किसी की कठिनाई दूर करने के लिए चुपचाप की गई सहायता का मूल्य तब भी रहता है जब उसकी प्रशंसा करने वाला कोई न हो। चीनी परंपरा ऐसी भलाई को ‘यिन-दे’ (阴德, लोगों की दृष्टि से छिपा सत्कर्म) कहती है। इससे जुड़े दो और शब्द, ‘गोंग-दे’ (功德) और ‘फू-दे’ (福德), साधना तथा शुभ आचरण से अर्जित मूल्य को समझाते हैं। दोनों का आशय संबंधित प्रसंग से खुलता है: कहीं मन को शुद्ध करने का अभ्यास मुख्य है, कहीं दूसरों को दिया गया लाभ। हिन्दी का परिचित शब्द पुण्य इनके अर्थ तक पहुँचने में सहायता करता है। जब चर्चा उस भलाई से मिली अनुकूल जीवन-दशा की हो, तब ‘फू-बाओ’ (福报, शुभ कर्म का फल) आता है। इस तरह काम, उससे अर्जित पुण्य और बाद में मिला सुख एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। पुराने चीनी वर्णन में जीवन के अनुकूल फलों को ‘फू, शोउ, लू’ (福、寿、禄) भी कहा गया है: सुख-सुविधा, आयु और पद से मिलने वाली आजीविका या वेतन। पुस्तक में इनका बढ़ना या घटना मनुष्य के आचरण के साथ समझाया जाता है।
भोजन का उपयोग और कृतज्ञता
रोज़ मिलने वाला भोजन ऐसी अनुकूल स्थिति का एक सीधा उदाहरण है। उसे केवल खरीदी हुई वस्तु समझने पर उसके पीछे के अनेक उपकार छूट जाते हैं। अन्न के प्रश्न पर पान-ग्वान, अधोलोक के न्यायाधिकारी, पहले सूर्य, हवा, पानी और धरती की बात करते हैं। फिर किसान का श्रम आता है: बोना, सींचना, फसल काटना और अनाज तैयार करना। बचपन में माता-पिता इसी भोजन से शरीर को पालते हैं। न्यायाधिकारी इसके साथ पिछले जन्मों के दान, शील और सत्कर्म से अर्जित भोजन-सुख का भी उल्लेख करते हैं। भोजन के लिए आभार में इस प्रकार प्रकृति, श्रम, पालन-पोषण और पुराने पुण्य सब सम्मिलित होते हैं। ‘वू-गू’ (五谷) चीनी में अन्नों का सामूहिक नाम है; अलग ग्रंथों में इसकी सूची में अलग फसलें मिलती हैं। इस प्रसंग में ध्यान उन सब अन्नों पर है जिनसे जीवन को पोषण मिलता है। जरूरत भर लेना, बचा हुआ भोजन सँभालना और उपलब्ध अन्न का उचित उपयोग करना, इन उपकारों का ध्यान रखने के साधारण ढंग हैं।
भोजन से शरीर को बल मिलता है और उसी बल से मनुष्य दायित्व निभाता, सेवा करता और साधना करता है। न्यायाधिकारी उचित भोजन का प्रयोजन इसी तरह समझाते हैं। स्वाद की लगातार खोज में पड़ना और अन्न नष्ट करना फिर इस प्रयोजन से दूर ले जाते हैं। उनके उत्तर में कपड़ा, भोजन, आयु और जन्म के साथ मिलने वाली अनेक परिस्थितियाँ पहले के कर्मों से निर्धारित बताई गई हैं। साधारण जीवन उन्हीं का फल भोगता है, फिर भी बहुत बड़े शुभ या अशुभ कर्म उसकी दिशा बदल सकते हैं। वे बड़े शुभ कर्म के दो रूप बताते हैं। बुद्ध-बोधिसत्त्व अपनी करुणा के संकल्प से लोगों की सहायता करने आते हैं; इसी संकल्प से उन्हें आने-जाने की स्वतंत्रता है और वे शिक्षा देने के लिए कठिन दशा भी प्रकट कर सकते हैं। साधारण मनुष्य भी व्यापक करुणा और लगातार शुभ कर्म से पुण्य बढ़ाकर जीवन को ऊपर ले जा सकता है। भारी दुष्कर्म उसे नीचे ले जाते हैं। भोजन के विषय में यही समझ उपयोग का उद्देश्य स्पष्ट करती है: मिले हुए अन्न से जीवन सँभालना, उसके लिए कृतज्ञ रहना और जहाँ संभव हो किसी भूखे के पोषण का नया कारण बनना।
निजी शौक में बिताया गया समय भी दूसरे प्राणियों के जीवन को छू सकता है। मछली पकड़ने में मनोरंजन करने वाले को अपना आनंद दिखता है; पुस्तक उसी घटना को मछली के कष्ट और उसके जीवन से जोड़कर देखती है। मनोरंजन के दूसरे प्रसंग यौन व्यापार से जुड़े हैं। पुरानी चीनी शब्दावली में ऐसे स्थानों के लिए अलग नाम मिलते हैं। ‘येन-ह्वा’ (烟花) का सामान्य अर्थ आतिशबाजी है, पर पुराने साहित्य में इससे यौन मनोरंजन का परिवेश भी संकेतित होता है। ‘छिंग-लोउ’ (青楼) इसी पुराने प्रयोग में पैसे के बदले यौन सेवाएँ देने वाले वेश्यालय को कहता है। धूम्रपान पर न्यायाधिकारी आदत से जुड़े एक और प्रकार के प्रभाव खोलते हैं: अपने शरीर और आसपास के लोगों को हानि, धन का व्यय, सौभाग्य और आयु का क्षय तथा जन्मजात आध्यात्मिक प्रकाश का मंद पड़ना। उसी उत्तर में वे धूम्रपान छोड़ने, सच्चा पश्चात्ताप करने, पुण्य जुटाने और दूसरों को भी छोड़ने के लिए प्रेरित करने का उपाय बताते हैं। इन उदाहरणों में आचरण का विचार उस आनंद या सुविधा से आगे जाता है जो व्यक्ति को तत्काल मिलती है; जिन जीवनों पर उसका असर पड़ता है, वे भी उसमें आते हैं।
अनुमति और उपयोग का उद्देश्य
रोज़ की किसी वस्तु का उपयोग उसकी कीमत के साथ-साथ इस बात पर निर्भर करता है कि वह किसकी है और उसने कैसी अनुमति दी है। आ-यू क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व के पाँच शीलों का उपदेश दोहराते हुए दफ़्तर के सामान से चोरी का अर्थ समझाती हैं। कंपनी की लेखन-सामग्री अपने काम में लेना या घर ले जाना, निजी फोन करना, मोबाइल चार्ज करना तथा निजी कागजों की फोटोकॉपी या फैक्स बनाना उनके उदाहरण हैं। इन सबकी स्पष्ट शर्त है कि कंपनी की सहमति न मिली हो। जहाँ कंपनी किसी उपयोग की अनुमति देती है, वहाँ उसी स्वीकार किए हुए उद्देश्य और दायरे में बात समझी जाती है। लिखित सूचना सीमा बता सकती है; रोज़ के प्रचलन से भी सहमति तभी स्पष्ट होती है जब कंपनी ने वास्तव में उसे स्वीकार किया हो। यहाँ उपयोग करने वाले से स्वामित्व और अनुमति का सम्मान अपेक्षित है। बिजली का खर्च कम होना या सामान का आसानी से हाथ आ जाना मात्रा और सुविधा बताता है। इस उत्तर में काम की प्रकृति समझने के लिए यह देखना रहता है कि उपयोग मालिक के स्वीकार किए हुए दायरे में हुआ है या नहीं।
किसी वस्तु का उपयोग करते समय उसकी स्थिति और उद्देश्य साथ देखने पड़ते हैं। दफ़्तर के सामान में मालिक की अनुमति निर्णायक थी; आहार और उपचार में सामान्य सेवन तथा प्राण बचाने की आवश्यकता का भेद सामने आता है। पाँच शीलों की इसी व्याख्या में मद्य और मादक पदार्थों के त्याग के साथ शराब मिले खाद्य भी वर्जित कहे गए हैं। उदाहरण है ‘फ़ू-रू’ (腐乳), किण्वित सोया से बना चीनी खाद्य, जिसके अनेक रूपों में मदिरा मिलाई जाती है। दुकानदार मात्रा बहुत थोड़ी बताए, तब भी मदिरायुक्त खाद्य पर यह नियम लागू रहता है। उसी उत्तर में जीवन बचाने के लिए औषधि में मदिरा के उपयोग की विशेष छूट है। स्वाद के लिए चुने गए खाद्य और प्राण-रक्षा के उपचार का उद्देश्य यहाँ अलग है। शराबयुक्त सौंदर्य-प्रसाधन का उल्लेख तीसरे ढंग से आता है: उसके उपयोग से बचना बेहतर कहा गया है। इन तीनों बातों को उनके अपने शब्दों में रखने से सामान्य निषेध, विशेष छूट और सावधानी की सलाह स्पष्ट रहती हैं।
संख्या के साथ उसकी शर्त
किसी फल की संख्या पढ़ते समय यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि वह किस काम की, किस इकाई में और किन शर्तों के साथ बताई गई है। निकट पारिवारिक संबंधों में निषिद्ध यौन आचरण पर एक उत्तर हर बार ‘फू-शोउ’ (福寿, सौभाग्य और आयु) के संयुक्त लेखे से ढाई महीने घटने की बात कहता है। मृत्यु के बाद पाँच दंडस्थल गिनाए गए हैं: उलटा चक्र, तप्त ताँबे का स्तंभ, लोहे का पलंग, ‘येन-ह्वा फान-गुन’ (यौन व्यापार और अश्लील सामग्री से जुड़े दंडों का नरक) और तलवारों का वन। प्रत्येक में पाँच सौ वर्ष का उल्लेख है। न्यायाधिकारी तुरंत जोड़ते हैं कि अंतिम दंड वास्तविक घटना के अनुसार तय होगा। इसलिए इन संख्याओं के साथ उस व्यवहार और व्यक्ति की पूरी परिस्थिति भी आती है। अन्यत्र किसी सूत्र के पूरे पाठों की संख्या दी जाती है, कहीं दिनों की अवधि और कहीं समर्पित पुण्य का हिस्सा। संख्या एक हो सकती है, पर मापी जाने वाली बात अलग होती है। सुधार से जुड़े उत्तरों में भी भावना, पुराना आचरण रोकना, दूसरों को सावधान करना और लगातार शुभ कार्य करना साथ पढ़ने पर ही बताए गए फल का पूरा अर्थ खुलता है।