सेवा करते समय मन में क्या चल रहा है, यह हमेशा बाहर से दिखाई नहीं देता। परिवार के सामने कोई व्यक्ति नम्र रहता है, पर अकेला होने पर थकान के साथ यह शिकायत भी उठ सकती है कि उसे बदले में कुछ नहीं मिला। चीनी नैतिक परंपरा अकेले के इसी समय में मन पर ध्यान रखने को ‘शेन दु’ (慎独) कहती है। थकान पहचान लेने से आराम या सहायता माँगने का रास्ता खुलता है; शिकायत को बार-बार पोसने से वह आगे की बातचीत में कटुता बनकर उतर सकती है। अपने भीतर उठती स्वार्थ की इच्छा को देखना, और फिर तय करना कि उसके अनुसार बोलना है या धैर्य से काम लेना है, इस साधना का विषय है। पुस्तक की भूमिका शुभ और अशुभ विचार को भी कर्म में गिनती है। इसीलिए घर का काम पूरा होने के बाद भी मन की देखभाल शेष रहती है। व्यवहार, उसकी प्रेरणा और बाद में निभाए गए वचन में मेल आने पर कृतज्ञता किसी अवसर की विनम्रता से बढ़कर स्वभाव में बसने लगती है।
संबंध और नैतिक गुण
किसी संबंध की पहचान और उसमें अच्छा व्यवहार करना, दो अलग बातें हैं। मित्र होना एक संबंध है; मित्र को सच बताना और दिया हुआ वचन निभाना उस संबंध में व्यक्त होने वाले गुण हैं। चीनी परंपरा प्रमुख संबंधों को ‘वू लुन’ (五伦, पाँच संबंध) में गिनती है: माता-पिता और संतान, शासक और अधिकारी, पति-पत्नी, बड़े और छोटे, तथा मित्र। इन भूमिकाओं में कैसे जीया जाए, इसे समझाने के लिए ‘वू छांग’ (五常, पाँच स्थायी गुण) आते हैं। ‘रेन’ में दूसरों का ध्यान, ‘यी’ में उचित काम, ‘ली’ में शिष्टाचार और मर्यादा, ‘झी’ में विवेक तथा ‘शिन’ में भरोसेमंदी प्रमुख है। आठ गुणों का नाम ‘बा दे’ (八德) भी मिलता है; अलग ग्रंथों में उसकी दो प्रचलित सूचियाँ हैं। साथ की सारणी उनके पूरे नाम और स्रोत देती है। इन संक्षिप्त नामों की उपयोगिता रोज़ के संबंधों में खुलती है: किसके प्रति जिम्मेदारी है, उसे कैसे निभाना है, और अपने व्यवहार में कौन-सा गुण विकसित करना है।
विवाह में निभाई जाने वाली निष्ठा, जीवनसाथी की मृत्यु के बाद का अकेलापन और विवाह टूटने की स्थिति अलग प्रश्न उठाते हैं। पुराने चीनी समाज में इनके उत्तर स्त्री की निर्धारित पारिवारिक भूमिका से जुड़े थे। ‘सान छोंग सि दे’ (三从四德, तीन अनुसरण-संबंध और चार आचरण-मानदंड) विवाह से पहले पिता, विवाह के बाद पति और पति की मृत्यु के बाद पुत्र का अनुसरण बताता था; साथ में चरित्र, वाणी, रूप-व्यवहार और घरेलू कौशल की अपेक्षाएँ थीं। इसी पृष्ठभूमि में ‘शोउ जिए’ (守节) की प्रशंसा समझ में आती है। इसका व्यापक अर्थ मूल्यवान निष्ठा बनाए रखना है; विधवा के प्रसंग में इसमें जीवनभर पुनर्विवाह न करना भी शामिल है। न्यायाधिकारी दी रेन-जिए के उस प्रसंग को गुप्त पुण्य का उदाहरण कहते हैं जिसमें उन्होंने एक विधवा का आमंत्रण अस्वीकार किया और उसे इसी निष्ठा पर बने रहने की सीख दी। हिंदीभाषी पाठकों के परिचित धार्मिक संसार में दूसरी व्यवस्थाएँ भी हैं। सिख परंपरा विधवा अथवा विधुर को अपनी इच्छा से फिर विवाह करने की स्वीकृति देती है। चीनी प्रसंग पुरानी वैवाहिक निष्ठा को जीवनभर निभाने का आदर करता है; सिख व्यवस्था नए विवाह के साथ पारिवारिक जीवन जारी रखने की जगह देती है।
पुराने परिवारों की कथाओं में किसी स्त्री की कठिन परिस्थिति, किसी पुरुष को मिला सम्मान, या धन और प्रतिष्ठा का बदलना अक्सर साथ सुनाई देता है। इस पुस्तक में अगले जन्म की चर्चा करते समय भी ऐसी चीनी अभिव्यक्तियाँ आती हैं। ‘न्यू-शन’ (女身) और ‘नान-शन’ (男身) स्त्री और पुरुष शरीर बताते हैं; ऊँच-नीच, सम्मान, अभाव और संपन्नता के शब्द सामाजिक स्थान तथा जीवन में मिलने वाले व्यवहार को बताते हैं। उनमें पुराने समाज की मूल्य-दृष्टि भी बनी हुई है। जब कोई परिणाम मुख्य दंड के बाद आगे के जीवन में बचा रहता है, उसे ‘यू-बाओ’ (余报, शेष कर्मफल) कहा जाता है। उनतीसवें अध्याय में न्यायाधिकारी एक खास व्यक्ति की वाणी से हुई हानि के आगे बने रहने वाले फल की चर्चा इसी तरह करते हैं। भूमिका दूसरी ओर सच्चे पश्चात्ताप, सत्कर्म और धर्म के प्रसार से अगली दशा बदलने की बात कहती है; उसमें स्त्री-जन्म से पुरुष-जन्म की ओर परिवर्तन की पारंपरिक अभिव्यक्ति भी है। पुराने कर्म की बची हुई परिणति और आज किया गया सुधार, दोनों इस भावी जीवन के वर्णन में जगह पाते हैं।
पूर्वज और अधूरे संबंध
परिवार प्रायः दादा-दादी या उनसे एक-दो पीढ़ी पहले के लोगों के नाम याद रख पाता है। इससे भी पीछे उन अनेक पीढ़ियों का जीवन है जिनके श्रम, पालन-पोषण और संबंधों से वर्तमान परिवार बना। ज्ञात और दूर के पूर्वजों को एक साथ स्मरण करने के लिए चीनी में ‘जिउ श्युआन छी ज़ू’ (九玄七祖) का पारंपरिक संबोधन मिलता है। पुस्तक की भूमिका इस संबोधन के साथ पूर्वजों और संबंधियों के धर्म-लाभ तथा दुःख से छूटने की कामना करती है। परिवार की वंशावली उनके नाम और रिश्ते सँभालती है; पूर्वज-स्मरण के अनुष्ठान उस याद को नियमित अवसर देते हैं। पुण्य-समर्पण में आज का परिवारजन कोई शुभ कर्म करके उसके लाभ की कामना दिवंगत के लिए करता है। इस तरह याद रखना, उपकार मानना, अनुष्ठान करना और पुण्य समर्पित करना अपने-अपने काम करते हैं। नाम भूल जाने पर भी पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता दूर की पीढ़ियों तक पहुँच सकती है। उनके हित में की गई उदारता साथ ही उस व्यक्ति के स्वभाव को भी सँवारती है जो आज यह काम कर रहा है।
एक ही परिवार में कहीं सहज स्नेह मिलता है और कहीं बार-बार शिकायत या लेने-देने का तनाव उभरता है। पुस्तक इन भिन्न संबंधों की जड़ें पिछले जीवनों में खोजती है। पुराने उपकार का प्रत्युत्तर ‘बाओ एन’ (报恩, उपकार लौटाना) है; पुरानी चोट से बना बैर ‘बाओ युआन’ (报怨, पुराने वैर का प्रत्युत्तर) में आता है। ‘थाओ झाई’ (讨债) में कोई जीवन अपना शेष दावा लेकर आता है, और ‘ह्वान झाई’ (还债) में पिछला दायित्व चुकाने आता है। यहाँ ऋण में पैसा ही नहीं, सेवा, मदद और किसी को पहुँचाई गई चोट से बचे संबंध भी गिने जाते हैं। न्यायाधिकारी एक ऐसा परिवर्तन भी बताते हैं जिसमें उपकार लौटाने के लिए आया बच्चा नई हानि सहकर रोष से भर जाता है। इसलिए पुराना शुभ संबंध भी आज की देखभाल चाहता है। बच्चे की रक्षा, सम्मान और पालन वयस्क की वर्तमान जिम्मेदारी हैं। घर की किसी खटास को समझकर उसमें धैर्य और सहयोग जोड़ना उसी संबंध के आगे का रूप बदल सकता है; पुराना परिचय आज के व्यवहार के साथ आगे बढ़ता है।
साथ रहने पर लोगों की परिस्थिति जुड़ जाती है, फिर भी हर सदस्य का उत्तर एक जैसा नहीं होता। एक ही कठिनाई में कोई जिम्मेदारी बाँटता है और कोई कटु शब्द कहता है। बौद्ध कर्म-विचार साझा परिस्थिति के लिए ‘गोंग ये’ (共业, सामूहिक कर्म) और अपने इरादे, कार्य तथा फल के लिए ‘बिए ये’ (别业, व्यक्तिगत कर्म) की चर्चा करता है। इनके पीछे पहले किए गए कर्मों की वर्तमान तक चली आई कड़ी ‘सु ये’ (宿业) है। वही कर्म साधना में बाधा डालें तो उनके उस प्रभाव को ‘ये झांग’ (业障) कहा जाता है। फल बनने में पुराने कारण के साथ उपयुक्त परिस्थितियाँ भी मिलती हैं। इसी कारण नया सहयोग किसी पुराने तनाव के बीच प्रवेश कर सकता है। परिवार का एक सदस्य अपनी भूल मानकर कटु बोली छोड़ दे तो परिवर्तन उसके मन में शुरू होता है, पर उसका असर साझा जीवन पर भी पड़ता है। साथ रहने की परिस्थिति सबकी है; उसमें प्रत्येक व्यक्ति क्या जोड़ता है, यह उसके व्यवहार से स्पष्ट होता है।
परिवार का संबंध बनने, निभने और मृत्यु के बाद भी उसकी चिंता रखने में अलग-अलग कर्म जुड़ते हैं। गर्भ में आने की बात समझाते हुए पुस्तक महा-रत्नकूट सूत्र का वह अंश उद्धृत करती है जिसमें माता-पिता और संतान के कर्मगत संबंध मिलने की शर्त है। जन्म के बाद उन्हीं जीवनों के बीच साझा वातावरण और व्यक्तिगत व्यवहार विकसित होते हैं। फिर कोई परिजन संसार से चला जाए तो जीवित व्यक्ति उसके लिए दान, पाठ या अन्य शुभ काम कर सकता है और पुण्य उसी के कल्याण को समर्पित कर सकता है। हिंदी का ‘ऋणानुबंध’ पुराने दायित्वों से बने संबंध को समझने का परिचित धार्मिक शब्द है। पूर्वजों से जुड़ी कुछ पूजा-विधियों में ‘पितृ दोष’ अधूरे अनुष्ठानिक दायित्व का प्रश्न उठाता है। ज्योतिष का ‘ग्रह दोष’ किसी ग्रह के माने गए अशुभ प्रभाव से संबंधित है। इन शब्दों के साथ अलग चिंताएँ सामने आती हैं: परिवार में क्या देना शेष है, कौन-सा अनुष्ठान पूरा करना है, या ग्रहों का प्रभाव क्या है। यिन ल्यू वू छिंग के इन प्रसंगों में ध्यान अपने कर्म और जीवनों के परस्पर संबंध पर है। कोई व्यक्ति आज उदारतापूर्वक दान करता है और उस शुभ कर्म का पुण्य अपने दिवंगत परिजन के कल्याण को समर्पित करता है; इस तरह उसका प्रेम नए सत्कर्म में व्यक्त होता है।