पुस्तक के अंत में संलग्न पुराने सदाचार-ग्रंथों के लिए भी अनुमति और प्रसार का इतिहास दिया गया है। ‘जिन-के जी-याओ’ (《金科辑要》) की भूमिका छिंग राजवंश के श्येन-फंग के छठे वर्ष का उल्लेख करती है। उसके अनुसार हुनान के ली-लिंग में वेन-छांग दी-जुन का उपदेश प्रकट हुआ; यू-दी की अनुमति से स्वर्गीय विधान, जिसे यांग-ल्यू भी कहा गया, मनुष्यों तक पहुँचाया गया। आगे ग्वांग-श्यू के तीसरे वर्ष में ‘लुन-के जी-याओ’ (《轮科辑要》) के प्रसार की बात आती है। वेन-छांग और ग्वान-शंग—इन दो साहित्य और शौर्य से जुड़े अधिपतियों—ने निवेदन किया, देवताओं ने संकलन किया और फ़ेइ-ल्वान नाम की अनुष्ठानिक लेखन-विधि से पांडुलिपि बनी। इसमें लकड़ी की लेखनी थामकर रेत की पट्टी पर उभरते अक्षरों को देव-संदेश के रूप में लिया जाता था, फिर उन्हें लिख लिया जाता था। दूसरे संकलन ने पहले के शेष विषयों को आगे बढ़ाते हुए यिन-ल्यू समझाया। ‘जिन-लुन’ (《金轮》) दोनों को साथ कहने का नाम है। पश्चात्ताप, दंड और रियायत के प्रसंग में ‘दोंग-मिंग जी’ (《洞冥记》) भी उद्धृत होता है। आ-यू की अपनी जाग्रत भेंटों के साथ ये पुराने ग्रंथ अपने अलग रचना-वृत्तांत लेकर उपस्थित हैं।
इन पुराने नियमों को पढ़ते हुए आयु बढ़ने या घटने की ऐसी इकाइयाँ मिलती हैं जिनका आज सामान्य बातचीत में प्रयोग कम है। एक टिप्पणी ‘जी’ (纪) को बारह वर्ष बताती है, और दूसरी ‘सुवान’ (算) को तीन महीने। किसी नियम में इन इकाइयों के साथ कर्म, उसकी बारंबारता और उसका फल जुड़ा रहता है। मनुष्य-लोक में दंड पा चुकने पर अवधि घटने की शर्त कहीं दी गई है; कहीं निष्ठा, माता-पिता की सेवा या दूसरे शुभ कर्म रियायत से जुड़े हैं। किसी की जान जाने पर दंड बढ़ने का उल्लेख भी आता है। इसलिए “कितना” के साथ “किस काम पर” और “किस परिस्थिति में” पढ़ना उपयोगी है। लंबाई के लिए पुराने चीनी माप ‘छि’ (尺) और ‘चांग’ (丈) मिलते हैं। अलग युग और स्थान में उनके वास्तविक मान बदलते रहे हैं। दर्पण-मंच की ऊँचाई तथा चौड़ाई के लिए पुस्तक स्वयं मीटर का माप देती है। आयु की इकाई और किसी वस्तु का आकार अपने-अपने विषय को मापते हैं; एक इकाई का अर्थ दूसरी जगह के अनुमान से तय करने के बजाय उसके मूल कथन से खुलता है।
कुछ संख्याएँ अपने वाक्य के प्रयोजन के साथ समझ में आती हैं। “सिर के ऊपर तीन छि पर देवता” वाला वचन अकेले में भी सजग रहने की प्रेरणा देता है। बड़े मकान के लिए हजारों छि कहना उसके विस्तार से जुड़ा है। क्रोध की आग तीन हजार चांग उठना तीव्र क्रोध का साहित्यिक चित्र है। बौद्ध प्रयोग में कल्प अत्यंत लंबे काल का नाम हो सकता है; यहाँ एक टिप्पणी नरक में दंड भोगने की एक बार की अवधि को एक कल्प बताती है, और जन्म बदलने की चर्चा में एक नया जन्म एक परिवर्तन-चक्र है। हिस्सों की गणना में भी वाक्य का अपना आधार रहता है। पुण्य-समर्पण वाले उत्तर में कुल सात भाग स्पष्ट हैं—छह काम करने वाले के, एक शिशु-जीव का। दूसरे नियम में रियायत के लिए सात अंश का कथन है, जिसका कुल आधार उस पंक्ति में नहीं खोला गया। पहले का छह-एक विभाजन उस दूसरी गणना का आधार अपने-आप नहीं बनता। सूक्ति, दृश्य का आकार, लंबा काल और किसी फल में हिस्सा—संख्या इन अलग कामों को उसी जगह के शब्दों के साथ निभाती है।
विद्या, पद और आगे का जीवन
पुराने नियमों में परीक्षा की सफलता रुक जाने या वंशजों को लगातार पद मिलने का फल क्यों गिनाया जाता है? परिवार बच्चों को शास्त्रीय शिक्षा दिलाकर परीक्षा में सफल और राजकीय सेवा में प्रतिष्ठित देखना चाहते थे। परीक्षा से मिली योग्यता, पद और यश की इस आशा को ‘गोंग-मिंग’ (功名) कहा जाता है। कन्फ्यूशियस तथा मेंग-ज़ि का नैतिक शिक्षण उसकी पृष्ठभूमि में है। पुस्तक जिन चार पुस्तकों और पाँच शास्त्रीय ग्रंथों का उल्लेख करती है, उनके पूरे नाम और विषय साथ की तालिका में मिलते हैं। अधिकारियों को परीक्षा से चुनने की पुरानी व्यवस्था ‘के-ज्यू’ (科举) थी, और उच्च राजकीय मंत्री का पद ‘चाइ-श्यांग’ (宰相) कहलाता था। पान-ग्वान दी रेन-जिए की युवावस्था में परीक्षा देने जाते समय संयम रखने और दूसरों को सदाचार की प्रेरणा देने की घटना को उनके बाद के यश से जोड़ते हैं। संलग्न नियम भी सफलता में विलंब या वंशजों के आगे बढ़ने से आचरण का परिणाम समझाते हैं। यी और शू के उद्धरणों में संचित भलाई का बाद की पीढ़ियों तक पहुँचना इसी भाषा में आता है। अध्ययन, परीक्षा और पद का यह संबंध पुराने सदाचार-पाठों में समृद्धि तथा सम्मान की चर्चा को उसका सामाजिक अर्थ देता है।
एक निर्णय तक पहुँचने में अब कई बातें पहचानी जा सकती हैं: किस कर्म का लेखा है, उसकी जाँच कौन करता है, और आदेश आगे किस काम की अनुमति देता है। मनुष्य ने जो किया है, सुनवाई उसी से आरंभ होती है। मगर जीव के वर्तमान मन और उसके लिए हुई भलाई का भी अपना स्थान है। किसी प्रसंग में उसे उपदेश सुनने की अनुमति मिलती है, किसी में जन्म बदलने का अवसर, और किसी में आगे के अभ्यास की शर्त। इन परिणामों का अंतर समझने के लिए अगला कदम उस परिवर्तन को निकट से देखना है जो स्वयं जीव के भीतर शुरू होता है—अपनी भूल पहचानना, उसका आग्रह छोड़ना और फिर वैसा आचरण रोक देना।
संदर्भ सारणियाँ
स्वर्गीय नाम और उनका प्रसंग
| नाम | पुस्तक में काम और पृष्ठभूमि |
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