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《阴律无情》文化导读 · HI

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जीवन के प्रति बनी रहने वाली चिंता

जिस बच्चे का जन्म पूरा न हो पाया, उसके लिए भी परिवार की चिंता बनी रहती है। पुस्तक ऐसे जीवन के आगे चलने की चर्चा ‘यिंग-लिंग’ (婴灵, शिशु-आत्मा) के नाम से करती है। न्यायाधिकारी गर्भहानि की परिस्थितियाँ अलग-अलग बताते हैं: जानबूझकर गर्भ समाप्त करना, आर्थिक कठिनाई के कारण यह निर्णय लेना, गर्भ में भ्रूण की मृत्यु, अनचाहा गर्भस्राव, मोलर गर्भावस्था (葡萄胎) और गर्भवती स्त्री की बीमारी के कारण जन्म पूरा न होना। मोलर गर्भावस्था में शिशु को पोषण पहुँचाने वाली अपरा (प्लेसेंटा) का ऊतक असामान्य रूप से बढ़ता है और भ्रूण का सामान्य विकास नहीं हो पाता। आगे के उत्तरों में घटना के साथ इरादा और संबंधित व्यक्तियों का काम भी देखा जाता है। तेईसवें अध्याय में एक खास श्रेणी के बारे में कहा गया है कि शिशु में मानव-जन्म के लिए पर्याप्त पुण्य न होने से जन्म अधूरा रहा; उस श्रेणी के माता-पिता को नरकदंड से छूट है। उसी उत्तर में उनसे अपने पूर्व कर्म और पुण्य की कमी पर पश्चात्ताप करने को कहा जाता है। पाठ और पुण्य-समर्पण का उद्देश्य उस शिशु का दुःख कम हो और उसे अच्छी गति मिले, यही रहता है।

गर्भहानि की इन अलग परिस्थितियों से पुस्तक में शिशु-आत्माओं के दो अलग निवास भी जुड़े हैं। जानबूझकर हुए गर्भपात की पीड़ा और रोष का वर्णन ‘वांग सि खू छंग’ (枉死哭城) में केंद्रित है। उसके पास ‘श्युए वू छंग’ (血污城) नाम का पुराना नगर है, जिसे न्यायाधिकारी उस समय लगभग सत्तर वर्ष पुराना बताते हैं। अनचाही गर्भहानि के शिशुओं को वहाँ रखा गया है और उनके वर्णन में अकेलापन प्रमुख है। पहले नगर, वांग सि खू छंग, से कुछ शिशु पीली अनुमति-पत्रिका लेकर बाहर जाते हैं। यमराज से स्वीकृत उस पत्रिका को देखकर दूत उन्हें माता-पिता की खोज में जाने देते हैं। इसके बाद उनके परिवार के पास पहुँचने और पीड़ा से बनी उलझनों का उल्लेख आता है। रक्त से जुड़े नाम चीनी धार्मिक साहित्य में और भी हैं: रक्तकुंड या रक्तपात्र संबंधी ग्रंथ प्रसव तथा अनुष्ठानिक शुद्धता पर चर्चा करते हैं। उनकी अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। यहाँ दोनों नगरों का वर्णन विशेष रूप से शिशु के जारी जीवन, उसकी मनोदशा और परिवार से उसके संबंध को सामने रखता है।

परिजन इस दुःख में सहायता करना चाहें तो पुस्तक उन्हें अपने व्यवहार से आरंभ करने को कहती है। जिसने जानबूझकर हानि पहुँचाई, उसके लिए किए हुए को स्वीकार करना, क्षमा माँगना और फिर ऐसा न करने का संकल्प है। अनचाही गर्भहानि तथा शिशु के अपर्याप्त पुण्य वाले उत्तर में पश्चात्ताप का विषय माता-पिता के पूर्व कर्म और पुण्य की कमी है। इसके साथ न्यायाधिकारी स्वयं पाठ करने, प्राणियों की रक्षा करने, बुद्ध को अर्पण देने, दान करने, पुल बनवाने और सड़क सुधारने जैसे काम बताते हैं। उनका पुण्य किसी विशेष शिशु के नाम समर्पित किया जा सकता है। शुभ काम की शक्ति उसके भाव से भी जुड़ती है: जीवों का दुःख दूर करने की इच्छा हो, उनसे बदले की अपेक्षा न हो और काम कर चुकने पर मन उस पर अटका न रहे। पाठ के बारे में एक उत्तर क्षितिगर्भ सूत्र के कम-से-कम उनचास पूरे पाठ कहता है। उसमें एक माँ का उदाहरण भी है जिसने पाठ के साथ बड़े शुभ संकल्प और सत्कर्म लगातार किए; गर्भपात के पहले दिन से गिनने पर उसके शिशु को उनचासवें दिन अच्छी गति मिली। न्यायाधिकारी इस उदाहरण को अत्यंत दुर्लभ बताते हैं।

दूसरों की सहायता भी इस प्रयत्न में जुड़ सकती है। पुस्तक में बताया गया है कि बौद्ध केंद्र में स्मृति-पट्ट स्थापित होने पर दिवंगत को अर्पण ग्रहण करने और धर्म सुनने का लाभ मिलता है; इसके लिए उस केंद्र का आचरण शुद्ध और धर्मानुकूल होना चाहिए। परिजन का अपना सच्चा पश्चात्ताप और नियमित शुभ कर्म उसी समय चलते रहते हैं। क्षितिगर्भ से जुड़े एक उद्धार-प्रसंग में पुराने सत्कर्म, संतान का पुण्य-समर्पण (परिणामना), पीड़ित की अपनी स्वीकारोक्ति और बोधिसत्त्व की करुणा साथ काम करते हैं। किसी की ओर से मिली सहायता और व्यक्ति का अपना परिवर्तन यहाँ एक-दूसरे से जुड़ते हैं। परिवार की देखभाल के परिचित काम भी इसी दृष्टि से अर्थ पाते हैं: माता-पिता का साथ देना, बच्चे की रक्षा करना, जरूरतमंद को सहारा देना और दिवंगत के लिए उदारता से पुण्य समर्पित करना। इन कामों को निभाने के लिए समय, शरीर और अपनी आदतें भी सँभालनी पड़ती हैं। घर के संबंधों में सीखा गया ध्यान इसलिए भोजन, विश्राम, संयम और दूसरे जीवों के प्रति व्यवहार में भी उतरता है।

संदर्भ सारणियाँ

पाँच संबंध और उनके पारंपरिक गुण

| संबंध | आशय |

| --- | --- |

| 父子 — पिता और संतान | पालन और आत्मीयता; मूल सूत्र में इस संबंध का गुण स्नेह है। |

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