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《阴律无情》文化导读 · HI

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दिवंगत परिजन के लिए कुछ भला करने की इच्छा भी इन्हीं सत्कर्मों में रास्ता पाती है। परिवार सूत्र पढ़ता है, जीवों की रक्षा करता है, बुद्ध को अर्पण करता है, दान देता है या पुल और रास्ता बनाने जैसे सार्वजनिक काम करता है। फिर उस कर्म के पुण्य को अपने प्रियजन के दुख से छूटने और शुभ गति पाने के लिए अर्पित करता है। यह ‘ह्वेइ-श्यांग’ (回向), पुण्य-समर्पण, है; उसका संकल्प किसी एक जीव से बढ़कर सभी प्राणियों के हित तक भी जा सकता है। इसमें पहले वास्तविक भलाई होती है, फिर उसके पुण्य को किसके कल्याण की ओर अर्पित किया जा रहा है, यह इच्छा स्पष्ट होती है। काम करने वाले की भावना और पाने वाले की अपनी अवस्था, दोनों आगे के फल से जुड़ते हैं। पिता-पुत्र वाले एक प्रसंग में पुत्र का पाठ और दान पिता के पुराने साधना-संबंध तथा उसके वर्तमान पश्चात्ताप के साथ प्रभावी होते हैं। परिजन की भलाई सहायता का कारण बनती है और उस जीव के अपने कर्म तथा मन के परिवर्तन से मिलती है।

पुण्य के भाग, पूर्ण पाठ और दिन

परिजन को अर्पित पुण्य कितना मिलता है, इसका उत्तर शिशु-जीवों वाले प्रसंग में एक हिस्से की गणना से दिया गया है। पान-ग्वान कुल सात भाग कहते हैं: छह भाग सत्कर्म करने वाले जीवित व्यक्ति को, और एक भाग उस शिशु-जीव को जिसके लिए समर्पण किया गया। काम करने वाले का अपना अभ्यास इसलिए उसी कर्म में फलता रहता है। पाने वाले को मिलने वाले हिस्से की व्यापकता भी किए हुए पुण्य पर निर्भर है। पान-ग्वान उसके लिए मन की दिशा समझाते हैं—दूसरों को दुख से उबारना, उनके जीवन में सुख पहुँचाना और बदले में कुछ पाने की आशा पूरी तरह छोड़ना। भलाई हो जाने पर मन उसी उपलब्धि में अटका न रहे, यह भी उस निर्मलता का अंग है। ऐसी भावना से पुण्य व्यापक होता है, और अर्पित हिस्सा भी उसी के अनुरूप। संख्या यहाँ दाता तथा शिशु-जीव का संबंध बताती है; भावना यह समझाती है कि एक ही अनुपात में समर्पण करने पर भी किए हुए कर्म का पुण्य कितना बड़ा हो सकता है।

कौन-सा ग्रंथ पढ़ा जाए और कितनी बार—यह समर्पण करने वाले का अगला व्यावहारिक प्रश्न है। पान-ग्वान दिवंगतों की सहायता के लिए क्षितिगर्भ सूत्र को विशेष उपयुक्त बताते हैं। यहाँ शिशु-आत्माओं के लिए पुण्य समर्पित करने के प्रश्न का उत्तर देते हुए वे कम-से-कम उनचास पूर्ण पाठ करने को कहते हैं। एक पूर्ण पाठ में ग्रंथ आरंभ से अंत तक पढ़ा जाता है। हाथ में रखा मुद्रित ग्रंथ उसके शब्दों का आधार है; संख्या यह बताती है कि उस पूरी रचना का पाठ कितनी बार हुआ। क्षितिगर्भ का महान संकल्प नरक के प्राणियों को दुख से उबारने का है, इसलिए इस अवसर पर उनके सूत्र का उल्लेख उसकी धार्मिक भूमिका से जुड़ा है। पुनः पढ़ने के साथ शिक्षा का अर्थ समझना और उसे व्यवहार में उतारना भी साधक के सामने रहता है। पहले बताए पुण्य के हिस्से और यहाँ के उनचास पाठ अलग बातें गिनते हैं: एक में लाभ का बँटवारा है, दूसरे में पूरी की गई साधना की आवृत्ति। पाठ, करुणामय भावना और आगे की भलाई, इस अभ्यास को जीवन में स्थिर जगह देते हैं।

समय के बारे में पान-ग्वान पहले एक विशेष रूप से विशाल और निर्मल समर्पण का फल बताते हैं। सत्कर्म का उद्देश्य जीवों को दुख से उबारना और सुख देना हो, बदले की तनिक भी आशा न हो, और काम हो जाने पर मन उससे बँधा न रहे—ऐसी भावना से उत्पन्न पुण्य को वे असीम कहते हैं। उनका कथन है कि यह असीम पुण्य वांग-सी खू-छंग के शिशु-जीव को अर्पित किया जाए, तो वह गर्भपात किए जाने के दिन से गिने गए उनचास दिनों के भीतर शुभ गति अवश्य पाएगा। इस आश्वासन में निर्मल भावना, वास्तव में किए हुए सत्कर्म और उसी जीव के लिए समर्पण साथ आते हैं। दिन की गिनती गर्भपात से शुरू होती है। इसलिए यहाँ उनचास का अर्थ पूरे पाठों की संख्या से अलग है: वह इस विशेष कथन की अवधि है। करुणा का विस्तार और प्रतिफल की आशा का पूरा त्याग उस समय-संबंधी वचन के भीतर ही रखे गए हैं।

इसके बाद एक माँ के पूरे प्रयत्न का विवरण आता है। उसने क्षितिगर्भ सूत्र के उनचास पूर्ण पाठ किए, बार-बार बड़े संकल्प लिए और लगातार भलाई करती रही। उसके शिशु-जीव को ऊपर उठने में गर्भपात के पहले दिन से कुल उनचास दिन लगे। पान-ग्वान इसे अभिलेख में सबसे शीघ्र परिणाम कहते हैं और ऐसी माँ को दस हजार में एक जैसी अत्यंत दुर्लभ बताते हैं। आगे वह स्वयं भी निर्मल साधना करने और अपना तथा दूसरों का हित सँभालने लगी। इस घटना में ग्रंथ का पाठ और दिन की गिनती दोनों हैं, पर उनका संबंध माँ के लगातार बदलते व्यवहार से भी बना हुआ है। अगले उत्तर में अलग-अलग शिशु-जीवों के संबंध और रोष की भिन्नता आती है। पुराने उपकार का संबंध चोट पहुँचने पर नया रोष ले सकता है; पहले से कटु संबंध में वह और गहरा होता है। प्रत्येक के लिए आवश्यक पुण्य तथा उसका क्रोध शांत होने की अवधि इसी कारण अलग हैं। एक माँ का यह पूरा अनुभव उस उत्तर के साथ पढ़ने पर अपना विशेष स्थान रखता है।

दुख के स्थान से निकलने पर शिशु-जीवों की अगली गति उनके अपने पुण्य और प्राप्त समर्पण के अनुरूप होती है। पुस्तक उन अलग-अलग अवस्थाओं को भी समझाती है। पर्याप्त पुण्य तथा अनुकूल कर्म-संबंध हो तो पश्चिमी सुखावती में जन्म बताया गया है; इस प्रसंग में ऐसे उदाहरण बहुत दुर्लभ हैं। कुछ देवों के लोक में और कुछ मनुष्य-लोक में जन्म लेते हैं। सुखावती के कमल-जन्म की नौ श्रेणियाँ हैं; स्वर्गीय जन्म काम, रूप और अरूप के क्षेत्रों में हो सकते हैं; मानव जन्म में साधन तथा जीवन-स्थितियों की भिन्नता रहती है। इन कथनों में ‘छाओ-दू’ (超度) सहायता देकर पार लगाने के धार्मिक प्रयत्न को कहता है। ‘छाओ-शंग’ (超升) ऊपर या किसी शुभ अवस्था में पहुँचने का नाम है। जन्म-मरण के पूरे चक्र से मुक्ति साधना का और व्यापक लक्ष्य है। इसलिए सहायता का काम, उससे मिली नई गति और अंतिम मुक्ति—इनका अर्थ उनके वास्तविक परिणाम से खुलता है।

व्यक्ति का प्रयत्न और सहायता

इस प्रयत्न में परिवार कहाँ से शुरुआत करे, इस पर पान-ग्वान भीतर और बाहर की शक्ति का उल्लेख करते हैं। सच्चा पश्चात्ताप भीतर का बल है; पुण्य संचित करने वाले सत्कर्म बाहर का। वे माता-पिता को प्रतिदिन शिशु से सच्चे मन से क्षमा माँगने, स्वयं सूत्र पढ़ने और अपनी सामर्थ्य के अनुसार जीवों की रक्षा करके पुण्य उसी शिशु को अर्पित करने को कहते हैं। सहायता के लिए धर्मस्थल का सहारा भी लिया जा सकता है। शुद्ध आचरण और धर्मानुकूल विधि वाले बौद्ध केंद्र में नाम-पट्टिका, अर्पण तथा सूत्र-श्रवण से लाभ होने का स्पष्ट कथन है। इस अनुमति के साथ केंद्र की शुद्धता की शर्त जुड़ी है। घर में अलग पट्टिका रखने के उत्तर में उन्नति धीमी होने और दूसरे प्राणियों के उसमें रहने आ जाने की बात कही गई है। पैसे लेकर सब कर देने का दावा करने वाले कपटी केंद्रों की आलोचना भी आती है। इन बातों का आधार पीड़ित शिशु और माता-पिता का संबंध है: उनसे हुआ दुख उनके सच्चे खेद और बदले हुए आचरण का उत्तर माँगता है। उचित धार्मिक सहयोग उस प्रयत्न को सहारा देता है।

एक सच्चे परिवर्तन की पूरी कथा

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