कैलेंडर के कुछ दिन रोज़ की साधना पर अधिक ध्यान देने के अवसर बनते हैं। चीनी बौद्ध परंपरा में यहाँ अपनाई गई छह व्रत-तिथियाँ महीने की आठवीं, चौदहवीं, पंद्रहवीं, तेईसवीं, उनतीसवीं और तीसवीं हैं। तीन लंबे व्रत-महीने चंद्र पंचांग के पहले, पाँचवें और नौवें महीने हैं। साधक अपने ग्रहण किए हुए नियम के अनुसार भोजन और इंद्रियों का संयम बढ़ाता है, पाठ करता है और शुभ कामों के लिए समय रखता है। बुद्ध तथा बोधिसत्त्वों के स्मरण-दिन वंदना के अवसर हैं; पुस्तक में देवताओं की जाँच के दिन भी आते हैं, जिनका संबंध शुभ-अशुभ कर्म के लेखे से है। संलग्न शोउ-खांग बाओ-जिएन दांपत्य-संयम को तारीख, ऋतु और शरीर की दशा के साथ समझाता है। इन अवसरों की आवृत्ति अभ्यास को नियमित रखती है। किसी तिथि पर लिया संकल्प अगले दिनों के व्यवहार में निभाया जाए तो कैलेंडर का स्मरण दिनचर्या को सहारा देता है। व्रत के दिन भोजन बनाते समय भी वही प्रश्न सामने आता है कि किन पदार्थों का उपयोग किया जाए।
भोजन और जीवन के प्रति करुणा
भोजन की थाली में रखा पदार्थ किस जीवन से और किस तरह मिला है, यही प्रश्न पुस्तक के आहार-विवेचन को आगे बढ़ाता है। जीव की रक्षा और हत्या से विरति उसका आधार है। क्षितिगर्भ के उपदेश को संक्षेप में दोहराते हुए आ-यू मांस के साथ दूध, दुग्ध-पदार्थ, मक्खन, अंडे और शहद छोड़ने की कठोर अपेक्षा रखती हैं। पशुओं से प्राप्त सामग्री वाले सौंदर्य-प्रसाधन और औषधियाँ भी उसी चर्चा में आती हैं। यहाँ विषय स्वाद से आगे बढ़कर उस जीवन और उसे पाने की प्रक्रिया तक जाता है जिससे वस्तु मिली है। इस प्रसंग का शास्त्रीय आधार देते समय शूरंगम सूत्र का अंश उद्धृत होता है; उसमें भिक्षुओं से दूध, दही और घी जैसे पदार्थों के विषय में कहा गया है। आ-यू का संक्षिप्त विवेचन पुस्तक के पाठकों को संबोधित करता है और उसमें अंडे तथा शहद जैसी दूसरी चीजें भी जुड़ती हैं। उद्धृत सूत्र की शिक्षा और लेखिका का विस्तृत उपदेश इसी क्रम में आते हैं। दोनों के साथ उनका संबोधन और पदार्थों की सूची रखने से उस कठोर आहार-संयम की पूरी बात समझ में आती है।
एक पदार्थ के अलग धार्मिक उपयोग
वही दूध या शहद दूसरी धार्मिक व्यवस्था में अलग काम के लिए रखा जा सकता है। घर में दूध आहार है, किसी उपासना में वह प्रतिमा के अभिषेक का पदार्थ है, और भिक्षु की बीमारी में कुछ पदार्थ औषधि माने जाते हैं। स्वामिनारायण परंपरा के कुछ विशेष अनुष्ठानों में दूध और शहद सहित पाँच पदार्थ मिलाकर प्रतिमा को स्नान कराया जाता है। अर्पण करने वाले की श्रद्धा इस पूजा-क्रिया में व्यक्त होती है। पाली विनय में भी कुछ रोगी भिक्षुओं के लिए पाँच औषधियों का उल्लेख है; उन्हें लेने, उपयोग करने और रखने की शर्तें साथ आती हैं। यहाँ उद्देश्य बीमार साधक की देखभाल है। इन परिचित पदार्थों का अर्थ इस बात से खुलता है कि उनका उपयोग कौन कर रहा है, किस काम के लिए कर रहा है और कौन-सी रीति का पालन कर रहा है। आ-यू के आहार-उपदेश में पशु-जीवन के प्रति करुणा तथा इच्छा से विरति प्रधान है। अभिषेक में अर्पण का धार्मिक कार्य और विनय में रोगी की आवश्यकता सामने आती है। सामग्री की पूरी सूचियाँ संबंधित नियमों के साथ पढ़ने पर इन उपयोगों को और स्पष्ट करती हैं।
अन्न, फ़ू-रू और मदिरा का प्रसंग
पौधों से प्राप्त आहार की चर्चा में भी उसके आने और बनने की प्रक्रिया महत्त्व रखती है। खेत का अन्न अनेक हाथों के श्रम से मिलता है, इसलिए उसका सम्मान और संरक्षण सिखाया गया है। चीनी में अनाजों के सामूहिक नाम ‘वू गू’ (五谷) का उपयोग इसी संदर्भ में होता है; पुराने ग्रंथों में गिने गए अनाजों की सूची कुछ बदलती है। दूसरी ओर ‘फ़ू रू’ (腐乳) सोयाबीन के टोफू को किण्वित करके बनाया जाने वाला खाद्य है। उसकी कई विधियों में मदिरा मिलाई जाती है, इसलिए वह मद्य-विरति की चर्चा में आता है। आ-यू उस उत्तर में बहुत थोड़ी मदिरा वाले खाद्य को भी छोड़ने की बात कहती हैं। स्वाद के लिए रोज़ उसे लेना और जीवन बचाने की गंभीर जरूरत में मदिरा को औषधि के रूप में लेना अलग रखा गया है; प्राण-रक्षा वाले औषधीय उपयोग के लिए विशेष छूट है। मदिरायुक्त सौंदर्य-प्रसाधन के विषय में उनका शब्द अधिक हल्का है—उसे टालना बेहतर है। अनाज, किण्वित पदार्थ, औषधि और प्रसाधन अपने-अपने उद्देश्य तथा उसी उत्तर की भाषा से समझे जाते हैं।
करुणा का व्यापक अभ्यास
दूसरे जीव की चिंता भोजन के चुनाव के बाद भी बनी रहती है। किसी पशु का जीवन बंधन, चोट, मनुष्य के काम में लगाए जाने या दूसरों पर निर्भर रहने में बीत सकता है। पुस्तक उसे भी पुनर्जन्म की निरंतर यात्रा में स्थित जीवन मानती है। उसके दुःख को कम करना और उसे हानि से बचाना ‘हू शंग’ (护生, जीव-रक्षा) के व्यापक अर्थ में आता है। पकड़े या बंद किए गए जीव को मुक्त करना ‘फ़ांग शंग’ (放生, जीवों को छोड़ना) उसका एक विशेष काम है। शुभ कर्मों की सूचियों में पुस्तक दान, जीव-रक्षा, मुक्त करना और पुण्य-समर्पण को साथ रखती है। इनमें अपना लाभ देखने के साथ दूसरे की अवस्था पर ध्यान जाता है: सामने का जीव किस तकलीफ में है और कौन-सी सहायता उसे राहत दे सकती है। हानि रोकना, पीड़ित प्राणी को सहारा देना और बंद जीवन को मुक्त करना उसी करुणा के अलग रूप हैं। सहायता पाने वाले को लाभ मिलता है और सहायता करने वाले में धैर्य, उदारता तथा अपनी इच्छा को सीमित रखने का अभ्यास बढ़ता है।