सभा में सुनने का अवसर, अपनी प्रतिज्ञा और न्यायालय का निर्णय इस क्रम की अलग घटनाएँ हैं। पान-ग्वान उन श्रोताओं के बारे में भी कहते हैं जिनकी मनोदीप्ति बढ़ी है: उन्हें मनुष्य-जीवन मिलता है, जहाँ वे अपनी प्रकृति को फिर सँवार सकेंगे। इस व्यक्ति के बड़े संकल्प पर क्षितिगर्भ ने विशेष व्यवस्था की है। वे उसके आगामी मानव जीवन में अपना रूप प्रकट करके मार्गदर्शन देंगे। नया जन्म इस प्रकार साधना जारी रखने की जगह बनता है; जिस बात की प्रतिज्ञा सभा में हुई, उसे फिर जीवन में निभाने का समय मिलेगा।
उसके अगले जीवन की बही खुलती है तो समृद्धि और कठिनाई साथ मिलती हैं। पुराने दान के फल से वह धनी परिवार में जन्म लेगा, किन्तु उस परिवार में सम्यक् समझ का अभाव होगा। बड़ी बीमारी से बचते हुए भी छोटे रोग बार-बार आएँगे। उसे लोग छलेंगे, साधना में बाधाएँ होंगी, और अंत समय सेवा तथा अंतिम संस्कार करने वाला पुत्र उसके जीवन में नहीं होगा। पान-ग्वान इन्हें जीवन-शक्ति चुराने के शेष फल से जोड़ते हैं। तीस वर्ष की आयु में वह साधना शुरू करेगा और क्षितिगर्भ के मानव रूप से मार्गदर्शन पाएगा। साधन होने पर भी पुरानी चोरी की इच्छा उठ सकती है। आगे का मार्ग उसके उत्तर से खुलेगा: अपने दायित्व में स्थिर रहना, शील निभाना, बीमारी में शिकायत से बचना, छल मिलने पर प्रतिशोध छोड़ना, बाधा के बीच धीरज रखना और चोरी का विचार उठते ही पश्चात्ताप करना। ऐसा करे तो उसकी आध्यात्मिक उज्ज्वलता आगे बढ़ेगी; उलटा आचरण फिर नरक ले जा सकता है। दान का फल, हानि का शेष फल और नई सहायता, तीनों के बीच उसे अपने संकल्प को रोज़ सँभालना होगा।
करुणा और दो अलग जीवन-क्रम
उनतीसवें अध्याय में सहायता का पहला काम पीड़ा को इतना शांत करना है कि जीव अपनी बात कह सके। स्थान ‘च्याओ-ह्वान’ नरक है, जहाँ से चीख-पुकार सुनाई देती है। क्षितिगर्भ भिक्षु के रूप में नीले-हरे कमल पर विराजते हैं। बाएँ हाथ में गुलाबी मणि और दाएँ में सुनहरा भिक्षु-दंड है; दाओ-मिंग बाईं ओर, मिन-गोंग दाईं ओर और दी-तिंग पास हैं। पुस्तक दी-तिंग को बोधिसत्त्व के चित्त से प्रकट साधनशील सहचर कहती है। क्षितिगर्भ के संकेत पर मिन-गोंग नीचे जाकर दो दूतों से पुरुष जीव को लाने को कहते हैं। वह बोलने की दशा में नहीं है। तब दाओ-मिंग क्षितिगर्भ से गुलाबी मणि लेते हैं, उसके पास उतरते हैं और मंत्र पढ़ते हैं। मणि का प्रकाश पूरे दंडस्थल में फैल जाता है। वहाँ का दुख कुछ समय के लिए शांत या कम होता है और जीवों को शरीर तथा मन में स्थिरता मिलती है। उस पुरुष को भी राहत मिलती है; अब उसकी पिछली जीवन-कथा सुनना संभव होता है।
उसका दुख यौन दुराचार के साथ एक अन्य साधक के प्रति ईर्ष्या से भी जुड़ा है। वह स्वीकार करता है कि दूसरों को धर्म सिखाने वाले गृहस्थ का सम्मान देखकर उसे जलन होती थी। उसने उस व्यक्ति के शील पर झूठे आरोप लगाए; कई श्रोता दूर हो गए और उनका सीखने का मार्ग बाधित हुआ। स्वयं बौद्ध अभ्यास करते हुए उसने यह हानि पहुँचाई और मृत्यु के बाद उसका फल भोगने आया। अब मनुष्य-लोक में उसका पुत्र बड़ा हो चुका है। वह श्रद्धापूर्वक अभ्यास करता, प्रतिदिन क्षितिगर्भ सूत्र पढ़ता और पिता के लिए पुण्य समर्पित करता है। पिता अपने कर्म की जिम्मेदारी स्वीकार करता है और हर जन्म में शुद्ध शील रखने, सही धर्म की रक्षा करने तथा समाज की सेवा करने की प्रतिज्ञा लेता है। क्षितिगर्भ की सहायता से उसे पहले किया हुआ नाम-स्मरण याद आता है। वह बार-बार क्षितिगर्भ का नाम लेने लगता है। उसकी दीप्ति उज्ज्वल होती है, शरीर हल्का पड़ता है और ऊपर उठने लगता है। पुत्र की सहायता के बीच पिता भी अपना मन बदल रहा है।
इतनी जल्दी अवसर खुलने के पीछे उसके पुराने शुभ कर्म भी हैं। क्षितिगर्भ बताते हैं कि किसी पिछले जीवन में वह भिक्षु था। पूरे जीवन में शील एक-सा निर्मल नहीं रहा, फिर भी उसने एक अवधि में शुद्ध भिक्षु-शील निभाया था। उसी पुण्य से उसे सात जन्मों तक धनी परिवार और माता-पिता की सेवा करने वाले बच्चे मिले। सातवें जन्म में यौन दुराचार और निंदा ने उसे नरक पहुँचा दिया। अब पुत्र की बड़ी हितैषी भावना, सत्कर्म और समर्पण की शक्ति पिता तक पहुँचती है; पिता का स्वयं का सच्चा पश्चात्ताप भी उसके साथ है। पुराने पुण्य ने सात जन्मों में अपना फल दिया था, और नए दुष्कर्म ने अपनी पीड़ा। इस समय मिली राहत को क्षितिगर्भ पुत्र के महान बोधिचित्त और पिता के असली परिवर्तन, दोनों से जोड़ते हैं। एक जीवन-क्रम में अच्छे और बुरे कारणों के इन अलग फलों को देखने पर सहायता की पृष्ठभूमि स्पष्ट होती है।
आगे मिलने वाला जन्म फिर साधना का समय होगा, और उसमें कुछ पुराने फल शेष रहेंगे। पुरुष जीव मनुष्य-लोक में स्त्री के रूप में जन्म लेगा। उस जीवन में विवाह-विच्छेद होगा और सच बोलने पर भी लोग विश्वास नहीं करेंगे। इस व्यक्ति के यौन दुराचार तथा झूठे आरोपों का शेष फल पुस्तक इस प्रकार बताती है। साथ ही क्षितिगर्भ कहते हैं कि वह बौद्ध धर्म का अभ्यास अवश्य करेगी। दृढ़ श्रद्धा से साधना करने, सही धर्म की रक्षा करने और नरक में ली हुई प्रतिज्ञाएँ निभाने पर उसकी दीप्ति धीरे-धीरे फिर उज्ज्वल होगी। इस अगले जीवन में परिस्थिति और उसका अपना उत्तर दोनों सामने हैं। कठिनाई आएगी; उसी में शील और विश्वास सँभालने का काम होगा। प्राप्त सहायता उसे अभ्यास का अवसर देती है, और पहले स्वीकार की गई जिम्मेदारी अब रोज़ के चुनावों में पूरी होनी है।
इसके बाद दूत एक स्त्री को लाते हैं। दाओ-मिंग को उसके लिए अधिक देर मंत्र पढ़ना पड़ता है; तब वह बोल पाती है। वह जीवन के कठोर व्यवहार का विवरण देती है। पति की पहली पत्नी के बच्चे से ईर्ष्या में उसने उसे भूखा रखा और मारपीट से उसकी जान ले ली। सास के साथ भी क्रूरता की, उन्हें पीटा और अंततः उनके दुख तथा मृत्यु का कारण बनी। वृद्धा और बच्चे ने न्यायालय में शिकायत की थी। इसीलिए उसके निर्णय में च्याओ-ह्वान के अतिरिक्त दूसरे नरकों का दंड भी है। क्षितिगर्भ उससे उन्हीं संबंधों की बात करते हैं जिनमें वह निर्दयी रही: माता-पिता का जीवन भर पालन करके भी उनके उपकार का पूरा प्रत्युपकार कठिन है; और माँ खो चुका बच्चा उस घर में अपनी संतान जैसी देखभाल का अधिकारी था। जहाँ उसे सुरक्षा देनी थी, वहीं उसने प्राण लिए। स्त्री की विनती अब उस स्वीकार के सामने है कि उसके अपने घर के भीतर दूसरों पर क्या बीती।