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《阴律无情》文化导读 · HI

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किसी आदत में टिकाऊ परिवर्तन के लिए साधक स्वयं कुछ मर्यादाएँ स्वीकार करता है। बौद्ध जीवन में घर-परिवार के बीच अभ्यास करने वाले और घर छोड़कर संघ में रहने वाले साधक अपने जीवन तथा ग्रहण किए हुए शील के अनुसार चलते हैं। पूर्ण प्रव्रजित अनुशासन की उपसंपदा प्राप्त पुरुष ‘भिक्षु’ और उसी पूर्ण संन्यास-अनुशासन की स्त्री ‘भिक्षुणी’ कहलाती है। आ-यू अपना परिचय त्रिरत्न की शरण लेने वाली, पाँच शील मानने वाली और लंबे समय से शाकाहारी गृहस्थ साधिका के रूप में देती हैं। पाँच शील जीवों की हत्या, दूसरे की वस्तु लेने, अनुचित काम-व्यवहार, असत्य और मद्य से विरति सिखाते हैं। उनके उपदेश का दैनिक विस्तार पुस्तक में स्पष्ट है: कार्यालय की वस्तु निजी काम में लेने पर अनुमति देखी जाती है; भोजन में पशु-स्रोत और मदिरा की मात्रा पर भी ध्यान आता है। आ-यू कहीं बोधिसत्त्व का उपदेश संक्षेप में कहती हैं और कहीं सूत्र उद्धृत करती हैं। किसी उद्धृत शिक्षा में भिक्षु को सीधे संबोधित किया गया हो तो उसकी संघीय जीवन-पद्धति उस वाक्य की समझ में शामिल रहती है।

इच्छा, संबंध और आचरण

दांपत्य की निष्ठा पर बात करते समय विवाह के बाहर का संबंध सहज ही सामने आता है। इस पुस्तक की चर्चा उससे आगे जाकर विवाह-पूर्व की कुछ परिस्थितियों, कामना को बढ़ाने वाले चित्र और लेख, अश्लील सामग्री के प्रसार तथा उससे जुड़े उपकरणों तक पहुँचती है। इन सबके लिए वह ‘श्ये यिन’ (邪淫) का व्यापक चीनी पद प्रयोग करती है। पति-पत्नी के व्यवहार के लिए भी समय, स्थान और शरीर-संबंधी मर्यादाएँ बताई गई हैं। न्यायाधिकारी के उत्तरों में मन में उठी इच्छा, उसे लगातार बढ़ाना और उसके अनुसार काम करना अलग चरण हैं। सत्ताईसवें अध्याय के अपने विवेचन में न्यायाधिकारी समलिंगी प्रेम और उससे जुड़े विचार तथा व्यवहार को भी इसी वर्ग में रखते हैं; सामान्य कथन और पूर्वजन्म की प्रवृत्ति से जोड़ी गई खास परिस्थिति के लिए वे अलग अवधियाँ कहते हैं। पूरी शर्तें संदर्भ-सारणी में साथ दी गई हैं। इस वर्ग को समझने के लिए संबंध की स्थिति, इच्छा, भागीदारी और बाद का व्यवहार सभी देखने पड़ते हैं। पुस्तक पश्चात्ताप, उस आचरण को रोकने तथा दूसरों को उससे हटाने की सहायता को आगे के फल से जोड़ती है।

दांपत्य की तीन शर्तें

विवाह का संबंध स्वीकार होने पर भी पुस्तक कुछ अवसरों पर पति-पत्नी से संयम चाहती है। धार्मिक स्मरण और व्रत के दिन, बीमारी का समय, तथा निजी जीवन के लिए उचित स्थान इसी विचार में आते हैं। अनुपयुक्त समय को ‘फ़ेइ शी’ (非时), अनुपयुक्त स्थान को ‘फ़ेइ दी’ (非地) और निर्दिष्ट जनन-मार्ग के अतिरिक्त शारीरिक स्थान को ‘फ़ेइ ची’ (非器) कहा गया है। समय की सूची में बुद्ध-बोधिसत्त्वों के स्मरण-दिन, उपवास के दिन और महीने, दिन का उजाला, परिजन के खास उत्सव या मृत्यु-स्मरण के दिन तथा किसी साथी की बीमारी हैं। अन्य उत्तर मासिक धर्म, गर्भावस्था और स्तनपान को भी जोड़ता है। स्थान के लिए एक अनुच्छेद पति-पत्नी के शयन-बिस्तर की सीमा बताता है; दूसरा उसके बीच के हिस्से को निर्दिष्ट करता है, बाहर खड़े पुरुष और बिस्तर के किनारे स्थित स्त्री का उदाहरण भी उसी में है। शरीर-संबंधी शर्त स्त्री के जनन-मार्ग के अतिरिक्त भागों पर लागू कही गई है। ये तीन प्रश्न अलग हैं—कब, कहाँ और शरीर के किस भाग में—और साथ ही इच्छा, सहमति तथा बाद का आचरण भी निर्णय में देखा जाता है। पुस्तक इन्हें सबके आचरण पर लागू अधोलोक के नियम कहती है। शील ग्रहण करने वाला साधक इन्हीं सीमाओं को निभाने की अपनी प्रतिज्ञा भी लेता है।

व्यक्ति की इच्छा और सुधार

एक ही नियम के भीतर व्यक्ति की भागीदारी अलग हो सकती है। मूल पुस्तक ऐसी स्थिति बताती है जिसमें किसी को वैध जीवनसाथी ने बाध्य किया हो, उसके मन में सुख पाने की तनिक भी इच्छा न हो, वह समय रहते पश्चात्ताप और सुधार करे तथा आगे दूसरों को समझाने का संकल्प ले। इन शर्तों के साथ संबंधित नरकदंड से छूट कही गई है। पास के एक दूसरे मामले में पत्नी ने योनि-मार्ग के अलावा किसी दूसरे अंग में यौन क्रिया करने से इनकार किया और पति को भी रोका। निषिद्ध समय और स्थान में वह कम कामना के साथ सहभागी रही थी। न्यायाधिकारी उसके लिए सौभाग्य में हानि बताते हैं, पर इनकार और रोकने से कुछ पुण्य लौटने की बात भी कहते हैं। पति ने पत्नी को बाध्य नहीं किया था, पर अपनी दो नियमित प्रेमिकाओं के साथ समय, स्थान और अंग—तीनों वर्जनाएँ तोड़ी थीं। उसके पश्चात्ताप, माता-पिता की सेवा तथा सार्वजनिक कर्तव्य में निष्ठा और कानून-पालन के कारण तप्त स्तंभ के पाँच सौ वर्ष हटे, पर ताम्र-गोलक के पाँच सौ वर्ष शेष रहे। पत्नी का इनकार और उसकी भागीदारी उसके अपने फल से जुड़े हैं; पति को मिली छूट उसके पश्चात्ताप और शुभ कर्मों से।

पंचांग में समय के कई स्तर

व्रत की तारीख और दिन के समय का अर्थ समझने के लिए चीनी पंचांग की कुछ बातें जानना उपयोगी है। उसके महीने चंद्रमा की कलाओं से जुड़े हैं; ऋतु के परिवर्तन को सूर्य के वार्षिक क्रम से निर्धारित चौबीस ऋतु-चिह्न बताते हैं। एक ही पंचांग इन दोनों को साथ सँभालता है। वर्षों के नाम के लिए दस ‘स्वर्गीय तने’ और बारह ‘पार्थिव शाखाएँ’ क्रम से जोड़ी जाती हैं, जिससे साठ नामों का चक्र बनता है। भूमिका में आया ‘रेन-छेन’ (壬辰) उसी चक्र का उनतीसवाँ नाम है। वह चक्र बार-बार लौटता है, इसलिए किसी खास वर्ष को पहचानने में ग्रंथ का काल भी काम आता है। दिन और रात को बारह पारंपरिक अवधियों में बाँटा जाता है; हर अवधि लगभग दो आधुनिक घंटे है। उदाहरण के लिए ज़ि का समय रात ग्यारह से मध्यरात्रि के बाद एक बजे तक है। इस प्रकार महीने की तिथि, ऋतु-चिह्न, चक्रीय वर्षनाम और समय की अवधि एक साथ लिखी मिल सकती हैं। प्रत्येक समय के अपने पैमाने को बताता है।

संयम और स्मरण के दिन

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