अनुभव के छह द्वार
पढ़ा हुआ कोई शब्द पुरानी बात याद दिलाता है; सुनी हुई आवाज़ मन में आकर्षण या अप्रसन्नता जगा सकती है। ऐसे अनुभवों में वस्तु तक पहुँचने का माध्यम और उसे पहचानने की चेतना साथ काम करते हैं। बौद्ध भाषा में आँख, कान, नाक, जीभ, शरीर और मन छह इन्द्रिय-आधार हैं; चीनी में इन्हें ‘ल्यू-गन’ (六根) कहा जाता है। देखने, सुनने, सूँघने, स्वाद जानने, स्पर्श जानने और मानसिक विषय पहचानने की चेतना छह विज्ञान, 六识, हैं। मन के विषयों में स्मृति, कल्पना और विचार भी आते हैं। आँख से शब्द दिखाई दिया, उसका अर्थ समझा गया, स्मृति जागी और उसके बाद बोलने का निर्णय हुआ—एक ही छोटी घटना में कई प्रकार का अनुभव जुड़ गया। साधना उस समय उत्पन्न हो रही आसक्ति, रोष या करुणा पर भी ध्यान देती है। पुस्तक के कुछ दंड-वर्णनों में भी प्रकाश, आवाज़, जीभ और पूरे शरीर का अनुभव साथ आता है। छह आधारों और उनकी चेतना का यह परिचय उस पारस्परिक संबंध को समझने में मदद करता है।
कर्म के अनुरूप सामने आने वाला जगत
दंडस्थल में सामने आने वाली चीजें अक्सर उसी काम से जुड़ती हैं जिसे व्यक्ति ने जीवन में किया या फैलाया था। जिस चित्र से वह दूसरों को लुभाता था, उससे जुड़ा आकर्षण अब उसके अपने अनुभव में आता है; जिस वाणी से किसी को भटकाया था, उसका फल जीभ, आवाज़ और शरीर के कष्ट से व्यक्त होता है। न्यायाधिकारी इस संबंध को पहले किए अशुभ कर्म का अनुरूप फल कहते हैं। चीनी बौद्ध व्याख्या में भी मन और कर्म के अनुरूप जगत अनुभव में आने की बात है, जिसके लिए शूरंगम सूत्र में 循业发现 पद मिलता है। उसी सूत्र की पृष्ठभूमि में छह आधारों से एक-दूसरे में जुड़कर फल भोगने को 六交报 कहा जाता है। इन शिक्षाओं से अनुभव का संबंध समझ में आता है; पुस्तक के दृश्य में निर्णय समझाने वाले न्यायाधिकारी, व्यवस्था चलाने वाले दूत और वर्णित साधन भी अपने काम में उपस्थित हैं। दृश्य के बाहरी क्रम और मन में बनी आदत का संबंध साथ पढ़ने पर उस दंड का आशय खुलता है। आगे की परिस्थितियाँ बदलने के लिए उसी आदत को पहचानना और उसका पोषण रोकना आवश्यक होता है।
इलेक्ट्रॉनिक पर्दा और फैलती हुई सामग्री
इलेक्ट्रॉनिक पर्दे पर दिखाई देने वाली सामग्री दंडित प्राणियों को पास खींचती है, और वही यंत्र पीड़ा देता है। चमकते पर्दे वाले नरक के वर्णन में यह विरोध प्रमुख है। मूल पाठ इसे अश्लील सामग्री के निर्माण और प्रसार से जोड़ता है—पुस्तक-पत्रिका, चित्र, सीडी, दृश्यांश और ध्वनि, जिन्हें जानबूझकर वेबसाइट पर रखा या आगे साझा किया गया हो। प्राणियों को आकर्षक सामग्री दिखाई देती है; आ-यू के वर्णन में लाल प्रकाश वाला दंड-यंत्र है, जिससे आँखों और पूरे शरीर को कष्ट पहुँचता है। न्यायाधिकारी बनाने और फैलाने वाले की जिम्मेदारी अलग बताते हैं। निर्माण से सामग्री उपलब्ध होती है, आगे भेजने से अधिक लोग उससे जुड़ते हैं; प्रसार करने वाले का दंड निर्माता से हल्का कहा गया है। यहाँ कंप्यूटर की भूमिका शब्द, चित्र और आवाज़ को बहुत-से लोगों तक पहुँचाना है। एक व्यक्ति की सामग्री दूसरे के मन में इच्छा या आदत को बल देती है, फिर उसके माध्यम से और आगे जा सकती है। आधुनिक साधन इस तरह कर्म और उसके फल की व्याख्या में अपना विशिष्ट काम करता है।
प्रभाव कितनी दूर चलता है
बनाने या भेजने का काम पूरा हो जाए, तब भी प्रभाव जारी रह सकता है। इस स्थान से निकलने की शर्त में वही आगे का प्रभाव आता है। निर्माता के लिए मूल उत्तर कहता है कि बनाई हुई सामग्री इंटरनेट से पूरी तरह मिटे। उसे आगे फैलाने वाले के लिए शर्त है कि प्रभावित लोग सुधार करें और उस सामग्री को देखने से उत्पन्न हुए अनुचित कामाचार को छोड़ दें। भेजने में क्षण लगा था, पर उपलब्ध सामग्री और उससे बनी आदतें लंबे समय तक रह सकती हैं। उसी अध्याय में न्यायाधिकारी प्रसार की शुभ दिशा भी बताते हैं। वे आ-यू को इस सदाचार-पुस्तक की सामग्री पहले इंटरनेट पर रखने को कहते हैं, ताकि संबंधित लोग उसे दूसरों तक पहुँचाएँ। इस प्रसार को अभिलेख में बड़े सत्कर्म के रूप में दर्ज करने और माता-पिता की सेवा के समान पुण्य मिलने का कथन है। दोनों प्रकार का प्रसार किसी दूसरे के जीवन में नई सामग्री लाता है; उनका फल उस दिशा से जुड़ता है जिसे वे वहाँ बढ़ाते हैं। इसलिए शब्द और चित्र का असर भेजने के बाद की उनकी यात्रा तक देखा जाता है।
शब्दों की सजावट और उनका असर
स्वास्थ्यवर्धक भोजन समझाने वाला लेख अपने पाठक को अच्छी जानकारी दे सकता था, पर आ-यू जिस लेख का उल्लेख करती हैं, उसमें पाक-विधि के लिए स्पष्ट यौन उपमाएँ चुनी गई थीं। विषय का ज्ञान और मेहनत होते हुए भी अभिव्यक्ति मन को दूसरी दिशा में ले गई। इस प्रश्न से न्यायाधिकारी ‘छी-यू’ (绮语, लुभावनी और भटकाने वाली वाणी) का अर्थ खोलते हैं। झूठी प्रशंसा, हँसी में छिपा कटाक्ष, बढ़ाकर डराना, दूसरों का उपहास और कामना भड़काना इसके रूप हैं। केवल बोलचाल तक इसका विस्तार सीमित नहीं रहता। न्यायाधिकारी गीत, उपन्यास, फिल्म, टेलीविजन, नृत्य, संगीत और चित्रकला भी गिनते हैं, जब उनकी अशोभनीय विषयवस्तु युवा लोगों में लोभ, द्वेष, मोह और हिंसा, चोरी, अनुचित कामाचार तथा झूठ बढ़ाती हो। इस उत्तर में किसी माध्यम के नाम के साथ उसकी सामग्री और प्रभाव की शर्त भी आती है। मनोरंजन देने या किसी को प्रसन्न करने की इच्छा के साथ यह प्रश्न जुड़ जाता है कि चुने हुए शब्द उसके मन में किस बात को बढ़ा रहे हैं।