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《阴律无情》

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यमराज के प्रति कृतज्ञ हूँ! न्यायाधिकारी के प्रति कृतज्ञ हूँ! अमिताभ बुद्ध!

11/न्यायाधिकारी ने गंभीरता से उत्तर दिया, “परलोक में हमारे परलोकाधिपति ने देखा कि मनुष्यलोक से सहन-सीमा से अधिक दूषित ऊर्जा निकल चुकी है!”

सभी बुद्धों के आशीर्वाद के लिए कृतज्ञ हूँ! आज तो मैं लगभग लेख लिख ही नहीं पाती। इन दिनों आ यू को नरक जाने से रोकने के लिए बहुत-सी बाधाएँ आ रही हैं। सचमुच एक लहर शांत नहीं होती कि दूसरी उठ जाती है। पहले कंप्यूटर में समस्या हुई और अक्षर टाइप नहीं हो रहे थे। फिर मेरे सोते समय एक अमानवीय सत्ता ने ज़ोरदार हस्तक्षेप करके मेरी जीवन-ऊर्जा खर्च करवाई। उस समय मुझे थोड़ा बुखार और सिरदर्द महसूस होने लगा था, और मैं बहुत थक गई थी। आज सुबह तक मेरी दशा ज़ुकाम जैसी हो गई थी। जब भी मुझे ज़ुकाम होता है, यदि मैं लगन से मंत्र जपूँ तो भी ठीक होने में कम-से-कम सात दिन लगते हैं; अन्यथा आधा महीना लगता है।

अभी मैंने मनोबल के साथ स्वयं से कहा कि आज मैं बीमार पड़कर नहीं रहूँगी, नरक अवश्य जाऊँगी और लेख अवश्य लिखूँगी; मुझे विश्वास है कि मैं यह कर सकती हूँ। फिर बैठकर महामयूरी मंत्र का जप शुरू किया। लगभग 30 मिनट बाद बुखार उतर गया, नाक नहीं बह रही थी, गले का दर्द कम होने लगा और सिरदर्द भी नहीं रहा। ज़ुकाम में सुधार शुरू हो गया था। महामयूरी विद्याराज्ञी और दसों दिशाओं के सभी बुद्धों के आशीर्वाद के लिए असीम कृतज्ञ हूँ। मैं, आ यू, बुद्ध के उपकार का प्रतिदान करने के लिए इस पवित्र कार्य को अच्छी तरह पूरा करने का हर संभव प्रयास करूँगी! अन्यथा मैं सभी बुद्धों के आशीर्वाद और संरक्षण के सामने लज्जित होऊँगी!

श्वेत कमल पर सवार होकर प्रस्थान करती हूँ। न्यायाधिकारी महोदय, अमिताभ बुद्ध!

आज न्यायाधिकारी मुझे यौन दुराचार के नरकों में से एक—आत्माओं और तलवार-पुष्पों का नरक—दिखाने ले गए।

मैंने न्यायाधिकारी से पूछा, “आत्माओं और तलवार-पुष्पों का नरक क्या है?”

न्यायाधिकारी ने गंभीरता से उत्तर दिया, “यह नरक उन जीवों के लिए है जिनकी सांसारिक आयु अभी पूरी नहीं हुई है और जो मनुष्यलोक में हस्तमैथुन तथा यौन दुराचार में डूबे रहते हैं। पुरुष प्रतिदिन या बार-बार जानबूझकर अलग-अलग स्त्रियों को अपना यौन साथी बनाते हैं और इस पर इतराते हैं; स्त्रियाँ प्रतिदिन या बार-बार जानबूझकर पुरुष यौन साथी बदलती हैं और स्वयं को बहुत महान समझती हैं। यौन दुराचार से विरत रहने के शील का उल्लंघन करने वाले और यौन दुराचार में डूबे ऐसे जीव आकाश और धरती की यिन और यांग की सम्यक् ऊर्जा के संतुलन को गंभीर रूप से नष्ट करते हैं। क्योंकि हर बार यौन कर्म के समय जीवों के विचारों से यौन दुराचार की कामना की बहुत-सी ऊर्जा निकलती है। ऐसी दूषित ऊर्जा प्रेतों, सूक्ष्म आत्मिक सत्ताओं आदि को आकर्षित करती है। यौन कर्म करने वाले लोग अनजाने में हानि झेलते हैं और उन्हें इसका बोध नहीं होता। जब इस प्रकार की दूषित ऊर्जा बहुत अधिक और प्रबल होकर अत्यंत विशाल शक्ति का रूप ले लेती है, तब उसे निष्प्रभावी करके संतुलन बनाने के लिए मनुष्यलोक में अनगिनत प्रकार की आपदाएँ अवश्य आती हैं।

मनुष्य ब्रह्मांड के प्राकृतिक नियमों का गंभीर उल्लंघन कर रहे हैं, लेकिन मनुष्यलोक में इसके लिए कोई कानूनी दंड नहीं है। कुछ पश्चिमी देशों के कानून तो विवाह के बिना साथ रहने आदि को वैध करने का समर्थन भी करते हैं। ऐसे कानून बनाने वालों को असीम और अंतहीन नरक-फल भोगने होंगे। मनुष्यलोक में ऐसे कानून पूरी तरह निरस्त होने के बाद ही उनके नरक के कर्मफल का अंत हो सकेगा। ठीक ही कहा गया है कि बोधिसत्त्व कारण से डरते हैं और सामान्य जन फल से। हमें प्रतिदिन अपना हर कार्य कर्म के कारण और फल के अनुरूप करना चाहिए और सावधान रहना चाहिए कि क्षणभर की असावधानी भविष्य के जन्मों में अशुभ फल न ले आए। परलोक में हमारे परलोकाधिपति ने देखा कि मनुष्यलोक से सहन-सीमा से अधिक दूषित ऊर्जा निकल चुकी है, और इन अशुभ कर्मों में से बहुत-से नाबालिग किशोरों द्वारा किए गए हैं। इसलिए हमारे परलोकाधिपति ने नरकों में और अधिक नए नरक बनवाए, ताकि ऐसे शीलभंग करने वाले जीवों को दंड दिया जा सके जिनकी आयु अभी समाप्त नहीं हुई है। आशा है कि मनुष्यलोक के जीवित लोगों की आत्माओं को पकड़कर नरक में दंड देने से संसार के लोग सचेत होंगे, उनके पापकर्म क्षीण होंगे और आयु पूरी होने के बाद नरक में उनके दंड की अवधि भी घटेगी।”

आ यू को इतने विस्तार से समझाने के लिए धन्यवाद, न्यायाधिकारी महोदय। मैंने फिर बहुत कुछ सीखा। आपका सचमुच बहुत धन्यवाद!

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