कर्म का नियम किसी के लिए पक्षपात नहीं करता, तो करुणा किस तरह सहायता करती है? पुस्तक का नाम और उसके साथ संलग्न ‘यिन ल्यू वू छिंग, फो योउ छिंग’ नाम का विवेचन इसी प्रश्न के दो जुड़े हुए पहलू खोलते हैं। पहले अध्याय में स्वर्ग के अधिपति तियान-दी शीर्षक के ‘यिन’ को मृतकों के अधोलोक से जोड़ते हैं। ‘ल्यू’ में वे चार प्रकार के नियम गिनाते हैं: बुद्ध का अनुशासन, स्वर्ग के नियम, अधोलोक के नियम और मानव-जीवन के नियम। ‘वू छिंग’ उनकी निष्पक्षता बताता है; व्यक्ति के कर्म का फल उसके काम और परिस्थितियों से तय होता है। संलग्न विवेचन आगे समझाता है कि फल अभी पूरा बना न हो, तो उसे पकाने वाली परिस्थितियाँ बदली जा सकती हैं। कोई अपना हानिकारक आचरण छोड़ता है, पश्चात्ताप करता है और भलाई शुरू करता है, तो आगे फलने के लिए नए कारण भी उपस्थित होते हैं। बुद्ध-बोधिसत्त्व की करुणा उसे यही समझ और सहारा देती है। इस प्रकार सुधार के लिए मिला अवसर भी कारण और फल के उसी संबंध में अपना काम करता है।
पश्चात्ताप का पहला काम अपने किए को पूरी तरह स्वीकार करना है। किसे दुख पहुँचा, किस इच्छा ने उस काम को बार-बार करवाया और अब उसे कहाँ रोकना है—इन बातों को समझने पर पछतावा व्यवहार में उतरने लगता है। छल करने वाला सच बोलने और भरोसा निभाने का अभ्यास करता है; दूसरे को कष्ट देने वाला उस कष्ट का कारण बनना छोड़ता है; केवल अपना लाभ देखने वाला दूसरों की जरूरत पर भी ध्यान देता है। पुस्तक में नरक उन्हीं दुष्कर्मों का फल है जिन्होंने जीवन को उस दशा तक पहुँचाया। उससे निकलने की राह में अपना आचरण बदलना इसलिए केंद्रीय है। बुद्ध-बोधिसत्त्व के उपदेश, पहले से मौजूद शुभ संस्कार और दूसरों की सहायता उस परिवर्तन को सहारा दे सकते हैं। नया अवसर मिलने के बाद भी देखभाल आवश्यक रहती है। पुरानी आदत फिर अपनाने पर उसी प्रकार के दुख के कारण फिर बनेंगे। अपने निर्णय पर टिकना, हानि का दोहराव रोकना और भलाई को रोज़ के व्यवहार में स्थान देना, मिले हुए अवसर को स्थायी सुधार की ओर ले जाता है।
कौन-सा कथन कहाँ से आता है
किसी पृष्ठ पर आ-यू अपना देखा हुआ प्रसंग लिखती हैं, फिर प्रश्न करती हैं और न्यायाधिकारी उसका उत्तर देते हैं। दूसरे स्थान पर उसी विषय को समझाने के लिए बौद्ध सूत्र का अंश आता है। पढ़ने में यह अंतर उपयोगी है: एक व्यक्ति का अनुभव सामने रखता है, दूसरा विशेष घटना की परिस्थितियाँ समझाता है और तीसरा किसी परंपरागत शिक्षा को उसके ग्रंथ से लाता है। भूमिका तथा उपसंहार में उनके लेखकों की बात है; मूल टिप्पणियाँ किसी नाम, वाक्य या विधान को खोलती हैं। इस परिचय में जो सांस्कृतिक स्पष्टीकरण जोड़े गए हैं, वे इन पाठों तक पहुँचने में सहायता करते हैं। इस तरह छह प्रकार की आवाज़ें अपने-अपने काम के साथ दिखाई देती हैं। ‘मैंने देखा’ से लेखिका का विवरण शुरू होता है; न्यायाधिकारी का उत्तर उस समय पूछे गए प्रश्न का आशय बताता है; सूत्र का नाम उसकी शिक्षा का स्रोत पहचानाता है। कथन के साथ इतना परिचय रहने पर उसे उसके उचित विस्तार में समझना सहज होता है, और बार-बार बोलने वाले का परिचय दोहराए बिना विचार आगे बढ़ सकता है।
लोग एक-दूसरे को जिस नाम से पुकारते हैं, उससे उनका संबंध भी खुलता है। घर-परिवार में रहते हुए बौद्ध अभ्यास करने वाला ‘च्यू-शि’ (居士, गृहस्थ साधक) है; प्रव्रजित भिक्षु और भिक्षुणी संघ के जीवन तथा उसके अनुशासन में रहते हैं। धार्मिक शिक्षा और साधना से जुड़ा आदरसूचक संबोधन ‘फ़ा-शि’ (法师) है। किसी शिक्षक से सीखने वाला उसका शिष्य होता है, और उससे मिली शिक्षा गुरु-परंपरा से जोड़ती है। एक गुरु या साधना-परंपरा के साथी ‘थोंग-मेन’ (同门) हैं; उनके बीच ‘शी-श्योंग’ (师兄) सम्मान का संबोधन है, जो महिला के लिए भी आता है। स्वयं को बाद में सीखने वाला बताकर विनय रखने के लिए ‘होउ-श्युए’ (后学) कहा जाता है। दादा और चाची जैसे संबोधन भी कभी निकटता या आदर व्यक्त करते हैं। पुस्तक में ‘तान आचार्य’ के नाम से आए तान-शंग बौद्ध धर्म की शिक्षा देते हैं। न्यायाधिकारी बताते हैं कि अधोलोक के राजा ने उन्हें इस पुस्तक की पांडुलिपि की समीक्षा का दायित्व सौंपा था। उनका उपनाम ‘वेन-शू मो-च्ये’ (文殊摩诘) है। चीनी में मंजुश्री बोधिसत्त्व को भी ‘वेन-शू’ (文殊) कहते हैं। BLX और XXX जैसे अक्षर किसी का नाम प्रकट किए बिना उल्लेख करते हैं। नाम और उपनाम व्यक्ति की पहचान बताते हैं। हस्ताक्षर से लेखक और तिथि से लिखे जाने का समय पता चलता है।
काम के पीछे का उद्देश्य
किसी जरूरतमंद की मदद करने की इच्छा हुई, फिर उसके लिए समय और वस्तु जुटाई गई, और अंत में सहायता पहुँची। इस छोटे-से क्रम में कारण, परिस्थिति, कर्म और फल का संबंध समझा जा सकता है। मदद की इच्छा काम की शुरुआत है; समय, साधन और मिलने का अवसर उसे पूरा होने में सहारा देते हैं। वास्तव में सहायता देना किया हुआ कर्म है, और उससे आगे बनने वाले संबंधों में उस काम का फल खुलता है। बौद्ध भाषा में सहायक परिस्थितियों को प्रत्यय और चीनी में ‘युआन’ (缘) कहा जाता है। कर्म में शरीर का काम ही नहीं, कही हुई बात और मन का इरादा भी आते हैं। फल प्रकट होने के लिए इनका उपयुक्त परिस्थितियों से मिलना आवश्यक है। इसी कारण शुरुआत और परिणाम के बीच मनुष्य का चुनाव महत्त्व रखता है। हानिकारक इच्छा को बार-बार पोसने से उसके आगे बढ़ने की राह बनती है; उसे पहचानकर छोड़ देना उस क्रम को बदलता है। बाहर से एक जैसा दिखाई देने वाला काम भी इसी भीतर के उद्देश्य से अलग अर्थ पा सकता है।
एक ही दुकान से तीन लोग एक ही तरह का काला वस्त्र खरीदते हैं। पहले को अपने गरीब पड़ोसी की जरूरत याद है। वह गहरा रंग इसलिए चुनता है कि कपड़ा जल्दी मैला न दिखे और पड़ोसी को बार-बार धोना न पड़े। दूसरा सोचता है कि रात में चोरी करते समय काला कपड़ा काम आएगा। तीसरे के मन में कोई विशेष प्रयोजन नहीं; दुकानदार ने कहा, तो उसने खरीद लिया। नगर-रक्षक अधिकारी ‘छंग-ह्वांग’ (城隍) इसी उदाहरण से शुभ, अशुभ और अव्याकृत कर्म का भेद समझाते हैं। पहले खरीदार का उद्देश्य सहायता है, दूसरे का हानि और तीसरे में इस प्रसंग के अनुसार शुभ या अशुभ की कोई निश्चित दिशा नहीं है। छंग-ह्वांग आगे बताते हैं कि जीवन में शुभ कर्म का भार अधिक हो तो मनुष्य या देव की गति मिलती है; अशुभ कर्म की प्रधानता नरक, भूखे प्रेत या पशु की गति की ओर ले जाती है। अव्याकृत कर्म अधिक हों तो सामान्यतः मनुष्य या प्रेत की गति आती है। तीनों खरीद में कीमत चुकाने और कपड़ा पाने की क्रिया समान है; उनके फल को अलग दिशा देने वाला कारण वह उद्देश्य है जिसके लिए कपड़ा खरीदा गया।
काम करने से पहले ही उसका उद्देश्य मन में बनने लगता है। कोई विचार आया तो मन उसके पीछे चल सकता है; उससे होने वाली हानि समझ में आ जाए तो उसे छोड़ भी सकता है। उसी विचार में बार-बार रुचि लेने से तैयारी और फिर व्यवहार की बारी आ सकती है। आत्मप्रस्तावना में आ-यू कहती हैं कि शुभ या अशुभ विचार का संबंध तुरंत अधोलोक के अभिलेख से जुड़ता है। इस कथन में अकेले के मन की दिशा भी महत्त्व रखती है। पुस्तक के कुछ उत्तर विचार को ही दोष में गिनते हैं; कुछ यह भी बताते हैं कि आगे कार्य न किया हो और समय पर सच्चा पश्चात्ताप हो, तो कर्म का भार हल्का होता है। दोनों में विचार उठने के बाद का चुनाव अपना स्थान रखता है। भलाई की इच्छा भी इसी तरह अभ्यास चाहती है। किसी की मदद करने की सोच को लगातार टालते रहना और वास्तव में समय निकालकर सहायता देना, किए हुए कर्म की दृष्टि से अलग हैं। भीतर की सजगता इसलिए हानिकारक इच्छा को आरंभ में रोकती भी है और अच्छे संकल्प को काम तक पहुँचने का सहारा भी देती है।