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《阴律无情》

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यहाँ का दृश्य दो सिर वाले अग्निसर्पों के नरक से भी कहीं अधिक क्रूर था। यहाँ बहुत-से उपकरण थे—कहना चाहिए, यातना के उपकरण। ये उपकरण पारदर्शी, कुछ सफ़ेदी लिए हुए, गोल और नुकीले आकार के थे। वे बेहद बर्फ़ीले और धारदार दिखाई देते थे। किसी पुरुष आत्मा को छूते ही ये बर्फ़ीले उपकरण उसके जननांग को जमा कर तोड़ देते और चूर-चूर कर देते थे। जमकर टूटने के तुरंत बाद वह फिर पूरा हो जाता था।

बर्फ़ की यातना समाप्त होते ही बिना रुके ऊपर से अग्निपर्वत के दबाने का कर्मफल भोगना पड़ता था। अग्निपर्वत से दबाए जाने का यह दंड उन लोगों के लिए था जिन्हें हस्तमैथुन का यौन दुराचार करते समय उत्तेजना बढ़ाने के लिए गुनगुने पानी, मिर्च जैसी चीज़ों का उपयोग करना पसंद था। एक छोटे पहाड़ जैसा, अग्नि की तरह लाल यातना-यंत्र पुरुष आत्मा की ओर सामने से उड़ता हुआ झपटता था। वह मानो उसके नाप से ही बनाया गया हो: ठीक जननांग की जगह एक जकड़ने वाला हिस्सा था, जो जननांग को दबाकर इतनी भीषण गर्मी से जलाता था कि वह अलग हो जाता था। हर ओर फिर पीड़ा से भरी चीखें और कराहें गूँजने लगती थीं; पीड़ित बेहोश हो जाते थे। इसके बाद कर्मबल के कारण वे फिर होश में आ जाते, शरीर पूरा हो जाता और वही यातना चक्र फिर शुरू हो जाता। कितना भयंकर कष्ट, कितनी दयनीय दशा थी!

आज रात इस नरक का दृश्य देखकर बहुत मितली आ रही थी। परलोक के न्यायाधिकारी ने बताया कि यह नरक नया बनाया गया है, फिर भी इसकी जगह पर्याप्त नहीं है और इसका और विस्तार करना पड़ेगा। मनुष्यलोक में इस तरह के बहुत अधिक जीव हैं, जो आयु पूरी होने पर यहाँ कर्मफल भोगने आएँगे।

मैंने यह भी देखा कि सौंदर्य-संबंधी अनेक और नरक बनाए जा रहे थे, जो विशेष रूप से सौंदर्य-सैलून चलाने, स्त्रियों के स्तनों का आकार बढ़ाने, उनके जननांग को संकरा करने की शल्यक्रिया करने जैसे कामों के लिए थे। बहुत-सी अनुचित ढंग से काम करने वाली सौंदर्य कंपनियाँ या चिकित्सा केंद्र विशेष रूप से स्त्रियों को कामना में डुबोते हैं और यौन दुराचार द्वारा शील का उल्लंघन करवाते हैं। जीवनकाल में आशीषों और आयु का क्षय होता है और आयु पूरी होने पर इस नरक में 10,000 वर्ष तक कर्मफल भोगना पड़ता है।

परलोक के न्यायाधिकारी जानते थे कि मेरे मन में प्रश्न है। वास्तव में हम विचारों से ही संवाद करते थे। मैं पूछना चाहती थी कि अनुचित स्थान पर मैथुन करना भी शील का उल्लंघन क्यों है। न्यायाधिकारी ने मुझे इसके दृश्य दिखाए।

पता चला कि खुले आकाश के नीचे, शौचालयों में या गरज और बिजली वाली रातों में बहुत-से प्रेत और सूक्ष्म आत्माएँ जीवनसार तथा प्राणशक्ति चूसने आते हैं, या फ़ेइजिंग के माध्यम से शरीर में आविष्ट हो जाते हैं। ऐसे समय अनुचित स्थान पर मैथुन करना स्वयं के लिए हानिकारक होता है और प्रकृति की सद्‌ऊर्जा के चुंबकीय क्षेत्र को भी नष्ट करता है। इससे सौ हानियाँ होती हैं, एक भी लाभ नहीं। इसलिए ऐसा करने वाले जीवों को स्वयं ही पीड़ादायक कर्मफल भोगना पड़ता है।7

विदा होने से पहले परलोक के न्यायाधिकारी ने मुझे निर्देश देते हुए कहा, “इस बार आप बुद्ध की शक्ति के सहारे यहाँ आई हैं। ऊपरी लोक में विराजमान मेरे परम अधिपति और यमराज की कृपापूर्ण अनुमति भी मिली है, और मुझे नरक की वास्तविक स्थिति समझाने का आदेश दिया गया है। इसे स्वर्ग के सारे रहस्य खोल देना कह सकते हैं; ऐसा अभूतपूर्व है। आशा है कि आप जीवितों के लोक में लौटकर यह संदेश पहुँचाएँगी और संसार के लोगों को चेताएँगी कि वे फिर यौन दुराचार करके मानवीय संबंधों और सदाचार को नष्ट न करें, अपने लिए नरक न बनाएँ, और यहाँ का कार्यभार तथा मनुष्यलोक में प्राकृतिक और मानवजनित आपदाएँ इतनी न बढ़ाएँ। आप देख सकती हैं कि मेरा रूप कितना भयावह है। आशा है कि संसार के लोगों को मृत्यु के बाद मुझसे मिलना न पड़े—यह उनके लिए बहुत सौभाग्य की बात होगी!”

सभी बुराइयों में यौन दुराचार सबसे आगे है! यहाँ मैंने परलोक के न्यायाधिकारी को प्रणाम कर विदा ली। उनके मार्गदर्शन के लिए आभार; फिर भेंट होगी।

6/वेश्याओं के ग्राहकों को महानरक में 100,000 वर्ष का कर्मफल

बुद्ध का आभार कि उन्होंने मुझे श्वेत कमल पर सवार होकर प्रस्थान करने का अवसर दिया। आज नरक कुछ अलग क्यों लग रहा था? क्या मैं रास्ता भटक गई थी? सामान्यतः नरक में घनी अंधकारमय यिन ऊर्जा रहती है, पर आज तीव्र सुनहरी रोशनी फैल रही थी—बहुत सुखद बुद्ध-प्रभा। सिर उठाकर देखा तो वे महान प्रण वाले क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व थे। मेरी आँखों से आँसू लगभग छलक पड़े। मैंने तुरंत दोनों हाथ, दोनों घुटने और मस्तक भूमि पर रखकर क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व को प्रणाम किया।

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