दिन भर की थकान, ध्यान का बार-बार भटकना और किसी आदत को छोड़ने में होने वाली कठिनाई, शरीर तथा मन को अलग करके समझने नहीं देते। भोजन, विश्राम, काम और दूसरों की देखभाल के लिए वही शरीर चाहिए जिससे इच्छा पूरी करने की चेष्टा भी होती है। इसीलिए यिन ल्यू वू छिंग में शरीर सँभालने की चर्चा आचरण के साथ चलती है। जिस इच्छा की ओर ध्यान बार-बार जाता है, उसके लिए अवसर खोजने और उसके अनुसार काम करने की आदत भी बन सकती है। पुस्तक संयम के माध्यम से इस क्रम को सँभालना चाहती है। देखने-सुनने का चुनाव, दिनचर्या और संबंधों में निभाई जाने वाली मर्यादा, सभी में अभ्यास की जरूरत पड़ती है। शरीर की शक्ति बचाकर उसे सीखने, सेवा और साधना में लगाना इस चीनी धार्मिक दृष्टि में मनुष्य-जन्म का उपयोग है। इसी चिंता को समझने के बाद उसके पुराने शरीर-विषयक शब्द और दैनिक नियम भी स्पष्ट होते हैं: वे बताते हैं कि किस शक्ति को सँभालना है, कहाँ रुकना है और अपने व्यवहार को किस ओर ले जाना है।
जिंग, ची और शेन
बार-बार की असंयत आदत शरीर को किस तरह हानि पहुँचाती है, यह समझाते समय न्यायाधिकारी उसकी तीन अमूल्य शक्तियों की बात करते हैं। उनके लिए चीनी नाम ‘जिंग’ (精, सूक्ष्म जीवन-संचय), ‘ची’ (气, सक्रिय जीवन-शक्ति) और ‘शेन’ (神, मानसिक सजगता तथा चेतना) हैं। जिंग शरीर के पोषण और संचित आधार पर, ची उसके चलने तथा कार्य करने की शक्ति पर, और शेन मन की स्पष्टता पर ध्यान देता है। न्यायाधिकारी इन्हें मनुष्य-शरीर के तीन रत्न कहते हैं। उनके उत्तर में अनियंत्रित इच्छा और बार-बार दोहराए गए व्यवहार से इनका क्षय जुड़ता है। यह शरीर को देखने की वह चीनी भाषा है जिसमें भीतर पोसी गई प्रवृत्ति और उसके अनुसार किया गया काम साथ समझे जाते हैं। इसलिए आदत बदलने का प्रयत्न केवल बाहरी अवसर हटाने तक सीमित नहीं रहता: ध्यान किस ओर लगा है और कितनी देर उसी इच्छा को मन में बनाए रखा जाता है, यह भी उसके भीतर आता है। सँभाली गई शक्ति फिर दूसरे की सेवा, अध्ययन और अभ्यास में लग सकती है।
तीन रत्नों के दो संदर्भ
जिस आश्रय से साधक अपना जीवन सँवारना चाहता है, उसके लिए बौद्ध धर्म में भी तीन रत्नों का नाम आता है। वहाँ बुद्ध, धर्म और संघ अभिप्रेत हैं। बुद्ध जागृति प्राप्त शिक्षक और साधना के आदर्श हैं; धर्म उनकी शिक्षा तथा उसे आचरण में उतारने का मार्ग है; संघ इस मार्ग का अभ्यास करने वाला समुदाय है। शरीर के तीन रत्नों की चर्चा पोषण, शक्ति और चेतना पर केंद्रित थी, जबकि यहाँ शरण, सीखने और साधना का संबंध खुलता है। इसलिए ‘तीन रत्न’ सुनते समय उसके साथ चल रही बात भी अर्थ बताती है। भारतीय शरीर-विचार के ‘प्राण’ और ‘ओजस्’ जैसे शब्द कुछ परिचित पक्ष समझने में मदद करते हैं: प्राण जीवन-शक्ति या जीवन-श्वास की चर्चा में आता है और ओजस् सूक्ष्म बल तथा जीवनी-शक्ति की चर्चा में। ची के सक्रिय पक्ष और जिंग के संचय वाले पक्ष से इनकी तुलना की जा सकती है। हर नाम का पूरा अर्थ अपने परंपरागत अभ्यास और शरीर-विचार में खुलता है। साथ की सारणी शरीर की इस शब्दावली और धार्मिक शरण के त्रिरत्न को उनके काम के अनुसार रखती है।
शरीर के अन्य पारंपरिक शब्द
एक अल्पायु बालक की चर्चा में न्यायाधिकारी ‘गुर्दे की शक्ति क्षीण होने’ की चीनी अभिव्यक्ति प्रयोग करते हैं; दूसरे उत्तर में वे कहते हैं कि कामना उठने से मूल जीवन-शक्ति खर्च होती है। इन वाक्यों में शरीर की समझ संचय, सक्रियता और संतुलन से जुड़ी है। चीनी परंपरा गतिशीलता और स्थिरता, उजाले और अँधेरे, गर्मी और ठंडक जैसे परस्पर जुड़े पक्षों को ‘यिन’ (阴) और ‘यांग’ (阳) से समझाती है। ‘युआन यांग’ (元阳) मूल यांग-शक्ति है, जबकि ‘छुन यांग’ (纯阳) उसके भरपूर या विशुद्ध होने की अभिव्यक्ति है। पारंपरिक गुर्दा-तंत्र की संचित सूक्ष्म शक्ति ‘शन जिंग’ (肾精) और उसकी कार्यशील शक्ति ‘शन ची’ (肾气) कहलाती है। सामान्य शारीरिक भाषा में गुर्दा एक अंग है; इन पारंपरिक पदों में उसका पोषण और कार्य-संबंध भी जुड़ता है। ‘चेन-ची’ (真气) मूल जीवन-शक्ति को कहता है। उच्चारण में निकट 神 और 肾 अक्षरों को साथ देखने से अर्थ साफ रहता है: पहला मानसिक चेतना का, दूसरा गुर्दे का शब्द है।
मनुष्य और व्यापक जगत
शरीर और मन के इस संबंध से पुस्तक की दृष्टि आसपास के संसार तक फैलती है। भूमिका में व्यक्ति को छोटा संसार और व्यापक प्रकृति को बड़ा संसार कहा गया है। मनुष्य तथा विश्व के बीच ऐसी प्रतिक्रिया के लिए चीनी नाम ‘तियान रेन गान यिंग’ (天人感应) आता है। अलग संवादों में इसका विस्तार अलग वक्ता करते हैं: स्वर्ग के अधिपति अशुभ विचारों से स्वर्गीय महल के धूमिल होने की बात कहते हैं; दोंग-युए सम्राट मौसम के असंतुलन, सुनामी, बाढ़, अग्निकांड, भूकंप और महामारियों को जीवों के सामूहिक कर्म से जोड़ते हैं। इन धार्मिक कथनों में किसी का निजी आचरण व्यापक जगत से जुड़ा माना गया है। अपनी इच्छा को सँभालना इसलिए केवल निजी सुविधा का प्रश्न नहीं रहता; वह दूसरे जीवनों के प्रति जिम्मेदारी का विषय भी बनता है। छल और हिंसा रोकना, दूसरों को सहारा देना तथा अपने मन को शांत करना उसी जिम्मेदारी को निभाने के तरीके हैं। व्यक्ति का सुधार और समस्त जीवों के कल्याण की कामना इस प्रकार पुस्तक में साथ रखे गए हैं।