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अध्याय 8
पश्चात्ताप, सत्कर्म और जीवन की नई दिशा
पश्चात्ताप और आगे के जीवन का संबंध
अपने कर्मों का कठोर लेखा सामने आने पर मनुष्य उसे बदलने का उपाय खोजता है। पुस्तक सुधार की शुरुआत वहीं रखती है जहाँ व्यक्ति को अपने किए से दूसरों को पहुँचा दुख दिखाई देने लगता है। चीनी में इसे ‘छान-ह्वेइ’ (忏悔), सच्चा पश्चात्ताप, कहा गया है। भूल मान लेने के साथ उस व्यवहार को रोकना और आगे के लिए संकल्प लेना जुड़ता है। छल करने वाला सत्य का अभ्यास करे, क्रूरता की आदत वाला दूसरों की पीड़ा समझे, और अपने लाभ में डूबा व्यक्ति किसी और का हित भी सँभाले—तब बदली हुई समझ नए कामों में दिखाई देती है। किया हुआ नुकसान स्वीकारने में कभी दुख और लज्जा होती है; उसी से अपने पुराने आग्रह को छोड़ने का साहस भी आता है। आगे बार-बार अवसर आते हैं जब पहले जैसा काम आसानी से हो सकता है। वहाँ चुना गया संयम संकल्प को धीरे-धीरे स्थिर करता है। कर्म का फल बनने वाली इस निरंतरता में आज सुधरा हुआ आचरण भी प्रभाव रखता है: जिन आदतों से दुख के कारण बने थे, उनके स्थान पर जीवन को सँभालने वाले कारण बनने लगते हैं।
ऐसा संकल्प निभाने के लिए बौद्ध साधक बुद्ध, धर्म और संघ में शरण लेते हैं। बुद्ध जागृति के आदर्श हैं; धर्म उनकी शिक्षा और उस पर चलने का मार्ग है; संघ अभ्यास को सहारा देने वाला साधक-समुदाय है। अपनी मुक्ति की इच्छा दूसरों के कल्याण तक फैले तो बोधिचित्त की दिशा खुलती है—स्वयं जागृति की ओर बढ़ना और सभी प्राणियों को दुख से उबारने का प्रयत्न करना। प्रतिज्ञा इस इच्छा को ठोस काम देती है: शील का पालन, धर्म की रक्षा और समाज के लिए उपयोगी जीवन। छंग-ह्वांग संकल्प के मनोभाव पर भी ध्यान दिलाते हैं। भले उद्देश्य में बचा स्वार्थ अपने अनुरूप फल रखता है, इसलिए साधना में वचन निभाने के साथ भावना को निर्मल करना भी आता है। पुरानी आदतें बहुत प्रबल हों, तब भी क्रम आरंभ किया जा सकता है। पुस्तक पहले बीती भूलों पर पश्चात्ताप, फिर हर जन्म में शील सँभालने की दृढ़ इच्छा, और उसके साथ नाम-स्मरण, शाकाहार तथा सत्कर्म बताती है। लगातार अभ्यास से भविष्य के जीवन की दशा धीरे-धीरे ऊपर उठती है।
कृतज्ञता, दान और पुण्य समर्पण
भलाई आरंभ करने के लिए अपने जीवन में मिले सहयोग को देखना एक निकट का रास्ता है। पालन करने वाले माता-पिता, सिखाने वाले शिक्षक, जीवन की व्यवस्था सँभालने वाला समाज और भोजन-वस्त्र तक में सहायक असंख्य प्राणी—इन सबके उपकार से कृतज्ञता घर के बाहर भी फैलती है। त्रिरत्न साधना का सहारा देते हैं। चीनी बौद्ध ग्रंथों में “चार उपकारों” का स्मरण इसी व्यापक भावना से जुड़ा है; उनकी दो पारंपरिक सूचियाँ साथ की तालिका में हैं। ऋण मानने के बाद उसे व्यवहार में लौटाने के अनेक अवसर आते हैं। आवश्यक सहायता देना दान है; अपने व्यवहार को सँभालना शील; कठिनाई और विरोध में धैर्य रखना क्षान्ति। शुभ काम जारी रखने का उत्साह वीर्य है, मन को स्थिर करने का अभ्यास ध्यान, और कारणों तथा साधना की राह को समझने वाली बुद्धि प्रज्ञा। ये छह पारमिताएँ जागृति और जीवों के हित की दिशा में साथ विकसित होती हैं। भोजन देना, सेवा करना, जीव की रक्षा करना और बदले की आशा छोड़कर सहायता करना इनके दैनिक अवसर हैं। कर्म, उसके फल और साधना की सही दिशा को समझने वाली सम्यक् दृष्टि करुणा को सूझ-बूझ के साथ काम करने में सहारा देती है।