प्राणी और जीवन की परिस्थितियाँ
इन लोकों के प्राणी दुख और सुख अनुभव करते, काम करते और सीखते हैं। चीनी ‘झोंग-शंग’ (众生) में मनुष्य के साथ पशु, देव और दूसरी गतियों के जीव भी आते हैं। पुस्तक पशु-जन्म को अधिक बंधनों और कम साधना-अवसरों वाली दशा कहती है; उसके जीवन की रक्षा और पीड़ा के प्रति करुणा का महत्त्व भी इसी से सामने आता है। प्रेत-गति के भीतर अलग स्थितियाँ हैं। छह गतियों के चित्र में बड़े पेट वाले, भूखे और दुबले प्रेत दिखते हैं; सामान्य बस्ती के निवासी स्वतंत्र घूमते और छोटे व्यापार करते हैं। दोनों के जीवन की परिस्थितियाँ अलग हैं। किसी को मृतक कहना उसके मानवीय शरीर की अवधि समाप्त होने की बात है, जबकि प्रेत-गति उसके आगे के जीवन का वर्ग बताती है। लोककथाओं के सूक्ष्म जीवों या रूप बदलने वाली सत्ताओं का परिचय भी उनके गुण और काम से खुलता है। हिन्दी में भूत, प्रेत और राक्षस से अलग चित्र उभर सकते हैं। सामने वर्णित प्राणी कैसे रहता है और क्या करता है, यह जानने पर उसके लिए प्रयुक्त नाम अधिक स्पष्ट अर्थ पाता है।
अधोलोक की साधारण बस्ती में दुकानों का एक लंबा गलियारा है। दोनों ओर भोजन बिकता है, लोग स्वतंत्रता से घूमते और छोटे लेन-देन करते हैं। आकाश धूसर है; सूर्य, चंद्रमा और तारे दिखाई नहीं देते। भोजन ठंडा और इतना हल्का है कि आ-यू को उसमें मनुष्य-लोक की वस्तु जैसा भार अनुभव नहीं होता। एक विक्रेता नया बना शीतल पेय देती हुई कहती है कि इसे पीकर अगले वर्ष फिर पीना होगा। यह सुनकर आ-यू चकित होती हैं और कहती हैं कि पारंपरिक चीनी कवक ‘लिंग-चि’ (灵芝) में भी एक वर्ष तक पोषण देने की ऐसी क्षमता नहीं। हाथ छूने पर विक्रेता आ-यू का शरीर गर्म पाती है और पेय लेने का आग्रह करती है; आ-यू धन्यवाद देकर मना करती हैं। न्यायाधिकारी इस बस्ती का स्थान स्पष्ट करते हैं: काले और सफेद दूत मृतकों को अभिलेख की जाँच के लिए लाते हैं; सामान्य जीवन जीने वाले, जिनमें नरक का कर्म नहीं है, यहाँ रखे जा सकते हैं। बड़े शुभ कर्म वाले ऊपर उठते या मानव-जन्म लेते हैं। यहाँ भोजन का सार स्पर्श से ग्रहण किया जाता है और एक बार लगभग वर्ष भर तृप्ति रहती है। आयु तीन सौ से पंद्रह सौ वर्ष है; शुभ संस्कार और साधना से यह अवधि पहले पूरी होकर मनुष्य या देव की गति भी मिल सकती है।
अपने घर में जीवित परिजन जो अर्पण करते हैं, उसका संबंध भी न्यायाधिकारी इसी बस्ती के पूर्वजों से जोड़ते हैं। उनके अनुसार पूर्वजों की स्मृति के छिंग-मिंग पर्व पर साल में एक बार दिया हुआ भोजन यहाँ वर्ष भर की तृप्ति दे सकता है। अर्पण में शाकाहारी भोजन, फूल और फल बताए गए हैं। मांस के अर्पण से पूर्वज का कर्मभार बढ़ता है, इसलिए परिवार से ऐसे आहार के चयन की अपेक्षा है जिससे उसके हित की कामना पूरी हो। न्यायाधिकारी इसके बाद सूत्र-पाठ, बुद्ध-स्मरण और पुण्य के समर्पण को अधिक उत्तम बताते हैं। परिजन जो सत्कर्म करते हैं, उसका पुण्य पूर्वजों के कल्याण के लिए अर्पित करते हैं, ताकि वे कठिन दशा से ऊपर उठ सकें। पालन-पोषण के उपकार का प्रत्युत्तर इस प्रकार केवल स्मृति में सीमित नहीं रहता। वर्तमान जीवन में की गई भलाई, उस प्रियजन की आगे की यात्रा के लिए भी सहायता बनती है। पूर्वज के प्रति आभार और अपने व्यवहार का सुधार इसी जगह एक साथ आते हैं।
अवस्थाएँ और उनके बीच परिवर्तन
देह की अवधि पूरी होने से लेकर नया जन्म मिलने तक, वर्णनों में कई अलग घटनाएँ आती हैं। दूत का आना, अभिलेख देखना और आगे की जगह तय करना एक न्यायिक क्रम है। दो जन्मों के बीच की मध्यवर्ती अवस्था, निर्णय की प्रतीक्षा और प्रेत-बस्ती में जीवन बिताना अलग-अलग स्थितियाँ हैं। शिशु-प्राणियों के लिए बताए गए नगर उनके विशेष प्रसंग से जुड़े हैं। नया जन्म मिलने पर नई देह और नई परिस्थितियों में जीवन खुलता है। इसके विपरीत, पुनर्जीवन कहने पर पहले वाले शरीर में जीवन-क्रिया लौटने की बात होती है। किसी मृतक का दिखाई देना उसके प्रकट होने का प्रसंग है; कोई जीवित व्यक्ति देह से अलग रूप में उपस्थित हो तो उसकी मानवीय आयु अभी बची होती है। समय और शरीर की दशा इन घटनाओं को पहचानने में सहायता करते हैं। एक अवस्था में पहुँचना भी पूरा जीवन-क्रम समाप्त हो जाना नहीं है। आगे की साधना, सहायता और बदले हुए कर्म उस प्राणी को दूसरी दशा में ले जा सकते हैं। इसीलिए पुस्तक स्थानों के साथ उनके बीच के परिवर्तनों का भी वर्णन करती है।
सुनने और सीखने का अवसर दंड भोग रहे प्राणी के सामने भी खुल सकता है। अधोलोक में क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व के उपदेश के लिए ‘मिंग ग्वांग छू चुआन’ (冥光初转) नाम की सभा है। न्यायाधिकारी बताते हैं कि किसी में एक क्षण का सच्चा पश्चात्ताप उठे, तो उसे वहाँ जाकर सुनने के लिए अस्थायी दंड-विराम दिया जा सकता है। इतनी-सी जागृति को सहारा देना उस व्यवस्था का करुणामय आशय है। लंबे समय की आदतें फिर मन को खींच सकती हैं; दुख और पुराने कर्म के बीच नए संकल्प पर टिकना कठिन भी हो सकता है। इसलिए सुनने का अवसर, भीतर समझ का विकसित होना और आगे आचरण बदलना अपनी-अपनी भूमिका रखते हैं। दूसरी जगह फल की अवधि पूरी होने, परिजनों से सहायता मिलने और अपने शुभ संस्कार जागने की स्थितियाँ भी आती हैं। उनके बाद किस मार्ग पर जाना है और नए जीवन में कौन-से शेष फल सामने आएँगे, यह संबंधित निर्णय बताता है। कठिन अवस्था से मिला अवकाश उस जीवन को फिर सँभालने का समय देता है।
गर्भ-प्रवेश का सूत्र-संदर्भ
पिछला जीवन समाप्त होने के बाद अगले जन्म के माता-पिता से संबंध कैसे बनता है? इस बात पर आ-यू बौद्ध सूत्र का सहारा लेती हैं। वे महा रत्नकूट के चीनी पाठ, 大宝积经, के छप्पनवें खंड में ‘गर्भ-प्रवेश’ संबंधी चौदहवीं सभा का पहला भाग उद्धृत करती हैं। उसमें गर्भ में प्रवेश से पहले की मध्यवर्ती अवस्था का प्राणी ‘झोंग-योउ’ या ‘झोंग-यिन’ (中有/中阴) कहलाता है। पुराने कर्म के अनुसार उसका रूप और गमन बताया गया है: देवगति की ओर सिर ऊपर, नरकगति की ओर नीचे तथा मनुष्य, पशु और प्रेत के मध्यवर्ती रूप की दिशा आड़ी होती है। वह दूर से जन्म का स्थान देख सकता है। माता-पिता और संतान में परस्पर संबंधित कर्म हों, तभी गर्भ-प्रवेश की परिस्थितियाँ बनती हैं। सूत्र इसके बाद प्रवेश से ठीक पहले के मोह को समझाता है: पुरुष मध्यवर्ती प्राणी माता की ओर आकृष्ट और पिता के प्रति विरुद्ध होता है; स्त्री रूप में क्रम उलटा है। ये आकर्षण और विरोध उस संक्रमण की चेतना को विशेष गर्भ की ओर खींचने का वर्णन हैं। मध्यवर्ती अवस्था के अस्तित्व पर बौद्ध परंपराओं में अलग चर्चा भी है; कथावत्थु 8.2 का थेरवाद तर्क इससे भिन्न है। यहाँ आ-यू ने जिस आधार को चुना है, वह यह चीनी सूत्र-पाठ है।