शरीर मनुष्य-लोक में है और उसकी आयु अभी बची है, फिर भी चेतना का एक अंश अधोलोक में अनुभव कर रहा है—मूल दसवें अध्याय में ऐसा प्रसंग आता है। न्यायाधिकारी कहते हैं कि चेतना के कुछ अंश और तीन ‘हुन’ वहाँ ले जाए जाते हैं; साथ में मनुष्य के शरीर की कुछ अनुभूतियों का वर्णन है। जीवन की इन अवस्थाओं को बताने के लिए चीनी पाठ कई शब्द रखता है। ‘हुन-पो’ (魂魄) पारंपरिक चीनी जोड़ी है: हुन प्राण-सदृश ची और मानसिक जीवन से, पो देह तथा उसके सजीव रूप से जुड़ता है। पुराने आचार-ग्रंथ ली ची में हुन-ची के आकाश तथा देह-पो के धरती से संबंध की बात है; तीन हुन और सात पो इसी परंपरा का परिचित संयोजन है। ‘शन-शि’ (神识) चेतना और पहचान पर जोर देता है, जबकि ‘लिंग-थी’ (灵体) देह से अलग दिखाई देने वाले रूप के लिए आता है। बौद्ध अनात्म-विचार इस विषय को बदलती हुई देह, अनुभूति और मानसिक अवस्थाओं से देखता है। ये परिस्थितियों पर निर्भर हैं; इनके पीछे स्वतंत्र और सदा समान रहने वाले स्वामी का विचार त्यागा जाता है। निरंतरता का आशय इसी बदलते जीवन के पहले कर्म और आगे फल के बीच संबंध है। शरीर तथा स्मृति बदलने पर भी वह संबंध आगे खुल सकता है।
तियान-दी की मूल घर वाली भाषा
दूर बस गए किसी व्यक्ति का मूल घर और उसका वर्तमान निवास अलग हो सकते हैं। तियान-दी जीवन के प्रवाह को समझाते समय इसी परिचित संबंध का उपयोग करते हैं। वे स्वर्ग को प्राणियों का ‘युआन-जी’ (原籍, मूल पंजीकृत घर) और मनुष्य-लोक या निचली गतियों में रहने को ‘फ़न-जी’ (分籍, अलग स्थान पर दर्ज निवास) कहते हैं। उनके कथन में देवलोक से नीचे के प्राणी इस क्रम से जुड़े हैं; अन्य बुद्ध-भूमियों से करुणामय संकल्प पूरा करने आए बुद्ध-बोधिसत्त्व अलग स्थिति हैं। घर से दूर होते जाने का अर्थ आदतों से जीवन की निर्मलता का ढकना और नीचे की ओर बढ़ना है। भलाई, मन की शुद्धि और साधना से वापस आने की दिशा बनती है। पास के अन्य उत्तर में न्यायाधिकारी सभी प्राणियों के मूल स्वभाव के प्रकाश की बात करते हैं, जिसे भारी आदतें ढक देती हैं। इसीलिए कठिन अवस्था में पड़े प्राणी में भी फिर समझने और जागने की संभावना रहती है। लौटने की बात उस संभावना को अपने आचरण में विकसित करने का निमंत्रण है।
प्रकाश, आदत और नीचे आती दिशा
प्रकाशमान देवों का धरती पर बस जाना इस परिवर्तन का एक विस्तृत उदाहरण है। मेंग पो के प्रसंग की पृष्ठभूमि समझाते हुए न्यायाधिकारी कहते हैं कि रूपलोक के आभास्वर, चीनी ‘ग्वांग-यिन-थ्येन’ (光音天), से देव धरती पर आए। यहाँ ‘दी-फेइ’ (地肥) नाम का सुगंधित आहार उगता था, जिसका रूप ताजे फल जैसा था। उस पर किसी व्यक्ति का स्वामित्व न होने से उसे खाना चोरी में नहीं आया। देव स्वाद से आकृष्ट हुए और बहुत खा लिया। उनकी ज्योति मंद पड़ी, शरीर भारी हुआ और वापस उड़ जाने की शक्ति चली गई; दूसरी अलौकिक शक्तियाँ उस समय बनी रहीं। उन्होंने धरती पर खेती की और वंश आगे बढ़ाया। आरंभ में शील बना रहा, फिर पीढ़ियों के साथ आसक्ति बढ़ी, शुभ व्यवहार घटा और दुष्कर्मों के अनुसार नरक प्रकट होने लगे। इस धार्मिक विश्व-वर्णन के आरंभिक समय को ‘च्ये-छू’ (劫初, कल्प का आरंभ) कहा जाता है। ‘मो-फा’ (末法) धर्म के लंबे प्रसार के बाद साधना कठिन होने के काल का नाम है। इन विवरणों में बाहरी वस्तु से बढ़ता लगाव जीवन की पहले वाली दशा बदलता है। आगे पीढ़ियों और जन्मों में संचित प्रेम-वैर की स्मृतियाँ भी नए जीवन को उलझाती हैं; मेंग पो का काम उसी कठिनाई से जुड़ता है।
मेंग पो का संकल्प और दायित्व
पिछले जीवन के प्रेम, वैर और परिवार की हर बात याद रहे, तो नया जीवन पुराने संबंधों की खींचतान से घिर सकता है। ‘मेंग पो’ (孟婆) की कथा इस बोझ से राहत देने की इच्छा से शुरू होती है। पुस्तक में वे मानव-लोक की बौद्ध साधिका हैं, जिन्होंने जीवन भर ब्रह्मचर्य, अर्थात् यौन संबंधों से विरति, रखा और कठिनाई में पड़े लोगों की सहायता की। पुराने समाज में स्त्रियों की भूमिका प्रायः संतान और गृहस्थी तक सीमित थी। परिवार तथा संबंधों के दुख से जूझती स्त्रियों को देखकर मेंग पो उनकी सहायता करतीं, समझातीं और हत्या छोड़ने, शाकाहार, सूत्र-पाठ तथा बुद्ध-स्मरण के लिए प्रेरित करती थीं। उनकी इच्छा थी कि ऐसा अहानिकर पेय हो जिससे लोग पीड़ादायक अतीत भूलकर फिर जी सकें। मृत्यु के बाद अपने सत्कर्मों से वे देवलोक पहुँचीं और वहाँ उन्हें निवास मिला। बाद में तियान-दी ने उनके पुराने संकल्प के अनुकूल अधोलोक का दायित्व दिया। दसवें न्यायालय के पीछे ‘यू-वांग थाइ’ (醧忘台) स्थापित हुआ। यहाँ मेंग पो पेय तैयार करवाती हैं, और दूत तथा यक्ष अगले जन्म के लिए जाने वाले प्राणियों को उसे देते हैं।
पेय के पाँच स्वाद—मीठा, खट्टा, कड़वा, तीखा और नमकीन—अगले जीवन के सुख-दुख से जुड़े बताए गए हैं। हर कप में सामग्री के प्रकार समान हैं, पर उनकी मात्रा और पीने वाले का अनुभव बदलता है। अधिक पुण्यफल वाली दशा के लिए मिठास प्रमुख है; कठिन भाग्य वाले को कड़वाहट और खट्टापन अधिक लगता है; साधारण स्थिति में मिले-जुले स्वाद और प्यास बुझने का अनुभव है। बाँटने की व्यवस्था में भी तीन भेद दिखाई देते हैं। अधिक शुभ स्थिति का पेय पारदर्शी पात्र में, साधारण का सफेद पात्र में और कम शुभ स्थिति का काले पात्र में है। उसे देने वाले कर्मचारियों के वस्त्र उसी रंग के हैं। मेंग पो के सहायक दूत और यक्ष इस काम में लगे रहते हैं। एक जैसा दिखाई देने वाला पेय इस तरह अलग कर्मों से बनने वाली अगली दशा का संकेत देता है। नया शरीर और परिवार मिलने पर जीवन फिर खुलेगा, पर उसमें पहले किए हुए कर्मों से बने सुख-दुख के अवसर भी होंगे।
इस विस्मरण की प्रक्रिया में कौन आता है, न्यायाधिकारी इसका दायरा भी स्पष्ट करते हैं। जिन प्राणियों की मृत्यु के बाद गति अधोलोक में हुई और जो वहाँ से नया जन्म लेते हैं, वे मेंग पो का पेय ग्रहण करते हैं। देवलोक, पश्चिम की सुखावती और दूसरी बुद्ध-भूमियों का मार्ग अलग है; वहाँ यह पेय-व्यवस्था नहीं है। पेय के बाद पिछले जीवन के लोग और घटनाएँ भूल जाती हैं, फिर कर्म के अनुसार नए परिजनों के बीच जीवन शुरू होता है। इसलिए स्मृति का छूटना और कर्मफल का आगे चलना एक साथ संभव बताए गए हैं। पुरानी पहचान का सीधा आग्रह कम होता है, पर नए संबंधों में पूर्व कर्म से बनी परिस्थितियाँ फिर उपस्थित रहती हैं। इसी जगह नई शुरुआत का अवसर है। व्यक्ति अब जिन लोगों के साथ रहता है, उनके प्रति करुणा, संयम और ईमानदारी का अभ्यास कर सकता है। आगे का जीवन केवल पुराने संबंधों को दोहराने में नहीं बितता; उसमें नए कर्म करने और मन को सँभालने की जगह भी मिलती है।