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《阴律无情》文化导读 · HI

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किसी वचन को सचमुच निभाना अक्सर अगली बार बोलते या काम करते हुए शुरू होता है। पुरानी कटु बात फिर मन में आए तो उसे पहचानना, छल का आसान अवसर मिले तो ईमानदारी सँभालना, और सहायता की आवश्यकता दिखे तो अपनी सामर्थ्य से काम करना—सुधार इसी तरह स्थिर होता है। पश्चात्ताप बीती भूल को स्पष्ट करता है, शील फिर वैसी हानि से बचाता है, करुणा दूसरे के हित तक पहुँचती है और प्रज्ञा कर्म तथा फल का संबंध समझाती है। पुस्तक के अनुसार ऐसा अभ्यास निर्मल और निरंतर हो तो जीवन शुभ मानव अथवा स्वर्गीय दशा की ओर उठता है। शुद्ध प्रतिज्ञा, नाम-स्मरण और व्यापक हित का अभ्यास सुखावती तथा आगे मुक्ति के लक्ष्य से भी जुड़ता है। पुराने दोषों को छोड़ते रहना और भलाई को स्वभाव बनाना उस राह को सँभालता है। जीवन के अगले रूप अभी किए जा रहे चुनावों से संबंधित हैं। इसलिए भविष्य के लिए सबसे निकट उपलब्ध काम अपना वर्तमान मन, अपनी वाणी और अपना आचरण सुधरते हुए देखना तथा उसे जारी रखना है।

संदर्भ सारणियाँ

चार उपकारों की दो ग्रंथगत सूचियाँ

| ग्रंथ | चार संबंध | आशय |

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| महायान चित्तभूमि-चिंतन सूत्र की सूची, 《释氏要览》 में उद्धृत | माता-पिता, सभी प्राणी, शासक, त्रिरत्न | पालन, जीवों से सहायता, राज्य की सुरक्षा और बुद्ध-धर्म-संघ का मार्गदर्शन। |

| 《释氏要览》 के दूसरे खंड में दी गई दूसरी सूची | माता-पिता, शिक्षक, शासक, दाता | पालन, शिक्षा, सामाजिक संरक्षण और साधना-जीवन को मिलने वाला सहयोग। |

छह पारमिताओं की साधना

| नाम | अभ्यास की दिशा |

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