उपदेश सुनकर वह अपनी एक और आदत पहचानती है। जीवन में कोई उसकी कमी बताता तो वह कटु शब्दों और कभी मारपीट से उत्तर देती थी। हर बार जीत जाना उसे प्रिय था। अब उसे लगता है कि उसने गंभीर भूल की, और वह क्षितिगर्भ से बाहर निकलने की विनती करती है। इसके बाद दूत उसे वापस ले जाते हैं। उसकी मनोदीप्ति पहले से कुछ सुधरी है, किंतु अभी मंद है। क्षितिगर्भ इस दिन के संपर्क का फल बहुत दूर के भविष्य से जोड़ते हैं: जब वह फिर मनुष्य-जन्म पाएगी, तो यह शुभ संबंध उसे सही धर्म से मिलने और साधना करने में सहायता देगा। इस समय उसके लिए सुनना और अपना दोष देख पाना आरंभ हुआ है। पुरुष जीव के लिए अभी पुनर्जन्म का रास्ता खुला था; इस स्त्री के लिए आज की भेंट ने बाद के अभ्यास का कारण रखा है। राहत और उपदेश दोनों को मिले, उनकी अपनी दशा तथा प्रतिक्रिया के अनुसार आगे का परिणाम अलग हुआ।
करुणा, कर्मफल और स्थिर परिवर्तन
दोनों की पीड़ा शांत होने पर बोलने का अवसर मिला; आगे के लिए उनका मन और उनके अन्य कर्म भी निर्णायक रहे। पुरुष के पास पूर्व साधना का संबंध, पुत्र की भलाई और अपना सच्चा पश्चात्ताप एक साथ थे। स्त्री में अपनी भूल पहचानने की शुरुआत हुई, जिसका बाद का फल बताया गया। इन प्रसंगों में करुणा कई काम करती है—सुनने लायक विश्राम देती है, किए हुए दुख को समझाती है और बदलाव को सहारा देने वाले संबंध बनाती है। अधिकारी अपने निर्णय तथा कार्यवाही सँभालते हैं, परिजन सत्कर्म करते हैं, और जीव स्वयं तय करता है कि उस सहायता का उत्तर कैसे दे। हिंसा, छल और अशुद्ध आचरण ने उसके नरक के कारण बनाए थे। उन्हें पहचानकर रोकने और आगे भलाई करने से वे कारण बदलते हैं जिनसे उसका आगामी जीवन बनेगा। बुद्ध की प्रज्ञा इस संबंध को स्पष्ट करती है; बोधिसत्त्व की करुणा उसे समझकर आचरण बदलने का अवसर उपलब्ध कराती है।
केवल शीघ्र कष्ट से छूटने की इच्छा और भीतर से बदलने के बीच का अंतर इकतीसवें अध्याय की एक स्त्री में और खुलता है। पहले पुष्प-अर्पण तथा धर्म-श्रवण से उसे सौंदर्य और समझ मिली थी; बाद में वह अभिमान, छल, कटु वाणी तथा दूसरों को पीड़ा देने लगी। अब उसकी विनती का मुख्य आग्रह तुरंत बाहर निकलना है। क्षितिगर्भ कहते हैं कि जब आगे उसका मन अधिक निर्मल होगा, वे फिर सहायता के लिए आएँगे। उसी अध्याय में नकली औषध-सामग्री, नकली शराब और हथियार बेचने वाले पुरुष के लिए कभी ऊपर न उठने का अत्यंत कठोर निर्णय है। बत्तीसवें अध्याय के बारह वर्षीय बालक की प्रतिक्रिया दूसरी है। वह अपने कथन में अश्लील सामग्री और हस्तमैथुन की लत, फिर शरीर के दुर्बल होने की बात करता है। अपनी असमय मृत्यु से माता-पिता को हुए दुख पर सच्चा खेद करता और सहपाठियों को इन आदतों से बचाने की प्रतिज्ञा लेता है। पुस्तक उसके माता-पिता की प्रार्थना तथा गरीबों की सहायता को अवलोकितेश्वर की करुणा से जोड़ती है। आगे सहायता का वचन, कठोर निर्णय और बालक के लिए खुला सहारा, इन अलग पात्रों के जीवन में अपने-अपने कारणों से आते हैं।
पढ़ी हुई ध्वनि और उसका अभ्यास
इन सहायता-प्रसंगों में नाम लेना, सूत्र पढ़ना और मंत्र बोलना, तीनों सुनाई देते हैं। हर क्रिया का अपना विषय है। उनतीसवें अध्याय में दाओ-मिंग मणि लेकर मंत्र पढ़ते हैं, पुरुष जीव क्षितिगर्भ का नाम स्मरण करता है और उसका पुत्र पूरे क्षितिगर्भ सूत्र का पाठ करके पुण्य अर्पित करता है। नाम-स्मरण मन को बुद्ध अथवा बोधिसत्त्व के गुणों और संकल्प की ओर ले जाता है। सूत्र में शिक्षा को क्रम से पढ़ा जाता है; अर्थ समझना और उसे जीवन में अपनाना उस अध्ययन को आगे बढ़ाते हैं। मंत्र परंपरा से प्राप्त विशेष ध्वनि का धार्मिक प्रयोग है। इसलिए पाठ की संख्या का भी अपना विषय होता है—नाम कितनी बार लिया गया, मंत्र कितनी बार पढ़ा गया, या पूरा सूत्र कितनी बार समाप्त हुआ। मूल पुस्तक पढ़ते समय ये क्रियाएँ अपने पात्र और प्रयोजन के साथ पहचान में आ जाती हैं। किसी नाम या मंत्र के अपरिचित होने पर पहले उसका उपयोग समझना, आगे उसकी ध्वनि और पाठ से परिचित होने की सहज शुरुआत है।
मंत्र की पंक्ति मूल पुस्तक में चीनी अक्षरों में मिलती है। सामान्य पाठ में उन्हीं अक्षरों के शब्दार्थ होते हैं; यहाँ वे सुनी जाने वाली ध्वनि को सँभालते हैं। संस्कृत से चीनी में आने पर बने उच्चारण, बाद के लिखित पाठ और आज की जीवित पाठ-परंपराएँ इस रूप के पीछे हैं। स्रोत-तालिका में ‘唵。钵啰末邻陀宁。娑婆诃。’ रूप सुरक्षित है, जिससे संबंधित पंक्ति पहचानी जा सकती है। आगे पाठ सीखने वाला व्यक्ति प्रमाणित ग्रंथ और उस परंपरा में प्रचलित उच्चारण का सहारा ले सकता है। संस्कृत का मूल रूप देना भी ऐसे पाठ-साक्ष्य से ही सार्थक होता है, जिसमें दोनों रूपों का संबंध स्थापित हो। नाम और ग्रंथ के अर्थ का परिचय पढ़ने में सहायक है; मंत्र की ध्वनि सीखने में परंपरा का मार्गदर्शन सहायक होता है। इस तरह अर्थ के प्रति समझ और ध्वनि के प्रति सावधानी, श्रद्धापूर्वक अभ्यास के दो जुड़े हुए पक्ष बनते हैं।
ग्रंथों का परिचय और जीवन में उनका स्थान
पढ़ते समय अपरिचित नाम केवल मंत्रों में नहीं मिलते; पुस्तक में सूत्र, पुराने सदाचार-ग्रंथ, कविताएँ और दस्तावेज़ भी साथ आते हैं। उनका प्रकार जान लेने पर नाम का काम खुल जाता है। सूत्र में धर्म की शिक्षा है, शास्त्र में उसका विवेचन, और किसी सूत्र का अध्याय या खंड उसके भीतर का विशेष विषय। सदाचार-ग्रंथ व्यवहार के उदाहरणों से उपदेश देते हैं। यी (《易》) तथा शू (《书》) चीनी शास्त्रीय शिक्षा से जुड़े हैं। ‘मान जियांग होंग’ (《满江红》) एक गीतिकाव्य-धुन और उसकी छंद-रचना का नाम है; युए फ़ेई संबंधी संवाद की रचना और मिंग काल के वेन झेंगमिंग की संलग्न कविता, एक नाम के अंतर्गत दो अलग कृतियाँ हैं। न्ये-जिंग ताइ कर्म-दर्पण का स्थान है, जबकि मिंग-फू लिंग-ती तोंग-द्ये मृत्यु-सूचना का दस्तावेज़। जिन-के तथा लुन-के दो संकलन हैं, जिन्हें साथ जिन-लुन कहा गया है। अंत की चालीस नामों वाली सूची चीनी नाम, हिन्दी परिचय और प्रसंग एक साथ देती है; उससे पूरे ग्रंथ, उसके भाग, कविता, दस्तावेज़ या स्थान को पहचाना जा सकता है।
नाम से ग्रंथ पहचाना जाता है, और वाक्य के रूप से उसके कहने का ढंग। छोटी सूक्ति आचरण की बात संक्षेप में रखती है; गाथा लय में शिक्षा सँभालती है। शुभ कामना आगे की इच्छा बताती है, जबकि प्रतिज्ञा उसे निभाने का वचन देती है। चेतावनी किसी गंभीर कर्म का परिणाम सामने लाती है। निश्चित संख्या के साथ उसका माप जुड़ा रहता है, और कभी बड़ी संख्या किसी विस्तार की अनुभूति कराती है। वेन-छांग के उपदेश तथा ग्वान-शंग की व्याख्या जैसे नाम भी इसी शिक्षण-परंपरा में आते हैं। इन शिक्षाओं को लोगों तक पहुँचाने के लिए पुराने समय में चीनी बेर और चेस्टनट की लकड़ी पर छपाई के फलक बनाए जाते थे; परिशिष्ट में उनका उल्लेख है। उससे छपने वाला उपदेश दूसरे हाथों तक जाता था। अब भी शब्द का अर्थ ठीक समझने पर उसे व्यवहार में उतारने का विषय स्पष्ट होता है—किस प्रतिज्ञा को निभाना है, किस हानि को रोकना है और किसके लिए भला करना है।