वाहन और शुभ आकृतियाँ
प्रतिमाओं के पास दिखाई देने वाले पशु-रूप भी चीन की धार्मिक कला में अपनी पहचान रखते हैं। लंबा शरीर, शल्क और पंजे ड्रैगन अर्थात चीनी ‘लोंग’ (龙) के परिचित चिह्न हैं। ‘छी लिन’ (麒麟) कई पशुओं की विशेषताओं से बनी शुभ आकृति है। क्षितिगर्भ की सवारी ‘दी तिंग’ (谛听) की पहचान विशेष रूप से बोधिसत्त्व के साथ उसके संबंध से है। पुस्तक में क्षितिगर्भ उसे अपनी अंतःप्रकृति से प्रकट हुआ, साधना करने वाला सहचर बताते हैं। फिर दी तिंग की बात रूप से आगे उसके काम को स्पष्ट करती है। पहले अपने स्थान की जिम्मेदारी पूरी सावधानी से निभानी है, साथ ही अपनी सामर्थ्य से दूसरों की सहायता करनी है। उसकी शिक्षा में परहित साधक के पुण्य और अभ्यास के संचित आधार को भी बढ़ाता है; पूर्ण बुद्धत्व से पहले यह संचय अभी जारी रहता है। इस प्रकार किसी सहचर को पहचानने के लिए उसके आकार के साथ उसका संबंध और सेवा भी अर्थ रखते हैं। यही बात क्षितिगर्भ के अन्य सहायकों के काम में आगे दिखाई देती है।
सहायता में अलग-अलग भूमिकाएँ
दाओ मिंग और मिन गोंग के काम एक ही सहायता के भीतर अलग दिखाई देते हैं। क्षितिगर्भ के संकेत पर मिन गोंग दो अधोलोक-दूतों को बुलाते हैं और कहते हैं कि बोधिसत्त्व एक पुरुष से मिलना चाहते हैं। दूत उसे सामने लाते हैं, पर पीड़ा के कारण वह बोल नहीं पाता। तब दाओ मिंग क्षितिगर्भ के हाथ से गुलाबी मणि लेते हैं, पीड़ित के पास उतरते हैं और मंत्र पढ़ते हैं। मणि के प्रकाश से उस पूरे नरक की पीड़ा कुछ समय के लिए शांत हो जाती है; पुरुष को भी इतना आराम मिलता है कि वह अपना हाल बता सके। संदेश पहुँचाना, बुलाकर लाना और मंत्र तथा मणि से राहत देना, यहाँ एक-दूसरे से जुड़े अलग काम हैं। इस छोटे प्रसंग में सहचरों की भूमिका और उद्धार का पहला चरण स्पष्ट होता है। सहायता ने पहले सुनने-बोलने की संभावना बनाई है; अपने किए का सामना करने और उपदेश ग्रहण करने के लिए यही अवसर आवश्यक था।
परिचित रूप में करुणा
बारह वर्ष की उम्र में मर चुका एक बालक दंडस्थल में करुणामयी स्त्री का रूप देखकर सीने पर क्रूस का चिह्न बनाता है और पवित्र माता मरियम को धन्यवाद देता है। श्वेत प्रकाश फैलने से वहाँ की पीड़ा और दंड कुछ समय के लिए शांत हो चुके हैं। यह चीनी बौद्ध पुस्तक का वह प्रसंग है जिसमें सहायता पाने वाला बच्चा अपने परिचित धार्मिक रूप को पहचानता है। उसके माता-पिता कैथोलिक हैं; वे रोज़ मरियम से प्रार्थना करते हैं और गरीबों की मदद करते हैं। न्यायाधिकारी इन शुभ कामों और प्रार्थना को उस सहायता के आने से जोड़ते हैं। अब बालक को कोमल शब्दों में याद दिलाया जाता है कि उसके जाने से माता-पिता कितने दुखी हैं। उसी संवाद में वह अपने जीवन की अश्लील सामग्री देखने और हस्तमैथुन की आदतों का उल्लेख करता है। उसका पश्चात्ताप उन आदतों तथा माता-पिता को दिए दुःख की ओर है। पहचाना हुआ रूप और करुणापूर्ण संबोधन उसे अपने भीतर दबाई बात कहने, दुःख को समझने और सहायता स्वीकार करने का अवसर देते हैं।
भूल स्वीकार करना और शुभ संकल्प
अपनी बात कह लेने के बाद बालक पहले स्वर्ग जाने की प्रार्थना करता है, फिर अपने सहपाठियों की सहायता करना चाहता है। वह उन्हें उन्हीं आदतों से हटाने का संकल्प लेता है, पर साथ में कह देता है कि सफल न हुआ तो उसके हाथ टूट जाएँ और मुँह सड़ जाए। करुणामयी शिक्षा इसी जगह उसके संकल्प को सँभालती है। दूसरों को हानि से बचाने का प्रयत्न शुभ इच्छा है; अपने ऊपर विपत्ति माँगना दूसरी तरह का कारण बोता है। पुस्तक की उस शिक्षा में संकल्प भी जीवन को जन्म-जन्म आगे प्रेरित करने वाली शक्ति है, इसलिए उसकी दिशा शुभ रखनी है। बालक का हृदय-प्रकाश गहरे लाल से हल्का श्वेत होने लगता है और उसका जीवन-रूप ऊपर उठता है। इतनी जल्दी राहत मिलने के प्रश्न पर न्यायाधिकारी बोधिसत्त्व की सहायता और बालक के निष्कपट पश्चात्ताप, दोनों का उल्लेख करते हैं। पहचान से स्वीकारोक्ति, और स्वीकारोक्ति से दूसरे का हित चाहने तक उसका भाव बदला है; सहायक करुणा उसी परिवर्तन के साथ कार्य करती है।
रूप, सूत्र और धार्मिक पहचान
इस बालक के सामने मरियम का रूप क्यों आया, इसका उत्तर न्यायाधिकारी अवलोकितेश्वर की करुणा से देते हैं। वे उस रूप को बोधिसत्त्व की ऐसी अभिव्यक्ति कहते हैं जो सहायता पाने वाले के अनुरूप है। साथ उद्धृत सद्धर्मपुण्डरीक सूत्र का पू मन अध्याय समझाता है कि जीव जिस रूप में उपदेश ग्रहण कर सके, अवलोकितेश्वर उसी रूप में उसके सामने प्रकट होकर शिक्षा देते हैं। सूत्र में यह सामान्य धर्मोपदेश है; बच्चे के प्रसंग में न्यायाधिकारी उसका प्रयोग मरियम के रूप को समझाने के लिए करते हैं। ईसाई परंपरा में मरियम यीशु की माता हैं और इस्लामी परंपरा में मरयम ईसा की माता के रूप में आदरणीय हैं। इन परिचित धार्मिक संबंधों की पृष्ठभूमि में पुस्तक अपना चीनी बौद्ध विवेचन रखती है। दिव्य प्रकट रूप की चर्चा में हिंदी का ‘अवतार’ शब्द भी याद आ सकता है; यहाँ मुख्य कार्य सामने के जीव की आवश्यकता के अनुसार सहायता और उपदेश पहुँचाना है। बालक की पहचान उसे सुनने देती है और उस सुने हुए से उसका अगला संकल्प सँवरता है।