प्रणाम के संकेत और उसका भाव
अंजलि जोड़ना या प्रणाम करना आदर को एक दिखाई देने वाला रूप देता है। इसी परिचित भाव के अनेक चीनी रूप पुस्तक में मिलते हैं: दोनों हथेलियाँ मिलाने को ‘ह शी’ (合十) कहते हैं, घुटनों पर झुकना ‘ग्वेइ बाई’ (跪拜) और माथा जमीन से लगाना ‘खोउ शोउ’ (叩首) है। पूरे प्रणाम की ‘वू थी थोउ दी’ (五体投地) मुद्रा में माथा, दोनों कोहनियाँ और दोनों घुटने भूमि को छूते हैं। इन मुद्राओं का आशय सामने की स्थिति से समझ में आता है। कहीं बोधिसत्त्व के प्रति श्रद्धा है, कहीं गुरु का आभार, और कहीं पीड़ित व्यक्ति अपनी भूल स्वीकार कर सहायता माँगता है। धूप, फूल और आहार की भेंट भी देने वाले की श्रद्धा तथा सहयोग को व्यक्त करती है। जब कथा पश्चात्ताप पर आती है, तब शरीर का झुकना आगे के निर्णय से जुड़ जाता है: व्यक्ति अपना किया पहचानता है, उसे रोकने का वचन देता है और फिर उस वचन को निभाता है। विनय की मुद्रा और आचरण का परिवर्तन साथ होने पर वंदना का अर्थ उस क्षण से आगे दैनिक जीवन तक जाता है।
कई चीनी परंपराओं का संगम
एक ही चीनी पुस्तक में पूर्वजों की सेवा, बुद्धों की करुणा और स्थानीय देवताओं के पद साथ मिलना उसकी धार्मिक पृष्ठभूमि को सामने लाता है। परिवार तथा समाज में मातृ-पितृभक्ति, निष्ठा और सच्चाई जैसे गुणों की चर्चा कन्फ्यूशी नैतिक विचार से जुड़ी है। कर्म, पुनर्जन्म, शील, पश्चात्ताप और पुण्य-समर्पण बौद्ध साधना की भाषा खोलते हैं। स्वर्गीय पद, दी जुन की उपाधियाँ और स्थानीय रक्षा के काम दाओवादी तथा लोक धार्मिक परंपराओं से भी संबंध रखते हैं। घर, मंदिर और नगर की उपासना में ये परंपराएँ एक-दूसरे के पास आती हैं। उनके नामों का अर्थ उनके काम से स्पष्ट होता है: पूर्वज परिवार का इतिहास सँभालते हैं, स्थानीय देवता सुरक्षा और क्षेत्रीय व्यवस्था से जुड़े हैं, और बौद्ध उपदेश दुःख के कारण तथा उससे निकलने का मार्ग समझाते हैं। चीनी सदाचार-साहित्य को ‘शान शू’ (善书) कहा जाता है। यह साहित्य इन अनेक आवाज़ों को सदाचार की चर्चा में स्थान देता है। उपकार लौटाना, भरोसा निभाना, हानि रोकना और दूसरे के हित में काम करना, प्रत्येक परंपरा अपने उदाहरणों और शब्दों से समझाती है।
बुद्ध, धर्म, संघ और बोधिसत्त्व
साधक किससे सीखता है, किस मार्ग पर चलता है और किनके साथ अभ्यास करता है—बौद्ध शरण में ये तीन बातें साथ आती हैं। बुद्ध जागृत शिक्षक हैं, धर्म उनका उपदेश और अभ्यास का मार्ग है, तथा संघ साधना का समुदाय है; इन्हें ही त्रिरत्न कहा जाता है। आ-यू अपनी साधना का परिचय इस शरण से देती हैं। दूसरों के कल्याण के लिए जागृति का संकल्प लेकर काम करने वाले बोधिसत्त्व पुस्तक में बार-बार आते हैं। अवलोकितेश्वर को चीनी में ‘ग्वान यिन’ (观音), मंजुश्री को ‘वेन-शू’ (文殊) और क्षितिगर्भ को ‘दी ज़ांग’ (地藏) कहा गया है। इनके प्रसंगों में क्रमशः करुणा, प्रज्ञा और कठिन गतियों में पड़े जीवों की सहायता प्रमुख है। न्यायाधिकारी अवलोकितेश्वर को बहुत पहले बुद्धत्व प्राप्त झंग फ़ा मिंग तथागत कहते हैं और मंजुश्री के लिए सात बुद्धों की माता का सम्मानसूचक रूपक देते हैं। यहाँ प्रज्ञा को जागृति का पोषण करने वाली शक्ति समझाया गया है। बुद्धों और बोधिसत्त्वों के प्रकाश का परस्पर मिलना उनके ज्ञान तथा करुणा के सहयोग को व्यक्त करता है। यह करुणा मित्र-विरोधी, जातीय समुदाय और धार्मिक समूह के भेद से परे समान रूप से पहुँचती है।
करुणा और कारण-कार्य का क्रम
सहायता मिलने पर पीड़ित के भीतर क्या बदलता है, यह उद्धार के प्रसंगों का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। न्यायाधिकारी कहते हैं कि बोधिसत्त्व नरक में तब जीव के मन की ओर देखते हैं जब उसमें सच्चा पश्चात्ताप जागता है और उसके स्वभाव के सँभलने की परिस्थितियाँ बनती हैं। वह अपने किए से पैदा हुआ दुःख समझ सके, पुराना काम रोके और शुभ आचरण की ओर चले—करुणामय सहायता उसे ऐसा अवसर देती है। इसीलिए पुस्तक बुद्धों और बोधिसत्त्वों के उद्धार को भी कर्मफल के नियम के अनुसार रखती है। पीड़ा शांत होने से कोई बोल पाता है, उपदेश सुनकर अपने दोष पहचानता है, और फिर अगले जीवन के लिए सदाचरण का संकल्प लेता है। परिजन का दान, सूत्र-पाठ और पुण्य-समर्पण भी सहायता में जुड़ सकते हैं। पहले के शुभ कर्म, अभी की मनोदशा और सचमुच किया गया सुधार, प्रत्येक का अपना योगदान है। करुणा का कार्य इन परिस्थितियों में सहायता पहुँचाना है; उस सहायता को ग्रहण करके बदलने वाला जीवन भी उसी घटनाक्रम का सक्रिय भाग रहता है।
क्षितिगर्भ और उनके सहचर
किसी बौद्ध प्रतिमा में हाथ की वस्तु और साथ खड़े सहचर अक्सर उसकी पहचान बताते हैं। उनतीसवें अध्याय में क्षितिगर्भ भिक्षु के वेश में नील कमल पर बैठे हैं। उनकी दोनों टाँगें ऐसी मुड़ी हैं कि हर पाँव दूसरी जाँघ पर है; यह पूर्ण पद्मासन की मुद्रा है। बाएँ हाथ में गुलाबी मणि और दाएँ में छल्लों वाला सुनहरा भिक्षु-दंड है। बाईं ओर दाओ मिंग भिक्षु तथा दाईं ओर मिन गोंग रक्षक खड़े हैं। इन्हीं तीनों का समूह दक्षिण के तीन पूज्य कहलाता है; पास की सवारी दी तिंग का अपना अलग परिचय है। दूसरे प्रचलित समूहों में भी केंद्र और सहचर संबंध बताते हैं। पश्चिम के तीन पूज्यों में अमिताभ बुद्ध के साथ अवलोकितेश्वर तथा महास्थामप्राप्त हैं, जो शुद्धभूमि की शिक्षा में करुणा और ध्यान-बल से जुड़े हैं। अवतंसक सूत्र पर आधारित ह्वा यन परंपरा के समूह में वैरोचन बुद्ध केंद्र में, मंजुश्री प्रज्ञा के और समन्तभद्र व्यापक शुभ संकल्पों को व्यवहार में उतारने के प्रतिनिधि हैं। प्रतिमा का समूह इस तरह जागृति, बुद्धि और अभ्यास के संबंध को दृश्य बनाता है।